प्रतिध्वनि साहित्य समूह प्रतियोगिता "जून" प्रथम सप्ताह

प्रतिध्वनि साहित्य समूह प्रतियोगिता प्रथम सप्ताह 

दिवस:   शुक्रवार 

विधा:  लघुकथा 

विषय:   मुलाक़ात एक अजनबी  से 

_________________________________________________________________________________

1  

आत्मीय प्रेम की मिसाल


आत्मीय प्रेम की मिसाल-  दादी सास-पार्वती देवी जैसलमेरिया 

यह किसी विद्वान का उद्धृत नहीं है मेरा अनुभव है 'प्रेम पसंद नहीं है मेरे साथ घटित घटना जानिए-लेखन और कविता की शुरुआत से ही मेरे चाव के विषय थे लेकिन आम भारतीय नारी होने से अपनी रूचि को नियमित नहीं कर पाती थी! परिवार की  जिम्मेदारियों  में काफी समय निकल जाता था! शादी के बाद से मेरी दादी-सासुजी से मेरा एक आदर्श रिश्ता मात्र था जिम्मेदारियों  से समय निकाल जब मैंने अपना लेखन नियमित किया तो परिवार में सिर्फ उनका संबल और विश्वास मिला, पढ़े लिखे नहीं होने पर भी मेरे लेखन को बहुत रूचि से सुनती और बस सिर्फ सुनती ! ना जाने उनको सुनाते सुनाते ही मुझे मेरे लेखन को गुणित करने का सुझाव सूझ जाते ! सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता उनके साथ ! जैसे वो मेरी प्रेरणा बनी और शायद  शक्ति भी ! प्रेम में शक्ति मिलती भी तो है, लेखन में इतना आत्मविश्वास पहली बार महसूस हुआ और लेखन से पूर्ण संतुष्टि और सुकून भी ! मैं जेसे लिखती वैसे मन तृप्त होता ! दादीजी रोज पूछते आज क्या लिखा और मैं स्वत: ही लबों से कुछ सुनाती और पन्नों पर लिख जाती कुछ पत्रिकाओं में अपना लेखन  भेजा और पसंद किया गया लेखन चलता गया और एक संकलन आज पूरा हो गया !

क्षमताएँ तो सभी में होती है, पर उनके परिलक्षित होने में संयोग बनते है ! किसी लक्ष्य को अंतर्मन से चाहो तो संयोग भी घटित होते हैं ! इसीलिए मेरा मानना है पसंदीदा से प्रेम नहीं किया जा सकता बल्कि प्रेम होने पर कुछ पसंद बन जाती है !

लेखन के लिए मन को कुरदना पड़ता है विषयों की संजीदगी को  बाहर  लाना पड़ता है और सृजन की तड़पन में तड़पना पड़ता है !विचारों की ताज़गी गहरे और विविधता के लिए मन को स्वच्छ रखना चुनौतीपूर्ण लगता है ! भावनाओं में ईमानदारी रखने की पूरी कोशिश रखती हूँ ! जिन्दगी में नए भावों की सदैव तलाश करती हूँ !

एक दिन मुझे लगा जैसे दादी- सासु माँ मेरे कान में एक शेर सुना रही हो-

"जमीं दी है थोडा आसमान भी दे,

मेरे खुद होने का अहसास भी दे"!

मुझे मालूम था ये मेरा अहसास भर है ! अपने स्वाभिमान की एक तड़पन महसूस की मैंने उनमे एक व्यक्ति जो मेरे लिए ईश्वर सा या साधारण - सा भी नहीं ! मुझे लगा जो मेरे लिए इतना मायने रखता है शायद सभी के लिए भी होना चाहिए ...शायद  और कोई महसूस नहीं कर पाए ...या मेरी किस्मत अच्छी थी !


एक दिन दादी सासुजी जी ने अपने हाथ में थोडा पानी भरा और खुली मुट्ठी मेरे सामने रखकर कहा "देखो ये प्रेम है जब तक मैं ध्यान से मुट्ठी खुली और सीधी रखूंगी तब तक ये रहेगा और जैसे ही मैं पकड़ने की कोशिश करुँगी यह गिर जायेंगा !


लोग अक्सर प्रेम में यह गलती करते है ! वो प्रेम पर अपना अधिकार करने की कोशिश करते और प्रेम पानी की तरह छलक जाता है प्रेम अधिकार की वस्तु नहीं है प्रेम समर्पण का भाव है मैं तो जैसे उनकी बात सुनकर चोंक ही गई  कितनी सटीक और गहरी बात अशिक्षित होने के बावजूद कितने सरल तरीके से बता दी !उस दिन मुझे लगा उनमें देवत्व \ईश्वरीय जैसा लगा !


