प्रतिध्वनि हिन्दी साहित्यिक पत्रिका, मई 2020
वर दे वीणावादिनी वर दे
वर दे वीणावादिनी वर दे,
चरणों में अपने थोड़ी सी जगह दे।
फंसी जो मेरी नैया भवँर में,
बन खेवैया ज्ञान से उसे तार दे।
दया की तुम मूरत हो,
हो करुणा का असीम सागर।
स्वेत वस्त्रधारिणी ममतामयी,
अपनी कृपा का मुझको दान दे।
शून्य था जीवन मेरा,
संवेदना विहीन मस्तिस्क था।
बजा के वीणा के तार,
अँधेरे को मिटा कर प्रकाश दे।
तूफानों से लड़ती चलूँ,
कर्मपथ पर आगे बढ़ती चलूँ।
कर सकूँ हर किसी की मदद,
ज्ञान का मुझको ऐसा भंडार दे।
अर्पण है मेरा पूर्ण तन-मन,
समर्पित हैं मेरा सर्वश्व जीवन।
सच का साथ खड़ी रह सकूँ,
मेरी कलम को ऐसा उपहार दे।
वर दे वीणावादिनी वर दे,
चरणों में अपने थोड़ी सी जगह दे।
शशि कुशवाहा
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
ईमेल-Kushwahashashi1180@gmail.com
हृदय से प्रणाम
सर्वप्रथम भारत महान,
स्वतंत्र सत्य साकार,
मस्तक उज्जवल हिमालय,
शत-शत ह्रदय से प्रणाम।
ऋषि भूमि देवो भूमि,
मात-पिता महान,
अनंत अलौकिक गुरु दीक्षा,
शत-शत हृदय से प्रणाम।
गंगा जमुना सरस्वती,
पावन पवित्र जीवनदान,
निर्मलता शीतलता अत्यंत,
शत-शत हृदय से प्रणाम।
आत्म शांति आत्मनिर्भर साहसी,
देशभक्त ईशभक्त इंसान,
बलिदान दान विद्यमान,
शत-शत हृदय से प्रणाम।
नारी सीता सावित्री,
पतिवर्ता ममतामयी करुणामूर्ति,
जन गण मन भारत महान,
शत-शत हृदय से प्रणाम।
कविराज भट्ट
दिल्ली
ईमेल- kavirajb3@gmail.com
पाल-घर
"डर भी अब तो डर गया,
मन तो भयंकर सिहर गया,
वो भगवाधारी तिलमिलाता चला गया,
वर्दीधारी और कुछ प्यादों से छला गया,
मानवता भी तब शर्मसार हुयी होगी,
हैवानियत ने भी अपनी साख खोयी होगी,
जब इसांनियत, इंसान से तार तार हुयी होगी,
चन्द कायर दरिन्दों से मानवता भी हारी होगी,
जब उस भगवाधारी ने जिदंगी की भीख मांगी होगी,
खून से लथपथ भगवाधारी का मुसकुराता चेहरा,
ढूंढ रहा था वर्दीधारी रक्षक में पहरा,
मौत का तांडव था वो कितना गहरा,
करतूतें करने वाले भले ही कुछ प्यादे हों,
उन राक्षसों को हिम्मत देने वाले कुछ वर्दी वाले हों,
शत प्रतिशत अकर्मण्यता होगी उस गद्दार राजा की,
जिसमें ना चेतना है, ना वेदना है,
ना आहट है अन्तर्मन की संवेदना की,
मन में कवि कुल के बहुत गहरा आघात है,
ये कैसा नाम का विरोधाभास है,
‘पालघर’ में ना ‘पालक’ दिखे,
ना ही ‘घर’ का आभास है,
जी भरा पड़ा है वेदनाओं से,
करूण-कृदन अंतर्मन में हो गया,
भावभीनी श्रद्धांजलि है उन साधु जनों को,
जो असमय परलोक वासी हो गया"
कुलदीप बरतरिया
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
ईमेल- shreejeeacademy@gmail.com
or
kuldeepbartariya007@gmail.com
स्वयं विचार कीजिए!!
जैसा कि आप सब जानते है कोरोना आज सारे देशों में खौफ का माहौल बना चुका है, ना जाने कितने लोग इसका शिकार हो चुके है और कितने इससे मर भी चुके है, इटली और चीन जैसे देशों में तो ये संख्या हजारों के पार हो चुकी है, बचाव रखो ये सब कह रहे है पर कर कोई नहीं रहा lockdown हमारे ही भले के लिए किया गया है, वैसे लोगो को अवकाश चाहिए होता है, जब घर बैठने को मिल रहा है तो लोगो को उसमे भी आपत्ति हो रही हैं, ये तो बात रही उन लोगो की जिन्होंने इसे पूरी तरह मजाक बना रखा है, अभी भी वक्त है नियमों का पालन करे वरना पछताना पड़ सकता है।
अब आते है उन लोगो पर जो डर डर कर ही जिए जा रहे है, जिन्हें थोड़ा बुखार भी हो जाता है, तो उन्हें कोरोना का डर लग जाता है, कुछ लोग इतने खौफ में हो गए है कि जिसकी वजह से वह अपने वर्तमान के आनन्द को खराब किए जा रहे है, जब देखो तब यही सोचते रहते है उन्हें कोरोना हो गया तो, और फिर ऐसे लोग कहते हैं कि इन्हें भगवान पर विश्वास है। भाई ऐसा भी कैसा विश्वास, जब तुम पल पल चिंतित रह रहे हों, फिर कहते हो भगवान है नहीं,सुनते नहीं, प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा तो तुम देख चुके हो, ये लिखने से कुछ नहीं होगा "काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का", इस पर विश्वास भी करना सीखो जैसा कि पूरा दृश्य हमारे सामने है इटली ने भी सब कुछ करके देख लिया, लेकिन अब सब भगवान पर छोड़ दिया है, अब जैसे कि कहीं लोग जिन्हें हमारी भारत की वैदिक विज्ञान पर भरोसा नहीं है, और जो भगवान को भी नहीं मानते तो विज्ञान को तो मानते हो ना, तब भी ये बात पढ़ी होगी कि हमारा subconscious mind शक्तिशाली होता है हम जिस चीज के बारे में सोचते है उसी को अपनी तरफ आकर्षित करते है, अगर हम नकारात्मक बाते सोचने लगे तो हमारे साथ नकारत्मक ही होगा, तो क्यों ना सकारात्मक ही सोचा जाए, positivity attract positive things to be happen and negativity attracts negative things to be happen...
इसलिए अगर और कुछ नहीं कर सकते तो लोगो का हौसला बढ़ा सकते हो कि वह ठीक हो जाएंगे रिकवर करेंगे और ना कि थोड़ा सा बुखार आते ही उनके दिमाग में कोरोना का ज़हर घोल दो, और ये बात भी सच है साबित हो चुकी हैं आधे से ज्यादा लोग कोरोणा की वजह से नहीं उसके डर से मरे है जिनको थोड़े से बुखार में ही उन्होंने अपने दिमाग में यही बैठा लिया कि वह नहीं बचेंगे, सारा खेल सिर्फ दिमाग का ही जैसा सोचोगे होने लगेगा, और आशा और विश्वास से सकारात्मकता ही आएगी और अच्छा ही होगा, "Everything works on belief system...".
इसका एक बेहतरीन उदहारण है एक औरत जिसे भूलने कि बीमारी थी और दूसरी जिसे होने पर थी, लेकिन जिस महिला को भूलने कि बीमारी थी वह इस बात को मानती ही नहीं थी कि वह भूलती है, और सब भी उसे कहते की हा तुम्हे सब याद रहता है उसने अपना belief system इतना मजबूत कर दिया होने को तो वह उस बक्त बिल्कुल असंभव जैसा था लेकिन उसके subconsious mind ने इसे पूरी तरह से स्वीकार लिया और धीरे-धीरे उसकी ये भूलने कि बीमारी कम होती गई और उसे याद रहने लगा, जबकि दूसरी औरत जिसे सिर्फ शुरुआत के लक्षण थे वह प्रतिदिन यही सोचने लगी कि वह भूल जाती है, और धीरे-धीरे वह सच में सब कुछ भूलने लगी, अंतर बहुत ही बहुत साफ है सारा खेल belief system का है!!
इसलिए लोगों का प्रोत्साहन बढ़ाए ना की उन्हे हतोत्साहित करे, जैसे हर चमकती चीज सोना नहीं वैसे हर छीक कोरोना नहीं!
सब अच्छा होगा यही सोचें ना कि पहले से ही नकारात्मक विचारो को अपनाए, और ये भी शाश्वत सत्य है जो होना है वह होगा ही, फिर क्यों चिंता में अपना आज बर्बाद करना!! सावधान रहे, सतर्क रहे, भगवान के प्रभाव में रहे, नकारात्मक सोच कर पल पल डर कर रहे या सावधानियां बरत कर सकारात्मक होकर लोगों का हौसला बढ़ाते हुए मुश्किल की घड़ी में भी आनंद से जिए, चयन आपका है।
स्वयं विचार कीजिए!!
