प्रतिध्वनि हिन्दी साहित्यिक पत्रिका, मई 2020
वर दे वीणावादिनी वर दे वर दे वीणावादिनी वर दे, चरणों में अपने थोड़ी सी जगह दे। फंसी जो मेरी नैया भवँर में, बन खेवैया ज्ञान से उसे तार दे। दया की तुम मूरत हो, हो करुणा का असीम सागर। स्वेत वस्त्रधारिणी ममतामयी, अपनी कृपा का मुझको दान दे। शून्य था जीवन मेरा, संवेदना विहीन मस्तिस्क था। बजा के वीणा के तार, अँधेरे को मिटा कर प्रकाश दे। तूफानों से लड़ती चलूँ, कर्मपथ पर आगे बढ़ती चलूँ। कर सकूँ हर किसी की मदद, ज्ञान का मुझको ऐसा भंडार दे। अर्पण है मेरा पूर्ण तन-मन, समर्पित हैं मेरा सर्वश्व जीवन। सच का साथ खड़ी रह सकूँ, मेरी कलम को ऐसा उपहार दे। वर दे वीणावादिनी वर दे, चरणों में अपने थोड़ी सी जगह दे। शशि कुशवाहा लखनऊ, उत्तर प्रदेश ईमेल-Kushwahashashi1180@gmail.com हृदय से प्रणाम सर्वप्रथम भारत महान, स्वतंत्र सत्य साकार, मस्तक उज्जवल हिमालय, शत-शत ह्रदय से प्रणाम। ऋषि भूमि देवो भूमि, मात-पिता महान, अनंत अलौकिक गुरु दीक्षा, शत-शत हृदय से प्रणाम। गंगा जमुना सरस्वती, पावन पवित्र जीवनदान, निर्मलता शीतलता अत्यंत, शत-शत हृदय से प्रणाम। आत्म शांति आत्मनिर्भर साहसी, देशभक्त ...