            एक घटना और भी हुई बातचीत -बातचीत में  जाति पर चर्चा हुई क्योंकि हम 'महाजन' वर्ग से थे और सभी प्राचीनकाल से ही इस वर्ग को शोषक मानते थे और मैं भी कुछ ऐसा ही मानती थी उन्होंने मेरी सोच को गलत बताते हुए कहा 'महाजन'से मतलब था उन महानजन से जो गरीब और जरूरतमंद वर्ग की हर संभव मदद किया करते थे शोषक नहीं थे वो समाज के पोषक थे !समाज में दुराचार बढ़ने से वर्ग के कुछ लोग ख़राब हुए और बदनाम हुआ पुरा वर्ग !


                        मेरे लिए ज्ञान की बातें थी !और मेरी सोच को विशुद्ध करने अवसर ..


                      सिर्फ प्रेम है  हमे और कुछ नहीं 


                      फ़िदा है हम एसा कुछ नहीं 


                     समर्पण जरुर है उससे कुछ कम नहीं 


                      जुदा कभी होंगे एसा कभी नहीं 


                   मुलाकात हो कोई जरुरी नहीं 


                  याद आये या नहीं हमरे बस में नहीं 


                            उनको देखकर इतना तो समझ में आ ही गया ज्ञान शिक्षा से नहीं मिलता ज्ञान और समझ सिखाने से नहीं आते ये तो अनुभव और समझ से ही आते है 


                          हर पल अब तो उनका अहसास और अनुभूति रहती है आज वो दुनियां में नही है पर ऐसा लगता है वे शक्ति और प्रेरणा रूप में मेरे साथ हर जगह चली आती है ।


                  जब तक ना हो प्रेम किसी से सुख दुःख का आभास नहीं मिलता।जहाँ हो दिल से प्रेम वहाँ दुःख भी मानो सुख सा ही लगता हैं ।"


.जहाँ "प्रेम" होता है, वहाँ "प्रेरणा" मिलती है,प्रेम" में लोभ की "प्रेरणा" नहीं मिलती है ।जिसके अंदर "प्रेरणा" का भाव है, उसी को "प्रेम" मिल सकता है .। संसार में "प्रेम" की ज्योति का दीपक जो हमें उत्तम प्रेरणा की और मार्गदर्शन कर हमारे जीवन को सार्थक करता है ।बिना जप तप किये  ना, प्रेरणा नहीं मिल सकती।अच्छी "प्रेरणा" प्रेम के बिना पूर्ण नहीं हो पाती।


मत करो अपवाद किसी से.मत करो शिकायत,


मत करो क्रोध किसी से ..मत हो नाराज तुम


.ये "प्रेरणा" हमें धरती पर "प्रेम" भरे स्वर्ग की ओर ले जाती है।


..यह जीवन प्रेम करने के लिए मिला है इसे आत्मीयता से  निभाएँ तभी भीतर से ज्ञान सुख दुःख की अनुभूति हो पाती है।


..बिना प्रेम के कुछ भी संभव नहीं होता ।


 प्रेरणा असीम बल है ।प्रेम" आत्मा से होता है, शरीर से नहीं । प्रेम" और संशय कभी साथ-साथ नहीं चलते ।प्रेम" का एक ही मूलमंत्र है और वह है सेवा एवं  त्याग।


प्रेम" का नाता संसार के सभी सम्बन्धों से पवित्र और श्रेष्ठ है।


"सच्चा" प्रेम स्तुति से प्रकट नहीं होता, "सेवा और त्याग" से प्रकट होता है। इससे बड़ी "प्रेरणा" हमारे लिए और क्या हो सकती है  कि हम इसे अनुभव कर सके।


"प्रेम".. और .."प्रेरणा"से जीवन में  होता मधुरतम अहसास।


जब तक ना हो प्रेम नहीं होता प्रेरणा का आभास।।



स्वाति'सरु'जैसलमेरिया

जोधपुर(राजस्थान)


अजनबी देवपुरुष



"जीवन एक यात्रा है,निरन्तर चलते रहना ही जीवन है।इस यात्रा के तीन मुख्य सोपान हैं;प्रारम्भ, मध्य, अन्त।

अपरिचित से परिचय के साथ ही जीवन का प्रथम सोपान प्रराम्भ होता है।बचपन में बहुत से अजनबियों से हमारा मिलन होता है; जो हमजोली बनकर हमारे जीवन को आनन्द से सराबोर करते हैं।हमारा बाल मन भी हर अजनबी से एक मुलाकात के लिए व्याकुल रहता है।हम उम्र वालों से मिलने का सुख कुछ अलग ही होता है।बचपन में जिन अजान व्यक्तियों से हमारा सम्पर्क होता है,उनका स्मरण सदैव रहता है।जीवनपर्यंत उनकी मीठी यादों के पंख लगाकर सपनों की दुनिया में उमुक्त उड़ते है,जहाँ किसी भी प्रकार के बन्धन का अहसास नहीं होता है। 