निशिता मंगल️
ईमेल- nishumangal0102@gmail.com
निराशा
जब हो घनघोर निशा तो थोड़ा धीरज रख,
अपने क़दमों पर कर यकीं बस आगे बढ़ता चल।
आशा का सूर्य उदित होगा जीवन के नभ मंडल में,
मत देख लकीरें किस्मत की तू निज कर्म करता चल,
भाग्य तेरा खुद चल कर आएगा तू कोशिश करता चल।
माना की घिरी हुई हैं ये अमावस की काली घनेरी रात,
लाख घना हो ये अंधियारा रोक सका हैं कब सूर्य प्रकाश।
जब हो घनघोर निशा तो थोड़ा धीरज रख,
अपने क़दमों पर कर यकीं बस आगे बढ़ता चल।
वक्त का पहिया धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता हैं,
तू क्यों रोकें अपने क़दमों को तू भी चलता चल,
मत उलझा तू मन को खुद ही खुद की उलझन से,
यूँ न हो निराश तू न निराश करो खुद के मन को,
जीवन के पथ पर नित आगे बढ़ता चल।
जब हो घनघोर निशा तो थोड़ा धीरज रख,
अपने क़दमों पर कर यकीं बस आगे बढ़ता चल।
मत सोच अकेला हैं तू इस दुनिया की महफ़िल में,
चूमें क़दमों को सफलता तब ही लोगों का मेला हैं,
सारे रिश्ते-नाते है फरेबी सब मतलब का खेला हैं,
छोड़ निराशा के पथ को तू आगे बढ़ता चल,
हासिल होगीं हर मंजिल बस तू कोशिश करता चल।
जब हो घनघोर निशा तो थोड़ा धीरज रख,
अपने क़दमों पर कर यकीं बस आगे बढ़ता चल।
राहुल कुमार
(स.अ.,सीतापुर)
फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
दोहे
विषय "ज्योति"
ज्योति बिना संसार में, "सरित" रहे अँधियार।
अंतर्मन की ज्योति से, तब भी हो उजियार।।
पंच द्रव्य से ज्योति को, मिलता है आकारl
पंच तत्व से तन बनें, "सरित" कहे संसार।।
नयन-ज्योति कुछ और है, दीप-ज्योति कुछ और।
अंतर्मन की ज्योति है, दोनों की सिरमौर।।
दीप ज्योति में रवि बड़े, दृग में महा महेश।
सूर आत्म की ज्योति में, माने सारा देश।।
पात्र, तेल, वाती, अनिल, अनल मिले।
आत्म मिले परमात्म से, वही ज्योति अति खास।।
विषय "पहरा"
पहरा चौकस दे रहे, मेरे पहरेदार।
दुश्मन पर, गद्दार पर, करते "सरित" प्रहार।।
सरहद पर पैनी नजर, रखते मेरे वीर।
अर्जुन जैसे शत्रु पर, मारे तीखे तीर।।
पहरा करते राष्ट्र की, शायर, सैनिक, संत।
बुधि-बल देती शारदा, "सरित" कृपा भगवंत।।
घुसत भड़ारे मा "सरित", तबहिन लुच्चा, चोर।
घर-भेदी मूड़े चढ़इ, जब पहरा कमजोर।
बिन पहरा लूटिन हमी, उज्जर बज्जर मूस।
लूटि रहें आजउ "सरित", हमका देशी घूस।।
माई लखि साढ़ी मिलइ, मुंहुं देखे बउहार।
बारी जब खेती चरी, तब पहरा बेकार।।
ग्राम कवि संतोष पाण्डेय "सरित" गुरु जी
गढ़ रीवा (मध्य प्रदेश)
चाहत
चाहत की चाह ने हमें सारी चाहतों से दूर कर दिया,
बस उसकी चाहत ने न चाहकर भी मज़बूर कर दिया।
चाह-चाह कर अपनी चाहत को,
हमने अपनी सारी चाह, चाहत के नाम कर दिया।
हम कैसे बताते अपनी चाहत को अपनी बेशुमार चाहत के बारे में,
कैसे समझाते उन्हें चाहकर कि अकेली चाहत है वो मेरी,
पता नहीं अब क्या करें जीकर इस दुनिया में,
हमारी चाहत है मेरी जिंदगी, साँस है वो मेरी।
चाहकर भी चाहत हमारी हमे चाह न पाई,
वो चाहत हमारी चाहत समझ न पाई,
न चाहकर भी हमने अपना सब कुछ अपनी चाहत के नाम कर दिया,
उन्होंने चाह कर अपनी चाहत किसी और के नाम कर, हमे रुसवा कर दिया।
काश कोई समझा देता चाहत को हमारी चाहत के बारे में,
जला देता कोई चाहत का दीप चाहत के दिल में,
एक दिन जरूर आएगा जब चाहत समझेंगी हमारी चाहत के बारे में,
पर देर हो जाएगी चाहत को ये समझ आने में।
अपनी चाहत को दिल में लेकर कहीं दूर चले जायेंगे,
चाहत के चाहकर भी बुलाने पर हम वापस नहीं आएंगे,
उस दिन न चाहकर भी हम चेतना शून्य हो जायेंगे,
किसी और का पता नहीं , चाहत को हम कभी भूल नहीं पाएँगे।
दीप मौर्या
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
रक्तबीज कोरोना
रक्तबीज कोरोना
यह प्रलय का वक्त लाया है
तभी भगवान उसके
इंसान पर सख्त हो पाया है
मानो तो, ना चीन,ना धर्म
ना जात का दोष है
यह हमारी प्रकृति का
हम पर आक्रोश है।
हां! उसी प्रकृति का
जिसे हम ने काट बाट
भ्रष्टाचार,बेईमानी,
अत्याचार, बलात्कार
से धोया है
असल में यह रक्तबीज
कोरोना हमने ही बोया है।
यह प्रकृति ही है जो
हमें जेल दे रही है
और जो अभी भी ना
समझे उसे जिंदगी
से बेल दे रही है
इस रक्तबीज कोरोना
को हमें जड़ से मिटाना
होगा अब खुद की
जान बचाने के लिए
हमें संस्कारों में आना होगा
नमस्ते करें
ना ही हाथ मिलाना होगा
मनोरंजन के लिए
महाभारत रामायण
लगाना होगा।
ना पिज़्ज़ा, ना बर्गर
घर का अन्न ही खाना होगा
अब अपनों के साथ वक्त
बिताना होगा
यह ईश्वर की भी लीला निराली
जब सीधी उंगली से ना हुआ काम
उंगली टेढ़ी कर डाली है।
कविता शरद विश्वकर्मा
जगदंबा पुरम
खंडवा
प्यास सच्ची थी प्यार झूठा था
दीया बुझा था, रात जली थी।
कविताओं की बात चली थी।
एक भंवरा था, एक कली थी।
हृदय में मची खलबली थी।
सांसो का चढ़ना उतरना।
दांतो का जिस्मो को कुतरना।
कांटो के बीच महकता गुलाब।
दहकती ख्वाहिश बहकता ख्वाब,
ख़ामोश करती रही बात।
न थमी आंखों की बरसात।
अंधेरो ने अंधेरो को छुआ था।
नशा नजरों को हुआ था।
तन भीगा था मन भीगा था।
चांद का भी ईमान डिगा था।
दोनो का रिश्ता अनूठा था।
अरमान सच्चा था अल्फ़ाज़ झूठ था।
उन्हें फ़ना करना ही मेरी ख्वाहिश थी।
उनकी सांसो में पनाह लेने का एहसास झूठा था।
उन्हें यूँ पीछे से पकड़ कर समेट लेने का वो पल सच्चा था।
मेरा उनसे बिछड़ कर यूँ पल पल बिखरना झूठा था
प्यास सच्ची थी प्यार झूठा था।
समीर पंडित
पंडित समीर सांडिल्य
ईमेल-sameer.sargam89@gmail.com
किनारे
कल-कल नदिया की धारा निर्मल मन से बह रही
मिलजुल कर सब रहना सीखो यह विश्व को कह रही
1. निर्मल मन से पुल्कित होकर शांत धरा पर बहती है
आग छुपा कर रखे गर्भ में ऊपर से शीतल रहती है
मानवता के मल विष को अपने सीने पर सह रही
2. उमड़ घुमड़ कर बादल आएं जल बरसाएं मूसलाधार
करे समाहित अपने में सब इसकी शक्ति अपरम्पार
चले उफन कर बड़ी-बड़ी शक्ति इसके आगे ढह रही
3. झूम झूम मस्ती से चलती सबकी प्यास बुझाती है
दो छोरों के बीच बहे एकता का पाठ पढ़ाती है
देती ये संदेश प्यार का कर दूर सभी का भय रही
4. इसकी चंचल चाल से दुनिया वालो कुछ तो सीखो तुम
प्रेम के सूत्र में बंधे हुए कभी तो दीखो तुम
मिलकर ममता से रहा करो जैसे ये ममता मय रही
जगबीर कौशिक