जानकारी के अभाव में कभी अपने भी अजनबी थे।इसका अनुताप हमें अनुभव नहीं होता है।लेकिन जब कुछ अपने अकारण ही अजनबी जैसा व्यवहार करते हैं ;संकुचित स्वार्थ के कारण अपनो का अजनबी होना मन को पीड़ा देता है।

यह जीवन अजनबी और करीबी का अनोखा खेल है।किसी करीबी का रुठकर अजनबी होना बहुत ही दुखद है।किशोरावस्था जीवन की भागमभाग का होता है,इस दौरान जो अजनबी मिले वे कोई न कोई हेतु से मिले।कई अजनबी अपने बने और फिर बिछड़ गए।इसका हमें कुछ पल लिए गम भी  होता है। उस समय हम बाल्यकाल में जिसने मुलाकात हुई ,उन्हें याद करके अपने दुःखी मन को संबल देते हैं।

युवावस्था में अजनबियों का मेला सा प्रतीत होता है।इस भीड़ में हम कहीं खो न जाएँ,इसी भय से अंगूली पकड़कर रखने वाले ,अपनों इस बन्धन से मुक्त होकर अजनबियों में खोना चाहते हैं।ऐसा आनन्द देने वाला संयोग सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी आता है।मेरे जीवन में भी आया, मैं अपनी एम.ए. की क्लास समाप्ति के बाद विश्वविद्यालय से घर लौट रहा था।रास्ते में देखा -मेरे लिए प्रोफेसर डॉ. पूर्णदासजी रुके, कहा- "बस पढ़ाई में ही ध्यान देना, कोई समस्या हो तो मेरे से सम्पर्क कर लेना।"  उनका यह कथन मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ,मुझे उस क्षण एक नवीन ऊर्जा की अनुभूति हुई।जीवन में सफलता प्राप्त हुई, परम श्रद्धेय गुरुदेव के आशीर्वाद से शिक्षा विभाग में उच्च पद पर नियुक्ति मिली ,हर उपलब्धि का पूरा श्रेय उनको ही है। देवपुरुष की इस भेंट को मैं अपने जीवन की सबसे विलक्षण धरोहर अनुभव करता हूँ,जिसे आजीवन हृदय में श्रद्धा भाव से चिरस्थायी रखूँगा।



किशनलाल जांगिड़

जोधपुर(राजस्थान)



3

आनंदी


 पहली मुलाकात हो और वो अजनबी भी तो कई रंग देखने को मिलते है और कई नए अनुभव ज़िन्दगी को मिलते है अरे अजीब नही लगता सुनने में मगर सच भी यही है पहली मुलाकात हो और वो अजनबी भी तो कई रंग देखने को मिलते है और   कई नए अनुभव ज़िन्दगी को मिलते है । यह अनचाही मुलाकात किसी सफ़र के दौरान हो सकती है या किसी राह में पैदल चलते चलते अथवा किसी समारोह में भी।

जब से यह पढ़ा मन मुझे कुछ वर्ष पीछे ले गया ।

 साँझ होने को थी और मौसम।भी करवट बदल रहा था मैं खिड़की  से देखता हुआ फटाफट अपनी टेबल का कार्य समाप्त कर शशि को ध्यान से ऑफिस बन्द करने का बोल चल दिया।

बस स्टॉप पर मैं अकेला ही था अगली बस आने में अभी 10 मिनट का समय था । कुछ ही समय मे एक दो यात्री और आ गए एक अधेड़ युगल और एक युवती शायद किसी ऑफिस में काम करती थी।

बस आ गई वो युगल वहीं खड़ा रहा मगर वह युवती और मैं  बस में चढ़ गए इधर उधर देखा एक सीट खाली थी और युवती खड़ी रही । तभी कंडक्टर आया और उस युवती को बोला दो कदम चल कर अपनी दाँयी और बैठ जाओ तब मुझे समझ आया 

वो देख नहीं सकती थी।

मैं अपने स्टाप के इंतज़ार में खड़ा रहा और रह रह कर नज़र उसकी और चली जाती थी। गौर से देखने पर महसूस हुआ वो एक 27 28 साल की रही होगी सलीक़े से साधारण वस्त्रो में संवरी हुई चेहरे पर एक अनोखा आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था।

मेरा स्टाप आ गया और मैं उसको ख़यालो में लिए धीरे धीरे कदम।बढ़ाता अपने घर चला आया।

आज रविवार की वजह से मैं घर पर ही था तभी दरवाज़े पर घंटी बजी इंदु ने दरवाजा खोला और किसी से बतियाते हुए अंदर ले आई मैंने देखा अरे यह तो वही कल वाली लड़की है।