इंस्पेक्टर बीएसएफ बहादुरगढ़ हरियाणा
अधूरा प्यार
वरुण आज भी वह उस लड़की को भूल नही पाया है, जो उसकी जिंदगी में बहुत कम समय के लिए आई और चली गई। वो उन्ही यादों में खोया रहता है।
वरुण और पल्लवी कॉलेज में एक साथ पढ़ते थे। कॉलेज की पढ़ाई के दरमियान दोनो में ज्यादा बातचीत नही होती थी। पर वरुण मन ही मन पल्लवी को पसंद करता था। कॉलेज खत्म होने के बाद वरुण जॉब की तैयारी मैं लग गया। और कुछ समय बाद उसकी किसी कंपनी मैं जॉब भी लग चुकी थी।
एक दिन उसके किसी दोस्त की शादी का इनविटेशन आया जो कि उसका कॉलेज का दोस्त था। वरुण ने सोचा चलो अच्छा है इसी बहाने कॉलेज के सभी दोस्तों से मुलाकात भी हो जाएगी, बहुत दिन हो गए किसी से मुलाकात नही हुई। सिर्फ फ़ोन पर ही बात होती रहती है।
जब वह शादी में पहुँचता है तो देखता है कि पल्लवी भी वहां मौजूद है। पल्लवी से उसकी हाई हेलो होती है। ‘और क्या कर रहे हो आजकल’ पल्लवी ने कहा। ‘एक कंपनी में जॉब कर रहा हूं, और तुम बताओ क्या कर रही हो आज कल’। ‘कुछ नही यार बस सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही हूँ’। इस तरह बातें करते- करते दोनो एक दूसरे का नम्बर ले लेते है।
एक दिन वरुण ऑफिस से जल्दी घर गया तो उसने सोचा क्यों न पल्लवी को फ़ोन लगा लूँ। फ़ोन पर दोनों की बातचीत हुई। ‘अच्छा हुआ जो में उस दिन शादी में आ गया और तुमसे मुलाकात हो गई, बहुत दिन से तुमसे बात करने की सोच रहा था पर तुम्हारा नंबर नही था,’। ‘हाँ यार में भी बहुत दिन से सब लोगों से मिलने का सोच रही थी’। ‘और कैसी चल रही है तुम्हारी सिविल सर्विसेज की तैयारी? वरुण ने पूछा। ‘बस अच्छी ही चल रही है पर अभी तक रिटेन एग्जाम नही निकला कोशिश जारी है’। ‘हो जाएगा मेहनत करती रहो’ वरुण ने कहा। ‘थैंक्स वरुण, और कहो तुम्हारी जॉब कैसी चल रही है’। ‘बहुत अच्छी चल रही है, प्राइवेट जॉब है न तो वर्किंग टाइम काफी लंबा होता है। चलो फिर कभी बात करते है’, ओके वाई पल्लवी। वाई वरुण।
अक्सर वरुण और पल्लवी फ़ोन और मैसेज में बातें करने लगे। एक दिन वरुण ने पल्लवी से कहा कि ‘में तुम्हे पसंद करने लगा हूँ’। पल्लवी कुछ नही बोली बस थैंक यू कह कर बात टाल दी। पल्लवी के लिए कॅरियर ज्यादा जरूरी था। इन सब बातों के लिए उसके पास समय नही था और न ही इन सब चक्करों में पड़ना चाहती थी। एक बार तो वरुण ने यह तक कह दिया कि मैं तुमसे प्यार करता हुँ और शादी भी करना चाहता हूँ। पर पल्लवी ने कहा ‘सॉरी वरुण पर जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ी नही जाती तब तक मैं इस बारे में कुछ सोच भी नही सकती’। यह सुनकर वरुण उदास तो हुआ पर पल्लवी को फोर्स भी नही कर सकता था।
अक्सर वरुण पल्लवी से कहा करता कि तुम शादी के बाद भी तो जो तुम करना चाहो कर सकती हो, परंतु पल्लवी हर बार मना कर जाती। पर एक दिन पल्लवी को एहसास हुआ कि मुझे वरूण की बात मान लेनी चाहिए, कितना प्यार करता है नदी मुझसे। और रही बात पढ़ाई की तो वो तो शादी के बाद भी की जा सकती है। जब एक दिन दोनो बात कर रहे थे तो पल्लवी कहा कि तुम्हे कुछ बताना चाहती हूं। ‘अच्छा बोलो क्या बात है’? वरुण ने कहा। ‘ऐसे नही कल शाम को किसी रेस्टोरेंट में मिलते है फिर बताती हूं’। ‘ठीक है जैसा तुम कहो, मिलते है कल’।
पल्लवी बहुत खुश थी आज शाम को अपने दिल की बात वरुण को बताने के लिए। दोपहर में जब वह अपनी पढ़ाई में मग्न थी कि अचानक उसके सिर में बहुत तेज दर्द होने लगा। अकसर पल्लवी की सिर मैं दर्द रहता था। इस बार कुछ ज्यादा ही दर्द कर रहा था तो डॉक्टर के पास जाना ठीक समझा। डॉक्टर को अपनी प्रॉब्लम बताई की अक्सर उसके सिर में दर्द होता रहता है पर आज कुछ ज्यादा ही हुआ तो आपके पास दिखाने चली आयी। डॉक्टर ने तफसील से इस बारे में पल्लवी से बात की। डॉक्टर को कुछ गंभीर मामला लगा तो कहा कि ‘कुछ जांच कर लेते है शाम तक रिपोर्ट आ जाएगी तो पता चल जाएगा क्या प्रॉब्लम है’। ‘कोई सीरियस बात तो नही है ना डॉक्टर साहब’। ‘अभी कुछ नही कह सकते रिपोर्ट आ जाने दीजिये फिर देखते है’। पल्लवी अपना उदास मन लेकर वापस आ गई। आज शाम तो उसे वरुण से मिलना था पर ऐसा कुछ हो जायेगा इसकी उम्मीद नही थी। तुरंत वरुण को फोन करके बोली कि ‘आज नही मिल सकती थोड़ा बिजी हुँ, कल मिलते है’।
शाम को डॉक्टर के यहां पहुँची तो पता चला कि पल्लवी को ब्रेन ट्यूमर है, और पल्लवी बस कुछ दिन की मेहमान है। पल्लवी विश्वास ही नही कर पा रही थी उसके साथ ऐसा हो सकता है। उसके सारे सपने पल भर में ही मिट्टी में मिल गए। उसने तय किया कि इस बारे में वरूण को कभी कुछ नही बताएगी और न ही अपने प्यार का इज़हार करेगी। वो वरुण को तकलीफ़ नही देना चाहती थी।
अगले दिन वरुण ने फ़ोन किया ‘आज तो मिल रही हो न शाम को’। ‘नही यार अभी तबियत थोड़ी ठीक नही है बाद में कभी मिलते है’। वरुण ने कहा ‘पर तुम क्या कहना चाहती थी ये तो तुम फ़ोन पर ही बता सकती हो न’। ‘ऐसी कोई खास बात नही है जब मिलोगे तब बता दूँगी’। ‘ऑके जैसी तुम्हारी मर्ज़ी’।
एक दिन पल्लवी ने वरुण से कहा कि ‘मैं जब भी अपना रिजल्ट देखती हूँ फैल ही हो जाती हूँ, इसलिए इस बार मेरा रिजल्ट तुम देखना, हो सकता है तुम मेरे लिए लकी को और में पास हो जाऊं’। ऐसी बात इसलिए वरूण से की थी कि उसे पता था जब तक उसका रिजल्ट आएगा तब तक शायद पल्लवी ज़िंदा न बचे। ‘इस बार तुम जरूर सेलेक्ट हो जाओगी देखना’।
एक रात अचानक से पल्लवी के सिर में तेज दर्द हुआ, उसे हॉस्पिटल मैं एडमिट करना पढ़ा। पर डॉक्टर के लाख कोशिस करने के बाद भी पल्लवी को नही बचाया जा सका। वरुण भी वही हॉस्पिटल में था, काफ़ी निराश। अब पूरी बात उसके समझ में आ रही थी कि पल्लवी उस दिन शाम को क्या बात बोलने वाली थी, और क्यों चाहकर भी नही कह पा रही थी।
एक दिन पल्लवी ने जो एग्जाम दिया था उसका रिजल्ट आने वाला था। वरुण को तब समझ आया कि क्यों पल्लवी ने उसे अपना रोल नंबर दिया था। पल्लवी को पता था कि शायद जब तक रिजल्ट आएगा तब तक शायद वो इस दुनिया में नही होगी। वरुण ने उसका जब उसका रिजल्ट देखा तो पता चला कि पल्लवी पास हो गई है। कभी-कभी प्यार के इतने करीब आने पर भी प्यार अधूरा रह जाता है।
कृष्णा यादव
होशंगाबाद, मध्य प्रदेश
कोरोना ढूंढ रहा है...