इंदु मेरी पत्नी ने मेरी।मुलाकात उस से ये कह कर करवाई सुनो जी ये आनंदी है अपने बच्चों की नई संगीत टीचर यह सुन कर मैं चौंक गया मुझे लगा ये कैसे और क्या सिखाएगी खैर मैने नमस्कार कर उन्हें आसान ग्रहण करने का आग्रह किया तब तक इंदु बच्चों को बुला लाई।

मै अपने कमरे में आ गया और उघर बच्चों की क्लास शुरू हो गई बांसुरी की मधुर  तान ने मन मोह लिया।

मेरा रोज़ का रूटीन वही आफिस आना जाना नज़रे ना जाने क्यों बस स्टॉप पर उस को खोजती थी क्यूं की बस  एक रविवार वो अाई और अगले सप्ताह मै आफिस कार्य से दिल्ली चला गया फिर हर रविवार इंतजार रहा, किन्तु वो ना घर अाई ना ही बस स्टॉप पर दिखी।

आज अचानक आफिस में शशि मिठाई ले कर अाई और बोली बाबू जी मुंह मीठा करिए मेरी बहन का आज पहला कार्यक्रम है रेडियो पर और उसने अपने मोबाइल से रेडियो चला दिया और मेरे कानो में गूंजने लगी वही सुरीली बांसुरी की तान...

मैंने झट से शशि से पूछा तुम्हारी बहन का नाम आनंदी तो नहीं...

उसने कहा हां बाबू जी आनंदी ही है  । मै बहुत खुश हुआ और घर जा कर इंदु को सब बताया ।

अब आप कहेंगे इस कथा का सार क्या इस में अनोखा क्या एक सामान्य सी घटना है मगर नहीं ऐसा नहीं है । अगले सप्ताह रविवार के दिन आनंदी और शशि दोनों मेरे घर आए और इंदु को धन्यवाद कहने क्यूं किं इंदु ने पहले दिन ही आनंदी के बांसुरी वादन को रिकॉर्ड के अपने भाई जो विविध भारती में कार्य करता है उसे भेज दिया और उन्होंने संपर्क कर आनंदी कि कला को एक नई पहचान दी। आनंदी के चेहरे का वो आत्मविश्वास की कमी खुद में नहीं देखने वाले की नजर और नीयत में होती है आप में हिम्मत और जज्बा है तो आप की पहचान अलग है। मेरी नज़र ने आनंदी में ना देख पाने की कमी देखी और मेरी पत्नी ने उसका हुनर और आत्मविश्वास देखा।। 

सार- कमी देखने वालों की नजर में होती है


स्नेहदिल नरेश चावला

जोधपुर (राजस्थान)



4  श्रेष्ठ    

धोखा


 रचना:-फर्स्ट क्लास के कूपे में एक स्मार्ट युवक तथा समाने वाली सीट पर एक बेहद आकर्षक युवती सफर कर रहे थे।युवती को देकर युवक के दिल ने अपने आप से कहा-"आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आये तो बात बन जाएँ।" पर दोनों मौन थे।थोड़ी देर बाद युवती ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा -"मि.आप कहाँ जा रहे हैं?

क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ।

 युवक ने तपाक से जवाब दिया कि मैं कुमार हूँ, तथा बैंगलोर जा रहा हूँ।

क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?

सफर में आप कहाँ तक साथ रहोगी?

 युवती ने मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया कि वह भी बैंगलोर जा रही है।

तथा उसका नाम सोनिया है।थोड़ी देर बाद दोनों काफी घुलमिल गये।बातों ही बातों में सोनिया को पता चला कि कुमार को ज्योतिष और हस्त-रेखा का ज्ञान है, तो  उसने अपना हाथ कुमार को भविष्य बताने के लिए दिखाया।कुमार ने सोनिया के हाथ को आपने हाथ में लिया तो कोमलता और सुन्दरता में इतना खो गया कि सोनिया को ही याद दिलाना पड़ा कि हाथ की रेखाएँ देखने के लिए हाथ को आपके हाथ में दिया है।न कि उम्र भर के लिए।"

 कुमार ने बहुत सारी बातें हाथ की रेखाओं को देखकर बताई और सोनिया ने उसका समर्थन किया।

  बातों ही बातों में दोनों को एक बात और पता चली कि दोनों की पसन्द लगभग समान है।जैसे दोनों को काले रंग का लिबास पसन्द है,दोनों रे-बेन चश्में के शौकीन है और दोनों के सूटकेश भी एक समान है।