रहें लॉक डाउन में बंद।
बचने का कर लें सभी प्रबंध।
कोरोना ढूंढ रहा है.....
कोरोना ढूंढ रहा है.....
सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाओ।
इक दूजे से दूरी बनाओ।।
नही रहें किसी के संग।
बचने के कर लें सभी प्रबंध।
कोरोना ढूंढ रहा है....
कोरोना ढूंढ रहा है....
सेनेटाइजर से हाथ धुलें हम।
बीस सेकंड तक खूब मलें हम।।
छूटेंगे इसके फंद।।
बचने का कर लें सभी प्रबंध।
कोरोना ढूंढ रहा है...
कोरोना ढूंढ रहा है...
अफवाहों से बचें रहें हम।
घर पर सुरक्षित डटे रहें हम।
ना शांति करें हम भंग।
बचने का कर लें सभी प्रबंध।।
कोरोना ढूंढ रहा है...
कोरोना ढूंढ रहा है...
करें गरीबों की मदद सभी हम।
मानवता न भूलें कभी हम।।
न हो मन में छल दम्भ।।
बचने का कर लें सभी प्रबंध।।
कोरोना ढूंढ रहा है...
कोरोना ढूंढ रहा है...
रहें लॉक डाउन में बन्द।
बचने का कर लें सभी प्रबंध।।
कोरोना ढूंढ रहा है....
कोरोना ढूंढ रहा है....
आशुकवि प्रशान्त कुमार "पी.के."
पाली, हरदोई(उ.प्र.)
सोचो इस तरह
दिल में भरम पालकर कब तलक जियोगे?
हालात से डरकर कब तलक रहोगे?
हकीकत का सामना करना ही लाजमी है!
जिंदगी को लाश बना कब तलक जियोगे?
अरे हौसलों से जिंदगी में
रोशन दिल के चिराग हैं!
इस रोशनी में उम्मीदों को
क्यों नहीं रखते???
ग़म चूर चूर हो...
खुशी का सुरूर हो...
क्यों इस तरह...
ज़रा भी नहीं सोचते???
सोच में ही जिंदगी ..
गुजार रहे हो .....
तो सोच में ...
जिंदादिली के रंग
क्यों नहीं भरते????
खुशी मिल नहीं रही ...
तो इजाद करो उसे...
मुश्किल का हल है क्या???
तलाश करो उसे...!!
कारण तो कोई है..
जो नामुमकिन हुआ है सब!!
वजह तो कोई है ...
जो रूठा हुआ है रब....!!
तो इस तरह सोचो
कि वजह हाथ आये ...!!
जिंदगी से ग़म का ..
काँटा निकल जाए...!!
करना तो हरहाल में ...
खुद को ही पड़ेगा....!!
तब जाकर खुशियों का गुल
जीवन में खिलेगा...!!
तो इजाद करो खुशी..
ना बैठो निश्तेज होकर...!!
उठो करो कोशिश...
ग़म को लगाओ ठोकर...!!
फिर ठहाका लगाओ ...
हौसला खुद में लाओ...
जो कर सका ना ईश्वर..
वो तुमने कर दिया...!!
जिंदगी को अपनी ...
खुशियों से भर दिया..!!
खुद में खुदा मिलेगा..
तो समझ पाओगे...!!
करने से सब है संभव...
भेद समझ पाओगे...!!
फिर जिंदगी भर अपनी मुस्कुराओगे....!!
जो चाहिए वो खुद ही
हासिल करते जाओगे...!
जो चाहिए वो खुद ही
हासिल करते जाओगे...
प्रतिभा द्विवेदी "मुस्कान"
सागर मध्यप्रदेश
कोरोना को दूर भगाएंगे
कोरोना से तुम डरो ना
डर कर यूं मरो ना
मत निकलो घर से बाहर
कुछ दिन धैर्य धरो ना...
सुरक्षित हो तुम अपने घर में
घर से बाहर अभी जाना नहीं
कोरोना के बढ़ते खतरों पर
अफवाहें बिल्कुल फैलाना नहीं
हालात सुधर जाएंगे कुछ दिन में
हमें मिलकर आगे बढ़ना होगा
वैश्विक महामारी कोरोना से
एकजुट होकर लड़ना होगा
सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना
साबुन से हाथ धोते रहना
लॉकडाउन का पालन करना
निशदिन गर्म पानी पीते रहना
दिशा निर्देशों का पालन करके
हम यह जंग जीत कर दिखाएंगे
स्वस्थ रहकर घर में "चमन"
हम कोरोना को दूर भगाएंगे।
प्रो.चमन सिंह ठाकुर
नाहन हिमाचल प्रदेश
ईमेल- dr.chaman2017@gmail.com
हम गाँव छोड़ आए
जो एक सच्चा सा रिश्ता था उसे तोड़ आए।
भोले-भाले गांव को हम बहुत दूर छोड़ आए।।
वहाँ कपास के खेतों में लहराते थे सितारे।
मृदु समीर की कोमल छुअन को हम छोड़ आए।।
मनुहार भरी बातें और औसारे कि वह रातें।
सौंधी सी चूल्हे की साग रोटी को हम छोड़ आए।।
ढूंढते हैं नयन प्यासे उस हरी-भरी अमराई को।
लहराती पगडंडियों को क्यों हम दूर छोड़ आए।।
केवल स्मृतियों में सजी रह गई हैं यादें मेरी।
पिंजरे के बने हम पंछी वो आसमान छोड़ आए।।
कागज के फूलों की दुनिया के खातिर हम।
महकते लहकते सरसों के खेत छोड़ आए।।
धूप तो इस आंगन को कभी सजाती ही नहीं।
सूरज की आंच में तपता खलिहान हम छोड़ आए।।
लहलहाती फसल और चिड़ियों का चहकना।
गन्ना, भुट्टे, ककड़ी तोड़ खाना हम छोड़ आए।।
सहमी सी ख्वाहिशें कभी करती है बगावत।
फरेबी दुनिया के खातिर सरल गांव छोड़ आए।।
आगे कहां ले जाती भागा दौड़ी शहरों की देखो।
खेत, हवेली, अमराई सब तो वहीं हम छोड़ आए।।
कवि शरद अजमेरा "वकील"
भोपाल म प्र
ईमेल- Sharadjain785@gmail.com
जीवन और संघर्ष
लड़कर अंधियारे कंटरिले दुर्गम रास्तों से,
प्रतिकूल परिस्थिति में निरंतर चलना होगा।
करके संयमित मन और नियमित कर्मों को,
दृढ़ संघर्ष से ही जीवन को संवारना होगा।।
मन भ्रमित न कर देखकर चांदनी रातों को
सफलता की मंजिल कभी आसान नहीं होती।
सीख लेना उनकी चांदनी रातों के रहस्य को
बिना संघर्ष किए कभी खूबसूरत रात नहीं होती।।
किए गए सत्कर्म पर विश्वास करना
ज्वाला में तपकर सोना भी कुंदन बन जाता है।
मंजिल भी भूखी होती सत कर्मों के संघर्षों की
आत्मबल और कौशल से स्वर्ण भविष्य लिख जाता है।।
लक्ष्य के पथ में आए कांटो से न डरकर
सहकर असह्य वेदना को जिंदगी मुस्कुराती है।
निःसंदेह विश्वास नहीं होगा तुझको अपने भाग्य पर
कर्मठ हाथों में भी भाग्य रेखा बन जाती है।।
खोजना सारी कमियों को जो बाधा बनी मंजिल में
सही दिशा और समय का इंतजार करके डटना होगा।
विश्वास करना सफलता कदम चूमेगी एक दिन
पूर्ण शक्ति और एकाग्र मन से लड़ना होगा।।
गोविन्द कुमार धारीवाल
हरिद्वार उत्तराखंड
ईमेल- gkdhariwal1987@gmail.com
मेरी मौत मैं तुझसे डरता नही
मेरी मौत मैं तुझसे डरता नही,
तू ही बता न, क्या ज़िंदगी जीने वाला, एक दिन मरता नही?
मैंने उस लम्हे से ही तुझसे नाता जोड़ लिया था
जब एक भ्रूण के रूप में, एक देवी के गर्भ में अंकुरित हुआ था
तुझे तो पता ही है न मेरे जन्म की कहानी
वो साल का आखिरी दिन वर्षो पुरानी
एक कहावत सबने सुनी सबके जुबानी
आए हो अकेले मितवा पड़ेगी तुझे अकेले ही जानी
मैं न वैसे आया था जैसे सभी इस जहां में आते हैं
तीन के साथ मैं आया... पर अब भी अकेले न जाऊंगा
खट्टी मीठी सुनहरी यादों का एक पोटली बना ले जाऊंगा
जिसमे होंगे मां बाबा मेरे और भाई बहिन सारे
जिन्होनें मुझको चंदा सूरज कहा और कहा आंखों के तारे
वे दोस्त सभी होंगे... जिन्होंने खुशियों का अहसास दिया
मिलों लंबी धरती दी...और अनंत शून्य से आकाश दिया
पर इस पोटली के एक कोने में ऐसा भी एक सख्स होगा
जो हूबहू मेरा साया है...मेरा जैसा ही उसका अक्स होगा
उसको नही अब डर है मेरी ही तरह मर जाने का
न उसमे मोह बचा है जीवन मे कुछ भी पाने का
पाया हमने खुद को एक दूजे में, इससे ज्यादा और क्या पाए कोई
नश्वर सी इस काया को कितना गले से लगाए कोई
हाड़ मांस के पुतले हैं हम पानी के बुलबुले से
शोर मचाते आते हैं पर चले जाएंगे यूँ ही चुपके से
मौत मेरी तू सुन ले फिर से, मैं तुझसे डरता नही
क्या ज़िंदगी जीने वाला, एक दिन मरता नही?
मैं सुनता हूँ आज कल अक्सर, दस्तक तेरे आने की
तू ही तो आखिरी पड़ाव है मेरा, क्या अब भी जरूरत है तुझसे डर जाने की
इतनी गुज़ारिश है बस तुझसे, जिस पल को तू मेरे करीब आए
रहे न चिंता की लकीरें माथे पे मेरी, न एक बूंद आंसू मेरे आंखों में आए
वे सभी लोग हों सामने मेरे, जिस पल मैं देह त्यागूँ मैं
आए न ऐसी एक भी घड़ी, की तुझ से बच कर के भागूं मैं
उस शख्स की गोद मे सिर हो मेरा, उसकी बांहे मेरे गले का हार बने
खिल जाए तब रूप ये मेरा, उसका आलिंगन जब मेरा श्रृंगार बने।
आकाश
मजदूर
मजदूर दिवस कहो या श्रमिक दिवस,
दोनो ही तो ही एक ही है,
आज पूरी दुनिया इसी के बदौलत,
सभी क्षेत्रों मे विकाशशील है,
जो अपने खून पसीना बहा कर,
विश्व के विकास मे तत्पर है,
आज ना मजदूर होते तो,
किसी भी देश की, समाज की,
उधोगो का अस्तित्व नही होता,
मजदूरों का सबसे अधिक योगदान है,
हर क्षेत्रों मे मजदूर का पसीना लगा है,
चाहे वो घर हो, फैक्ट्री हो, बगीचा हो,
या दुनिया की बेस्किमती ताजमहल हो,
आज मजदूर अपनी जीवन दांव पर लगाकर,
कोयले के खदानों से कोयला निकालते है,
अपना जान भी गवा देते है,
मजदूरो की जिन्दगी की हम मोल नही करते,
जो हमारे लिये हरवक्त तैयार रहते है,
अपना निस्वार्थ भाव से सेवा करते,
आज पूरी दुनिया मे,
मजदूरों की हालत काफी दयनीय है,
कही भूख से तड़प रहे है तो,
कही पानी से मर रहे है,
कही घर से बेघर है तो,
कही परिवार के बिन तड़प रहे है,
कभी भी कही भी,
कोई भी आपदा आती है,
वहाँ मजदूर ही पहले जाते है,
सबको राहत पहूंचाने,
अपनी जान को जोखिम मे डालकर,
सबको बचाने, जीवन देने,
लेकिन सबसे पहले कुचले जाते है वो है मजदूर ही,
सबकी नजरों मे सबसे हिन होते है मजदूर,
देश मे सबसे ज्यादा तंग होते है मजदूर,
समाज मे पहले कुचले जाते मजदूर,
महामारी मे सबसे पहले मरते है मजदूर,
मजदूर को कभी हिन ना समझो,
जीवन को सुन्दर, घर को स्वर्ग,
जीवन के सपनों को साकार,
ममता का एहसास,
जीवन को स्वाभिमानी,
समाज की नई दिशा,
दिखाते है सच्चे मजदूर!
रुपेश कुमार
सीवान, बिहार
ईमेल- rupeshkumar000091@mail.com
प्रभु को पत्र
ऊँ श्री गणेशय नमःदिनांक 1.5.2020
जमशेदपुर, झारखंड।
आदरणीय हे नारायण,
सादर चरणस्पर्श।
हे राम जी, हे कृष्ण जी, आपके जितने भी नाम हैं। सब मेरे ह्रदय में अंकित हैं। रात में सोते वक्त और सुबह जागते वक्त सिर्फ तुम्हारा ही नाम होंठों पर होता है। राम भजन गुनगुनाते हुए ही रसोई का सारा काम निबटाती हूँ। मैं बहुत खुश हूँ। मजे में हूँ। तुम हमेशा हर व्यक्त मेरे जेहन में रहते हो। अच्छा बुरा सब काम तुम्हें ही सौंप देतींहूँ। तुम्हारे सिवा मुझे कुछ सुझता ही नहीं है।
प्रभू तुम तो पूरे ब्रह्महाँड की सुरक्षा के लिए अपनी पूरी फौज लगा रखी है। फिर भी महामारी कोरोना भेजा है तो कुछ वजह भी होगी ही। क्यों कि तुम्हारी मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं डोलता है फिर ये कोरोना कैसे पूरी दुनिया में घुम सकता है। पता है साकारात्मक और नाकारात्मक दोनों पहलुओं पर चिंतन मनन के बाद ही भेजा है। लेकिन हम सब हैं मूढ़मति। कुछ समझ आए तब तो।
तुम्हारे आदेश से घर में ही हूँ। आज से नहीं। कोरोना काल से नहीं। अपनी तो आदत है। अब तो मैं ने फोन उठाना भी बंद कर दिया है। क्या बात करना? कुछ खास खबर तो है नहीं। मेरा एक भाई है छत्तीसगढ़ में उसका भी फोन आया था। मैं ने उठाया नहीं। गृहस्थी के काम से समय ही कहाँ मिलता है, कि कुछ और बात करूं। दिन भर बेटा का और इनका चिक चिक चलता रहता है। मन उचाट हो गया है प्रभू। सो सोचा आप हीं को सब लिख दूँ। एक मित्र था। आजकल वो भी नाराज बैठा है। मैं ने भी उसकी मर्जी पर छोड़ दिया है। सब अपने मन की कर लें। प्रभू तू भी तो अपने मन की ही करता है। यदि मेरी इच्छा पूछोगे तो कहूँगी की साहित्य का जो सबसे बड़ा वाला सरकारी सम्मान होता है वही मुझे दिला दे। मेरा भी कुछ भला हो जाएगा। थोड़ा नाम हो जाएँगा। क्या घर गृहस्थी के साथ साहित्य सृजन करने वाले का नाम नहीं होना चाहिए। बोलों प्रभू! हे राम हे कृष्ण हे गणनायक बुद्धि विधायक हे माँ शारदे बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। रोटी बेलना छोड़ कर भी लिखनी पड़ती है। समय पर पूरे घर की चाकरी कर कर के तब लिखतीं हूँ प्रभू। थोड़ी मेहरबानी करो ना। मुझे राष्ट्रपति जी वाला! बड़ा वाला सम्मान दिला दो। इसी प्रार्थना के साथ इति शुभ प्रभू। जय श्रीराम। जय श्रीकृष्ण। राधे राधे। हे गणनायक बुद्धि विधायक। आशीर्वाद देना माँ शारदे।
चरणन लागी के साथ प्रभू आपकी सेवक।
प्रतिभा प्रसाद कुमकुम
जमशेदपुर, झारखंड
ईमेल- prasad.pratibha@gmail.com
नवगीत
मापनी 14,14
अधीर मन कहता हरदम,
हर कदम बस चाह पूरी।
लोग कुछ अनमोल होते,
रखना उनसे कुछ दूरी।।
कौन कहता भाव मन के,
कौन रिश्तों को निभाता।
निभा कर जीवन समर्पित,
उसे पागलपन बताता।।
किसने समझा है किसको,
कुछ रहती बात अधूरी।
लोग कुछ अनमोल होते,
रखना उनसे कुछ दूरी।।
शादी कोई खेल नहीं,
समझ कोई क्या पाता।
तन को ही चाहा पाना,
वह नाता कैसा नाता।।
सृष्टि का विस्तार होगा,
रिक्त पन अब फिर जरूरी।
लोग कुछ अनमोल होते,
रखना उनसे कुछ दूरी।।
नारी जीती जो जीवन,
बिना शर्त रिश्ता भाता।
दुनिया केवल देखे सुख,
नारी का जीवन जाता।।
कभी-कभी जीवन ऐसा,