    रेलगाड़ी जब बैंगलोर पहुँची तो दोनों साथ साथ उतरे तथा बाँय बाँय के साथ जुदा हो गए। स्टेशन के बाहर जब कुमार पहुँचा तो यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि सोनिया उसका वहाँ इन्तजार कर रही थी।सोनिया तपाक से कुमार के पास आई और बोली-"जल्दी जल्दी में सूटकेश बदल गया है,आपके हाथ में मेरा सूटकेश है,कृपया इसे बदल लें।" कुमार ने ध्यान से देखा तो उसे अपनी गलती का अहसास हो गया, और दोनों ने सूटकेस का आदान प्रदान कर लिया।अगले दिन सुबह जब कुमार ने अखबार पढ़ने के लिए खोला तो सोनिया की फोटो मुखपृष्ठ पर देखकर पहले प्यार से दिल धड़का और फिर घबराहट से।फोटो के पास खबर.छपी थी।" लड़की के सूटकेस से दो करोड़ की.हेरोइन बरामद"


सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार गौड़

बालोतरा (राजस्थान)


5

मुलाकात एक अजनबी से


बड़ा आभास छोटा स्पर्श अपने में मस्त । ट्रेन के कम्पाटमेंट में खेल रहा था । कुमुद बहुत उदास थी । भेलूर इलाज के लिए जा रही थी , यह बात बातचीत  के दौरान वह बोल गईं । स्पर्श को ब्लड कैंसर है ।उनके पति वहीं पर उन्हें डाँटने लगे । वो सुबकने लगी ?  पता नहीं कब तक देख सकूंगी इसे। ऐसे मत बोला करें ।बार बार आँखें भर जाती थी उनकी । ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी थी । सुधीर चुपचाप नीचे उतर गए थे । अचानक पाँच मिनट में ही ट्रेन खुल गई । सुधीर दौड़ते हुए ट्रेन में घुसे । मुझे व्याकुल देखकर सामने बर्थ पर बैठी महिला ने कहा कि यहाँ ट्रेन पाँच मिनट ही रुकती है । अब आगे शाम तक ट्रेन कहीं नहीं रुकेगी । कुछ खाने का सामान क्यूँ नहीं मंगवा लिया । कुमुद ने सुधीर से पूछा । कुछ लाएं हैं जी । बच्चों को भूख लगी है । तभी आभास बोल पड़ा पापा आप तो पूरी सब्जी खा रहे थे । हमलोग के लिए नहीं लाएं ? सुधीर ने कहा कि सब समाप्त हो गया था । मैं ‌बस छः पूरी खाया । कुमुद ने कहा तो केला ही ले लेते । 


                       सुधीर खामोशी से उपर वाले बर्थ पर सो गए । फल नहीं खरीद पाएं थे । तभी सामने बर्थ पर बैठे महिला और उनके बेटे बहू से परिचय हुआ । माला जोशी स्कूल टीचर थीं । बेटे बहू को लेकर तिरुपति बालाजी जा रही थी । कुमुद आभास और स्पर्श  का भूख से बुरा हाल था ।साथ का खाना कल ही समाप्त हो चुका था ।


                  माला जोशी जी  दोपहर का खाना खाने की तैयारी में जुट गई । पिछले स्टेशन पर उनके एक परिचित काफी भोजन पहुँचा गए थे । इडली सांभर चटनी पूरी सब्जी भुजिया अंचार मीठा वगैरह । माला जी आधा भोजन लौटा रहीं थीं । लेकिन वो लोग वापिस नहीं ले गए । बोले इस ट्रेन में कल शाम तक किसी स्टेशन पर खाना नहीं मिलेगा । यह लगभग 1993 जून की बात थी । आपके कम्पाटमेंट में दो दो बच्चे और महिला हैं । बहुत काम आएगा । अपना पूराना अनुभव है । यह ट्रेन हमेशा लेट हो जाती है और कहीं कुछ नहीं मिलता है । सुधीर जी उपर गहरी नींद सो चुके थे । सुबह में भी बच्चों को सिर्फ डाभ पिलाया था और कुमुद ने दो बिस्कीट और चाय पिया था । माला जी देख रहीं थीं और बीच-बीच में बात भी करतीं जा रही थी कि कुमुद आभास और स्पर्श भूख से व्याकुल हैं ।


                दोनों अजनबी परिवार । और जीवन साथी चैन की नींद सो रहा था । कैंसर पीड़ित बच्चा माँ से खाना माँग रहा था । सभ्य मध्यमवर्गीय परिवार की गृहणी किसी से भोजन कैसे माँगे ? मैं चुपचाप सब देख रही थी । आभास ने पूछा माँ पैसे हैं । माँ --- नहीं बेटा ! पापा के पास है । ओह तो पर्स भी‌ खाली । बड़ी विकट स्थिति थी । मेरे पास सिर्फ अपने भर भोजन था । और बीच में अजनबीपन और सन्नाटा ।


              कुमुद की आँखें छलछला आईं थीं । साड़ी के पल्लू से वो आँखें पोंछ रहीं थीं । स्पर्श बार बार ‌माला जोशी जी के तरफ ललचाई नज़रों से देख रहा था और कुमुद नयनों के इशारे से मना कर रही थी । मैं ने देखा , बच्चों को लेकर कुमुद गेट के पास चली गई । इधर जोशी परिवार भोजन निकाल तो लिया था लेकिन खाना शुरू नहीं किया था । कुमुद पंद्रह मिनट बाद लौटी । बच्चों को समझा लाईं थी । अरे यह क्या एक प्लेट में आठ इडली और चटनी माला जी ने कुमुद जी को पकड़ाया । कहा आप किधर चली गई थी देखिए हम लोग आपका ही इंतजार कर रहे हैं । आप लोग भूखें रहेंगे और हम लोग खाना खा लेंगे ?  ऐसा नहीं होगा । खाना ऐसे भी ज्यादा है शायद ईश्वर ने आप सबके हिस्से का भी भेजा है । खानें में कोई नशीली दवा नहीं है । आप इलाज के लिए जा रही हैं । इंसानियत भी कोई खास संज्ञान है ।यह तो पता है न । कुमुद धर्म संकट में कुछ बोल नहीं पा रही थी । आभास और स्पर्श इडली लेकर खाने लगे थे ।

  

                माला जी ने सुधीर जी को भी नीचे बुलाकर खाना खिलाया । कुमुद का इडली उसके आँसूओं से खारा होता जा रहा था ।



प्रतिभा प्रसाद कुमकुम 

जमशेदपुर, झारखंड ।


6


कैडेट के जीवन के कुछ पल  


मेरा पहला एनसीसी का कैंप बहुत ही यादगार एवं  मनोरंजक था कैंप के पहले दिन मन में शंका भी घबराहट थी |रास्ते में जाते जाते कैंप नजदीक और घर दूर होता जा रहा था| ऐसा लग रहा था कि कुछ  पीछे छूटता जा रहा था  मन में भावुकता का संचार हो रहा था |पहली बार परिवार से दूर वह भी 10 दिन के लिए अलग जगह पर रहना था सुबह का वक्त था जब कैंप पहुंचना था वहां पहुंचते ही अपना नाम  लिखवाना था कि कौन आया है और कौन नहीं आया है |पहले दिन मौसम में भी उदासी प्रतीत हो रही थी वह दिन तो काटे नहीं कट रहा था बस लग रहा था  जल्द से जल्द यहां दिन बीत जाए उत्साह सिर्फ यही था कि यहां 10 दिन आराम से और  जल्दी व्यतीत  हो जाए दूसरे दिन कैंप में अनुशासन से ही कार्य हो रहा था समय पर उठना समय पर सोना सुबह व्यायाम करना फिर वर्दी पहन कर तैयार होना यह हर रोज  करना आदत सी बन गई थी और अपने बर्तन में खाना लेना और अपने बर्तन खुद धोना हर काम के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता था रोज नए-नए प्रकार के व्यंजन मिलते थे कभी अपनी मनपसंद का व्यंजन मिल जाना यह कभी ना मिलना  वहां जाकर समय का महत्व एकता अनुशासन आदि गुण सीखने को मिले कभी-कभी मौसम बहुत हरा-भरा और बारिश आने को हो जाती थी जिससे तापमान में गिरावट के कारण ठंड लगने लगती थी एक ही कमरे में ही सब बच्चों को मिलकर रहना पड़ता था एक कमरे में थोड़ी थोड़ी जगह सभी को बराबर दी गई थी और कम से कम 40 से 50 बच्चे इस में रहते थे  कैंप में सीनियर का प्यार मिला 1 दिन सभी बच्चों को (.22) राइफल को खोलना एवं बंद करना सिखाया गया अगले दिन मैप रीडिंग क्लास में मैप से संबंधित बातों के बारे में बताया गया सभी दिशाओं के बारे में सिखाया गया कि किस दिशा का पता कैसे चलता है 1 दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया जिसमें गायन नृत्य जैसी कलाओं का प्रदर्शन किया गया जिसमें बच्चों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और कमला नेहरू कॉलेज के एनसीसी कैडेट्स को श्रेष्ठ नित्य का पुरस्कार मिला  और प्रशंसा भी  जब कैंप के आखिरी दिन आने में 1 या 2 दिन बचे थे तो मन में मायूसी थी कि अब घर जाने की बेचैनी नहीं थी बल्कि कैंप में रुकने का मन कर रहा था घर की याद तो आती थी पर अब लग रहा था कि आखरी दिन ना आए और घर ना जाना पड़े पर आखिरी दिन आ ही गया और सभी को एनसीसी सर्टिफिकेट देकर क्लोजिंग सेरेमनी की गई सभी को आशीर्वाद और प्रेम के साथ शिक्षा भी मिली कि आने वाले भविष्य में मेहनत से ही जीवन खुशहाल होगा |