घर में रहना मजबूरी।
लोग कुछ अनमोल होते,
रखना उनसे कुछ दूरी।।
अलका जैन "आनंदी"
मुंबई
मैं तो एक मजदूर हूँ
(१)
चौराहे से आया
मैं चुनकर,
मालिक की
आवाज सुनकर,
शीशमहलों का
मैं बुनकर,
मेरे नसीब में कहाँ
आलीशान बंगले,
बेशक़ बनाता जरूर हूँ।
मैं तो एक मजदूर हूँ।।
(२)
मैं फावड़ा हूँ,
मैं बेलचा हूँ,
मैं हँसिया हूँ,
मैं मिट्टी सीमेंट
बालू का बोरा हूँ,
मैं कैंची सिलाई मशीन
मैं डोरा हूँ,
मैं फटे कपड़े भी
पहन लेता हूँ
कोट पैंट से दूर हूँ।
मैं तो एक मजदूर हूँ।।
(३)
मैं झाड़ू हूँ
पोछा हूँ,
मुलायम गद्दे
दुखते हैं
मैं जमीन पर
सोता हूँ,
मैं सड़कें
बनाता हूँ,
मैं भूख को भी
मार के खाता हूं
हाँ मैं इतना क्रूर हूँ।
मैं तो एक मजदूर हूँ।।
(४)
रिक्शा मेरा साथी है,
टेम्पो मेरा कार है,
सर पे रखा बोझा
मेरा श्रृंगार है,
मैं आम अंगूर अमरूद अनार
सेब सन्तरा लीची केला हूँ
मैं आलू प्याज टमाटर गोभी
धनिया मिर्च नींबू से भरा ठेला हूँ,
मैं ठंड गर्मी वर्षा के
रस से भरपूर हूँ।
मैं तो एक मजदूर हूँ।।
(५)
नीचे हूँ ऊंचाईयों पर
मगर चढ़ता हूँ,
पीछे हूँ मगर
आगे रोज दौड़ता हूँ,
मेरे जठराग्नि से कीमती
मेरी जान कहाँ,
नंगा हो गटर में उतरता हूँ,
सफाईवाले के नाम से मशहूर हूँ,
मैं तो एक मजदूर हूँ।।
(६)
न जाना पड़े
परदेस हमे
हमारे गांव में
जो कुछ काम हो जाए,
मुझे कल की भी
चिंता नहीं
बस दो जून की
रोटी का इंतजाम हो जाए,
कुछ सोचिए कि
हमारा भी कुछ भला हो,
हमारे घर मे भी सुबह शाम
दो बार चूल्हा जला हो,
शौक नही साहेब,
पर बाहर जाने को मजबूर हूँ।
मैं तो एक मजदूर हूँ।।️
सच्चिदानन्द मौर्य
कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
ईमेल-memoriesofsmsince7feb@gmail.com
हवस का आतंक:
नमस्कार दोस्तों! आतंक शब्द सुनते ही आपके मन में क्या आता है?
मेरे विचार से सबसे पहले आपके दिमाग में आजतक जितने भी आतंकी हमले पूरी दुनिया में किए या करवाए गए हैं वहीं आते होंगे।
दोस्तों ये सच है लेकिन...
आतंक की जो परिभाषा है उसके अनुसार आतंक का मतलब होता है कि किसी भी सजीव द्वारा दूसरे सजीव को शारीरिक, मानसिक या किसी भी तरह प्रताड़ित करना।
अब मैं मेरी कहानी की ओर बढ़ता हूं। कहानी कितनी छोटी या बड़ी होगी यह अभी नहीं बता सकता। जैसे जैसे कहानी बढ़ेगी, घटनाक्रम के अनुसार लिखता जाउंगा।
प्राची दसवीं कक्षा की छात्रा थी, बहुत गरीब घर की और दूसरों से भोली भी। राहुल उसी की कक्षा में पढ़ने वाला अमीर घर का बिगड़ैल लड़का था। एक दिन क्लास में प्राची देर से आई। क्लास की सभी सीटें भरी हुई थी। ऐसे में मजबूरी में उसे राहुल के पास बैठना पड़ा।
अब यहां से अपनी कहानी शुरू होती है।
राहुल:: हाय आइ एम राहुल एंड यू?
प्राची:: मेरा नाम प्राची है।
ऐसे ही दोनों में बातें शुरू हुई और दोस्ती हो गई। धीरे धीरे यह दोस्ती प्यार में बदल गई। लेकिन ये प्यार एकतरफा था। प्राची राहुल से बेइंतहा प्यार करती थी पर राहुल अमीर घर की बिगड़ी औलाद होने के कारण प्राची के प्यार को प्यार नहीं समझता था।
इसी तरह दो साल बीत गए। एक दिन राहुल और प्राची १२वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा देने के बाद लोनावला घूमने चले गए। राहुल प्राची को अपने बाइक पर ले कर कुछ ही घंटों में लोनावला के सुप्रसिद्ध बुशी डैम पर पहुंच गए।
बुशी डैम पहुंचते ही बारिश ने उनका जोरदार स्वागत किया। दोनों भीगते भीगते बारिश का आनंद लेने लगे। दोनों इस बारिश में बुरी तरह भींग गए। गीले होने के कारण प्राची को ठंड लगने लगी। जिस कारण वो असहज महसूस कर रही थी। उसने राहुल से कहा, मुझे बहुत ठंड लग रही है कुछ करो। राहुल उसे गर्मी देने के लिए बिना कुछ सोचे-समझे उसे अपनी बाहों में ले लेता है। प्राची भी बेझिझक राहुल की बाहों में सिमट जाती है। उसके शरीर की गर्माहट महसूस करने लगती है। राहुल के हाथ प्राची के पीठ पर धीरे धीरे घूमने लगते हैं। प्राची अपने माथे पर राहुल की गर्म सांसें महसूस कर रही थी। उसके बाद राहुल और प्राची एक दूसरे में खो गए। बहुत देर तक वह इसी अवस्था में रहते हैं। फिर राहुल शहर के पास ही होटल में कमरा ले लेता है और दोनों वहां चले जाते हैं। प्राची को कमरे में ही रुकने के लिए कह कर वह मार्केट से जाकर 2 जोड़ी कपड़े ले आता है। खुद के लिए पैंट शर्ट एवं प्राची के लिए एक वनपीस। राहुल फिर से रुम में आते ही प्राची के गले लग जाता है और उन दोनों के होंठ फिर से एक हो जाते हैं। धीरे धीरे उनके बीच जो कपड़ों की दूरी होती है वह भी लोप हो जाती है और आगे जो भी हुआ होगा वो आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूं।
तो दोस्तों!! कुछ महीने बाद राहुल प्राची को फोन कर अपने घर बुलाता है। उसके घर पर राहुल के दो और दोस्त भी थे। राहुल के माता-पिता भी घर पर नहीं थे। प्राची जैसे ही डोरबेल बजाती है राहुल दरवाजा खोलकर उसे अंदर बुलाता है। दरवाजा बंद कर वह उसे गले से लगा लेता है और चूमने लगता है। वह दोनों अभी एक दूसरे में खोए होते हैं तभी राहुल के दोनों दोस्त भी हॉल में आ जाते हैं और प्राची को हवस भरी नजरों से देखने लगते हैं। राहुल उन्हें कहता है डोंट वरी तुम दोनो को भी मज़ा मिलेगा। लेकिन प्राची राहुल को धकेल कर दरवाजा खोलने लगती है। तभी राहुल प्राची से कहता है की जाने से पहले यह देख कर जाओ। राहुल अपने घर का टी वी अॉन कर देता है। टी वी पर लोनावला में उन दोनों के बीच जो होटल में होता है उसका विडियो चलने लगता है। यह देख कर प्राची अपना सर पकड़ लेती है परन्तु राहुल पर उसका कोई असर नहीं होता और वह प्राची को अपनी गोद में उठा कर सोफे पर पटक देता है। वह प्राची को धमकी देता है कि यदि तुम मेरा कहा नहीं मानोगी तो ये विडियो मैं वायरल कर दूंगा। प्राची यह सुनकर रोने लगती है। कुछ घंटों बाद प्राची रोती हुई राहुल के घर से निकलती है और अपने घर पहुंच कर बाथरूम में फूट-फूटकर रो पड़ती है। कुछ देर बाद वह नहाकर बाहर आती है और अपने कमरे में जाकर सो जाती है।
उस दिन के बाद राहुल प्राची को रोज अपने घर बुलाता और अपने अलग अलग दोस्तों के हवस की प्यास बुझाने लगा। एक दिन प्राची नहाते हुए सोचती है कि यह राहुल तो आतंकवादियों से भी बुरा है। आतंकवादी भी किसी के साथ ऐसा नहीं करते होंगे। ऐसे विचार प्राची के मन में आते ही उसके आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। प्राची जिस हवस के आतंक में जी रही थी न जाने ऐसी कितनी ही प्राचीयां इस दुनिया में होंगी।
राहुल जैसे लोगों को सबक सिखाने के लिए हमें क्या कदम उठाने चाहिए?