पूजा सैनी

नई दिल्ली 



7

अधुरा प्रेम-विदेशिनी

              आज से कई साल पहले की बात है। मैं कलकत्ता से पश्चिम बंगाल के ही नदिया जिले में इस्कॉन मंदिर देखने गया था। दिन भर नदी के उस पार गौरांग महाप्रभु की लीला भूमि,अनेको मंदिर देखने के बाद शाम को इस्कॉन मंदिर में आरती देखने के लिए फिर नदी के इस पार आ गया जब आरती देखने के लिए भीड़ इकट्ठी होने लगी तो  मैं भी उसमें शामिल हो गया। कमाल की आरती होती है वहाँ पर ।

              विदेशी स्त्री पुरूष जब आरती की धुन पर नाचने लगते है मन कृष्ण भक्ति में डूब जाता है। सभी भक्त अनायास ही झुमने लग जाते हैं।

               मैं चुपचाप खड़ा आरती का आनंद ले रहा था। अचानक एक विदेशी लड़की जो पास में ही नृत्य कर रही थी बोली-"सर आइये आप भी नृत्य कीजिये। आरती में शामिल होइए।"

        मैं अवाक उसकी तरफ देखता रह गया। एक विदेशी लड़की इतनी अच्छी हिंदी बोल रही है। फिर मैं बोला-"मुझे नाचना नहीं आता है। मैं आपके नृत्य का ही आनंद ले रहा हूँ।"

वो फिर बोली -"आप तो हिंदुस्तानी है आप लोग तो कृष्ण के भक्त होते हैं।और ये तो नृत्य नहीं भक्ति में लीन होने का तरीका है।"

              मैं झेंप सा गया। "ओके फिर बात करते हैं।" कहकर वह भक्ति में लीन हो गई।

               अब तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं कि एक विदेशिनी मुझसे बात करेगी। और जैसा कि अक्सर होता है किसी लड़के लड़की की पहली मुलाकात में दोनों को कुछ होने लगता है। ये बात यहाँ पर भी लसगु हुई। मेरे मन के किसी कोने में बसा प्यार का बीज अंकुरित होने लगा। अब मैं सोचने लगा जल्दी से आरती खत्म हो और उस विदेशिनी से बातचीत आरंभ हो।

                 लेकिन आरती तो अपने समय पर ही खत्म होगी। मेरी बेचैनी से आरती करने वालों को क्या मतलब। खैर आरती अपने समय पर खत्म हुई। मेरी नज़र तो उस विदेशिनी पर थी।

             अपने कहे अनुसार वह मेरे पास आई और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। दोनों के परिचय का आदान प्रदान हुआ। वो लड़की मॉरीशस से आई थी और उसका नाम था बबिता । अब मुझे एक विदेशिनी का हिन्दी भाषी होने का मतलब समझ में आया। मॉरिशस में हिन्दी अच्छी बोली जाती है।

        बातें बहुत सारी हुई। मुझे रात में वहीं रुक जाना पड़ा। उस दिन वापस घर आना सम्भव नहीं था।आप लोगों की जानकारी के लिए बतला दूँ मंदिर में और उसके आसपास रुकने की व्यवस्था है। 

             दूसरे दिन हम फिर मिले और ढ़ेर सारी बातें हुईं। यहाँ उन सबका जिक्र ठीक नहीं कहानी बहुत लंबी हो जाएगी। वो कई दिनों से वहाँ आई हुई थी, उसी दिन उसे लौटना था। मैं भी शाम को घर चला आया।

पत्रचार के लिए हम दोनों एक दूसरे का पता ले लिए थे।

          बहुत दिनों तक पत्राचार होता रहा। यहाँ कहने की जरूरत नहीं कि हम दोनों प्यार के बंधन में बंध गए थे।

एक दिन उसका एक पत्र आया उसमें वो लिखी थी।"मैं आपसे दो पुत्र चाहती हूँ।"

             मैंने लिखा -"पुत्र या पुत्री होना क्या हमारे तुम्हारे बस में है या किसी भी मनुष्य के बस में है।"

वो लिखी-"ये मुझ पर छोड़ दीजिए।"

यहाँ पर ये बताना जरूरी है कि वो मुझसे कई बार ज्योतिष संबंधित किताबें मंगवा चुकी थी। एक किताब का नाम याद आ रहा है नारायण दत्त श्रीमाली की कोई पुस्तक थी।  बाकी का याद नहीं।

                  फिर शादी की बात चली

और मुझसे यहीं पर गलती हो गई।हमारी बातों से एक दूसरे को पता चल गया था कि हम अपने-अपने देश को बहुत प्यार करते हैं।

                  इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने पत्र में लिख दिया कि "तुम मॉरीशस नहीं छोड़ सकती और मैं भारत नहीं छोड़ सकता।"

                  ये बात लिखने का मेरा उद्देश्य ये था कि वही कहे कि छः मास हम मॉरीशस में रहेंगे और छः मास भारत में। 