दोस्तों आप सोचते होंगे कि प्राची का क्या हुआ होगा? मैं यह सस्पेंस नहीं रखूंगा।
कुछ महीने बाद उसी बुशी डैम में प्राची की लाश पुलिस ने बरामद की।
प्राची की मौत कैसे हुई? क्यों हुई? कुछ भी पता नहीं चला और वह फाइल पुलिस स्टेशन के लॉकर में धूल खा रही है।
दोस्तों आप ही सोचिए कि ऐसे लोग अगर हमारे समाज में हों तो समाज कब और कैसे सुधरेगा?
धवल त्रिवेदी
एडिटिंग: अमन ऐजे, एकता पुष्प
मुंबई महाराष्ट्र
ईमेल- dhavaltrivedi04@gmail. com
जलियांवाला बाग
बैसाखी के पावन पर्व पर
निहत्थे शीख बंधू बैसाखी पर्व मना रहे थे
ओडवायर के जमावबंदी आज्ञा से वे अनभिज्ञ थे
बैसाखी मनाना या त्यौहार मनाना यह कोई अपराध नहीं
पर साम्राज्यवादी, वसाहतवादी उसे माने नहीं
जालियनवाला बाग चारों ओर से बंद थी
आने- जाने के लिए एकही रास्ता था
जनरल डायर ने सैनिकों को
निहत्थों पर गोली चलाने का
आदेश दिया होना वही था जो हो गया
कई निरपराधियों की मृत्यू और कई घायल हुए
भारत वर्ष में इस घटना की कडी़ आलोचना हुई
अंग्रेज सरकार और बौखला गई
रवींद्रनाथ ठाकुरजी ने उन्हे अंग्रेजों द्वारा
मिली’सर’ उपाधी अंग्रेजों को लौटाई
आंदोलन और विरोधी गतिविधियों से
अंग्रेज सरकार टस से मस न हुई
उल्टा ब्रिटिश संसद ने जनरल डायर का
सम्मान करके उसे उपहार तथा पुरस्कारस्वरूप रूपयों की थैली दे दी
जलियांवाला बाग हत्याकांड हिंदुस्तानियों की चुभता जख्म है
ब्रिटेन इस घटना की माफी माँगे
हिंदुस्तानियों ने करना है इसका बार-बार विचार
वहीं रहेगी सच्ची श्रद्धांजली और हुतात्माओं से प्यार
दत्तींदुसुत पद्माकर दत्तात्रय
वाघरूळकर संभाजीनगर (औ.बाद) मराठवाडा़ - महाराष्ट्र
ईमेल- padmakar6968@gmail.com
कोरोना
जब मैं शहर से
गांव में पहुँचा तो देखा
पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था
सब कुछ अलग थलग सा
देखा मैंने परिचित सड़क पर
बिछी पड़ी थी अजीब सी भयानक सन्नाटे की चादर,
शायद सबको भान हो गया था,
उस भयावह स्थिति का,
मैं चुपचाप घर की ओर उलझे हुए मन में
हजारों सवाल लिए बढ़ता जा रहा था,
मैं सबको देख रहा था।
सब मुझको देख रहे थे कि,
जैसे मैं कोई अपराध करके लौट रहा हूँ
कल तक मैं जिनका दुलारा था।
आज वो सब मुझसे बहुत दूर खड़े थे।
चेहरों पर सिकन और जुबां पर अनगिनत सवाल लिए
गैरों की निगाह से मुझे देखे जा रहे थे।
मेरे प्रति उनका बर्ताव बिल्कुल अजनबी सा था।
अभी कुछ ही हफ्तों पहले होली में सबको सबने बड़े करीब से गुलाल लगाया था,
सबसे गले मिल मैं अपने काम पर गया था।
पर इस तरह तो किसी ने कभी
मुझसे व्यवहार नहीं किया था।
मैंने घर पहुँच कर देखा कि
बच्चों की खिलखिलाहट कहीं गायब थी
और चेहरों कि हंसी मानो
इस वीराने मे कहीं गुम हो गयी हो,
घर के अंदर से ‘छोटी’ ने बड़ी तेज भय भरी आवाज लगाई और
रोक दिया मुझे दरवाजे पर,
खुद मास्क लगाए बाहर आई
एक हांथ मे साबुन दूसरे में पानी लिए
बोली पहले तुम हांथ धोलो!
मैंने देखा है टीवी में,
‘कोरोना’ कोई बीमारी आई है, अपने भी देश मे,
जब मैं घर जाता था
सब खुश नजर आते थे।
और सब बच्चे तपाक से गले लग जाते थे।
क्या ये वही बच्चे हैं,
जो इस तरह बदला बदला अकल्पनीय व्यवहार कर रहे हैं, मुझसे
ये कैसा दिन आया है
कोरोना जो आफत लाया है
सब टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं
यह कैसा वायरस आया है
यह कैसा वायरस आया है।।
त्रिपुरेश गोंड़
ईमेल- tripureshond123@gmail.com
स्वप्न पिरोए जाते हैं
व्यथित भाव से हृदय ग्रसित हो,
मानवता भी जब दूषित हो।
संहार प्रभु को करना पड़ता,
पाप भूमि पर जब विकसित हो।
संयम, धैर्य को धारण करता,
वह मनु की पावन संतान।
नव सृष्टि को निर्मल बनाते हैं,
स्वप्न पिरोए जाते हैं।
जीवन चक्र है जन्म मरण का,
अस्तित्व सर्वस्व नहीं रहा करता।
सत्कर्म मार्ग प्रशस्त कर के,
मानव हित में हूंकार है भरता।
अपना जीवन औरों को देकर,
सृष्टि पर उपकार जो करता।
मिलकर सब नव साज सजाते हैं,
स्वप्न पिरोए जाते हैं।
हर खुशियों को हम पा लेंगे,
अपना जहां बना लेंगे।
रहना है बस घर के अंदर,
फिर से सपना सजा लेंगे।
विजयी होगा भारत अपना,
कोरोना को हरा देंगे।
सब मिल मिसाल नई बनाते हैं,
स्वप्न पिरोए जाते हैं।
शंकर दान चारण
जोधपुर राजस्थान
आत्मविश्वास
किसान दीनालाल के खेत में रबी की फसल पक गयी है। कोरोनावायरस के कारण पूरे राष्ट्र में लाकडाउन लगा है। एक सच्चे देशभक्त होने के कारण मजदूरों को फसल काटने के लिए नहीं कह रहे हैं। फसल कटाई के लिए बहुत चिंतित है।
"दादाजी आप सवेरे-सवेरे क्यों चिंतित हैं? आपके चेहरे पर बारह बज रहे हैं।" उनका बारह वर्ष का पोता रोहन पूछा।
"खेत में रबी की फसलें सूख गयी है। अगर इसको यूं ही कुछ दिन छोड़ देंगे तो सारी मेहनत पर पानी फेर जाएगी। क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मजदूरों से कटवा नहीं सकता। मैंनें कभी फसल काटी नहीं है।" दीनालाल उदासी स्वर में बोले।
"ओहो दादा जी! रोहन के रहते हुए आप क्यों चिंतित हो जाते हैं। चलिए खेत, हमलोग स्वयं फसलें काटकर ले आएं। मैंनें मजदूर चाचा जी सबको फसल काटते ध्यान से देखता रहता।" राहुल आत्मविश्वास के साथ बोला।
"पर रोहन तुम अभी.........।" दीनालाल बोले।
"चलिए, दादा जी फसल काटने में देरी मत कीजिए।" रोहन दीनालाल को फसल काटने के लिए तैयार कर लेता है। दोनों आत्मविश्वास के साथ प्रसन्नता पूर्वक खेत की ओर चल देते हैं।
रीतु प्रज्ञा
(शिक्षिका)
दरभंगा, बिहार
जँजीर की विवशता
पहले कुत्ते ने दूसरे कुते की तरफ देख कर कहा,- "यार,इस तरह दूसरों की जंजीर मे बंध कर अपना जीवन क्योँ बरबाद कर रहे हो? मेरी तरह आजाद रहो... कब तक अपनी वफादारी दूसरो के टुकड़ों पर बेचते रहोगे?"
दूसरा कुत्ता बैला- "पार्टनर, मैं तो अपने मालिक को छोडना चाह रहा हूं, पर मालिक ही मुझे नहीं छोडता। कल कह रहा था, अब तुम ट्रैंड हो गये हो... याद है न तुम्हें, मैंने जिन लोगो की लिस्ट तुम्हें दी है, उन पर तुम्हें मुझसे पूछे बिना ही भौकना है।"
पहला कुता फिर बोला, "यानि कि तुम आदमी के ईशारों पर जी रहे हो?भौंकना तो हमारा जातीय संस्कार है बास... लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि आदमी हमेँ सिखाये कि हमे किस पर भौंकना है।"
दूसरा कुत्ता संयत स्वर मे बोला, "सही कहते हो भाई... जंजीर की विवशता वही समझ सकता है, जिसके गले मे जंजीर होती है। अपने मालिक की रोटी पर पलने पर भी मैं तुम पर भौंक नहीं रहा हूं, यही क्या कम है।
महेश राजा
महासमुंद, छत्तीसगढ़
ईमेल- maheshraja.1958@gmail.com
मजदूर दिवस
विधा मनहरण घनाक्षरी छंद
कौन नहीं मजदूर,करें खूद काम दूर।
पर काज कुदृष्टि को,हटाना जरूर है।।
बैठ कर उच्च पद,तन-मन गदगद।
निम्न पद क्रूर करें, भरे मगरूर है।।
होके खूद मजदूर, छोट करें मजबूर।
अहंकारी के अहम,तोड़ना गुरुर है।।
जो भी जन करें काम,अपने करें या आम।
सबका सम्मान यश, जरूरी दस्तुर है।।
यशवंत"यश"सूर्यवंशी
भिलाई दुर्ग छग
एक बेटी का दर्द
कौन कहता है बेटी आगे बढ़ी है,
गौर से देखो अभी वही तो खड़ी है।
वही डर, और भय मां को बाहर जाने पर,
बाप को फिक्र है देर से घर आने पर।
लोग कहते हैं पायलट, और डाक्टर बनी,
फिर भी सुने रास्ते में क्यों सहमी खड़ी।
ससुराल में भी तो कोई न मान मिला,
बिन दहेज दिये न ससुराल मिला।
भाई के सामने हमेशा घबराई है,
सब ने कहा तू तो पराई है।
पढ़ लिख कर भी हर दुख सहती रही
मैं हूँ खुश तुम्हे देख कहती रही।
दुनिया अपने रवैये पर अभी भी अडी है,
कौन कहता है बेटी आगे बढ़ी है।
कौन कहता बेटी आगे बढ़ी है।
शहनाज बानो
जनपद - चित्रकूट
ईमेल- Zimmiitrc@gmail.com
देव तुम्ही कहलाते हो
एक तपस्वी के सदृश तुम,अथक साधना करते हो,
कड़ी धूप में मिट्टी से तुम, सोना निर्मित करते हो।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु, धरती के तुम स्वामी हो,
कभी न ऐसा दिन आया जब, सुख की चादर तानी हो,
शीतल छांह में बैठ के तुमने,कभी नहीं विश्राम लिया,
कर्म भूमि में श्रम करके तुम, अन्न संपदा देते हो।
ईश्वर के प्रतिनिधि बनकर तुम, इस दुनिया में आए हो,
पुण्य भूमि के अद्भुत गौरव, कृषक हमें तुम भाए हो,
परहित करने को तुमने,इस धरती पर है जन्म लिया,
कर्मठता और त्याग की प्रतिमा, देव तुम्हीं कहलाते हो।
स्मिता पांडेय
अध्यापिका
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
कभी-कभी
दिल कुछ इस तरह उदास हो जाता है कभी कभी,
सब कुछ कहकर भी अनकहा सा रह जाता है कभी कभी।
किससे कहें अपनी दास्तां,हर कोई अपनी ही लिये बैठा है,
दूसरों की सुनकर ही दिन गुजारना पडता है कभी-कभी।
न जाने क्यों रिश्ते इतना करीब होने का दावा करते हैं,
फिर भी बिन कहे समझ जाते क्यों नही कभी-कभी।
कुछ कर्ज उतारने मे लगी है ऐसे जिन्दगी मेरी....
हर सांस घुटन के साथ आती हैं मुझमें कभी-कभी।
हर दर्द की दवा तो नही मिलती जमाने में,
दर्दों के सहारे ही जिन्दगी गुजारनी पडती है कभी-कभी।
हर रात आती है अंधेरा लेकर सुलाने के लिये......
पर रात गुजर जाती है बिना सोये ही कभी-कभी।
सोंचता हूँ थोडा खुदगर्ज बन जाऊँ और थाम लूँ इन सांसो को,
पर मर मर के जिन्दा रहना पडता है दूसरों के खातिर कभी-कभी।
राज कुमार सक्सेना
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश
ईमेल- saxenaraj252@gmail.com
परिवार, रिश्तों की नींव
परिवार जहां अपनों का साथ हो,
दूरियों में भी शामिल उनका एहसास हो,
ख्याल,फ़िक्र में लिपटा हुआ,
एक अनकही सी याद हो,
ज़िन्दगी परिवार से है,
अपनत्व,प्यार से है,
स्नेह के चादर तले,
प्रेम के व्यवहार से है,
पल भर में जो बंधन ना टूटे,
गलतफहमियों से साथ ना छूटे,
परिवार तो आंचल है ऐसा,
जो कभी अपनों को ना लूटे,,
दौलत की जहां अभिलाषा ना हो,
ईर्ष्या की कहीं आशा ना हो,
जो मिला संतुष्ट हो उसमे,
अपनों से कोई निराशा ना हो,
खुद से पहले कोई और हो प्यारा,
छोड़ दे जिनके लिए संसार सारा,
दुख में दुखी,सुख में सुखी,
बने जो नाव का सहारा,
जहां गलतियों पर डांट दे कोई,
दूजे ही पल प्यार दे कोई,
जहां अपनों की ख्वाहिशों को,
पल में ही समझ जाए कोई,
बेटी बहू का जहां मान हो,
दोनों का एक सम्मान हो,
जहां सास ममता उड़ेले,
बहू परिवार की जान हो,,
अपने पराए की ना बात हो,
सामान सबके जज्बात हो,
जहां दौलत बीच में आए ना,
मिल बांट कर सब साथ हो,
जहां सामंजस्य की डोर हो,
समर्पण हर ओर हो,
मुश्किलों से भी जीत जाएं,
चाहे अंधेरा घनघोर हो,
बंद आंखो से भी विश्वास हो,
कमियों में भी छाई एक आस हो,
हर मुकाम कर लूं हासिल,
जब परिवार ही हमारी सांस हो,
सही मार्ग पर चलना सिखाए,
गलतियों पर प्यार से समझाए,
आलोचनाओं को छोड़ मेरी,
कभी काबिलियत भी जताए,
जहां हंसी मजाक का सिलसिला हो,
मुस्कान से हर चेहरा खिला हो,
हर शाम गुलजार हो ऐसी,
जैसे बरसो बाद कोई मिला हो।
श्रुति श्रीवास्तव
मुम्बई
सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश (मूल निवास)
ईमेल-
shrutisrivastava045@gmail.com
तुम पारस मैं पाथर
तुम पारस मैं पाथर कान्हा, तुम अमृत मैं विष हूँ घाना,
ज्योति पुंज तुम, तम मैं पापी, दया का तेरे हूँ अभिलाषी।
सहस्त्र नाम धारी तुम पालक, तुच्छ अहंकारी मैं बालक।
हे! देवों के देव विधाता, मैं पतित, कुछ ज्ञान दो दाता।
न गीता में तुम हो कान्हा, न वेदों में तुमको पाना।
बंसी बजाते मुरली धर को, पा लूँ बस भोले गिरिधर को।
तुम तो हो बस दया के सागर, प्रेम से भर देते हो गागर।
मन ये शरण तुम्हारी चाहे, बनना प्रेम पुजारी चाहे।
जन्म मरण से मुक्ति क्योंकर, मुझसे कहो मैं कान्हा चाहूं,
बार बार तुमसे मिलने की, आस लिए घरती पर आऊं।
न तप और न पूज्य विधाएं, कहता जग तुझको यूं पाएँ,
मैं तो बस एक प्रेम ही जानू, चाहे तू आये न आये।
शब्द कोई भी, गीत तुम्हीं हो, राग हो कुछ, संगीत तुम्ही हो,
तुम हो प्रेम तुम्हीं अविनाशी, तुम्हीं सुदमाओ के साथी।
अब तक जीवन व्यर्थ गवांया, माया को ईश्वर सा पाया।
अब तो दया की आस जगी है, श्याम तुम्हारी प्यास जगी है।
यमुना के मनोहारी तट को, कैसे भूलूँ बंसी और नट को।
हे! राधा के श्याम सलोने, भक्ति दो मीरा दो होने।
हे! राधा के श्याम सलोने, भक्ति दो मीरा दो होने।
भक्ति दो मीरा दो होने। भक्ति दो मीरा दो होने।
विश्वनाथ "आनंद"
दिल्ली
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बहुत ही अच्छा अंक बहुत ही सराहनीय पहल
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