                 इसके बाद उसने पत्र देना ही बंद कर दिया। मैंने बहुत सारे पत्र लिखे पर कोई उत्तर नहीं।मैं इंतजार करता रहा ,इंतजार करता रहा। अपनी भूल पर पछताता रहा और आज भी पछता रहा हूँ।

         जब भी मॉरीशस की बात चलती है पेपर में टी वी पर या कहीं बबिता नाम पढ़ने सुनने में आता है दिल जार-जार रोता है। दिल जार-जार रोता है। बबिता बबिता करता है बबिता करता हैं।


दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश" 

कलकत्ता




8

अजनबी


महान कहानी लेखक ईशप महीने के आठ दिन नई जगह और अजनबी लोगों के बीच रहते और बाकी दिन लेखनी में दिन-रात रत रहते ।


आठ दिन अजनबी पुरुषों से मिलते उनकी संस्कृति समझते , उनके साथ अनजान बनकर उनका संस्मरण सुनते और पूरा समय व्यतीत करते ।


उनके अनुयायियों ने समय की दुहाई देते हुए कहा आप बाईस दिन अथक लेखन करते हैं तनिक भी आराम नहीं करते और आठ दिन पूरा बर्बाद कर देते हैं  ।


 ईसप ने कहा इसके दो कारण है नए लोगों से मिलता हूँ , समय बिताता हूँ, जिससे दिमाग को नई पोषण और नई ऊर्जा मिलती है । कहानियों को नई दिशा और नवीनता प्राप्त होती है ।  उन्होंने हँसते हुए कहा दिमाग को जंग भी नहीं लगता।


दूसरी गंभीर और तनावग्रस्त दिनचर्या से मुक्ति मिल जाती है । मानव मस्तिक एक धनुष की प्रत्यंचा के समान है अगर सदा खींची जाएगी तो टूट जाएगी ।


हँसना- हँसाना ,रिश्ते बनाना बहुत आवश्यक है ।


जिंदगी में नवीनता रहनी चाहिए जो मुझे अजनबी लोगों के साथ हिल- मिलकर सुलभता से प्राप्त हो जाती है।


अंशु प्रिया अग्रवाल 

मस्कट ओमान 


9


जिम्मेदारी

 

      बात उस समय की है जब मेरे पिता जी बहुत बीमार थे और वो कानपुर के हॉस्पिटल में आई.सी.यू में भर्ती थे, पिता जी भर्ती हुए करीब 20 दिन हो गए थे। यूं रोज़ ही आई. सी यू. में कोई न कोई मरीज भर्ती होते कोई ठीक हो जाते तो किसी के परिवार वाले किसी अपने को बचा नही पाते और रोते बिलखते वहाँ से चले जाते, इन दिनों की सारी बातें समय के साथ धुंधली होती गयी लेकिन एक रात की घटना जिस को मैं शायद कभी नहीं भूल पाऊँगी। 

   दिसम्बर की रात थी ठण्ड का कहर जारी था, तभी लगभग 7 बजे एक पंद्रह सोलह साल का लड़का हॉस्पिटल में दाखिल होता है, उसके साथ उसकी माँ और छोटा भाई था ,उसके पिता जी बीमार थे उनको i.c.u. में भर्ती किया गया, माँ और भाई को उसने  i.c.u के बाहर बेंच में बैठा दिया, मैं भी वही बैठी थी, पिता को अडमिट कराने के बाद वो माँ के पास बैठ गया, मेरे पूँछने पर उसने बताया कि पिताजी बहुत बीमार है इलाहाबाद में पांच दिन से अडमिट थे आज वहाँ जवाब दे दिया तो मैं उसको यहाँ ले आया हूँ, घर पर 1 छोटी बहन भी है। मैं ही घर में सबसे बड़ा हूँ पिता जी को मैं कुछ नहीं होने दूंगा, हम लोगो ने उसको सांत्वना दी,पर उस लड़के को किसी तरह चैन नही आता था, वो पल भर में माँ और भाई को समझाता और दूसरे पल i.c.u में जाकर अपने पिता को देखता। 

  लेकिन भाग्य के आगे किसी की नही चलती, चार- से पांच घण्टे के अंदर ही डॉक्टर ने उस लड़के को बुलाया और बताया कि तुम्हारे पिता जी नही रहे। 

     यह खबर सुनते ही वो अपनी सुध बुध खो बैठा , वो एक उम्मीद लिए बैठा था कि उसके पिता जी ठीक हो कर उसके साथ घर जायेंगे और फिर सारा परिवार हंसी खुशी से बैठ कर बातें करेंगे, पर विधि के विधान को आज तक कोई नहीं बदल सका।

     पांच मिनट शून्य स्थिति में रहने के बाद उसे बाहर बैठे अपने भाई और माँ की का ख्याल आता है कि उनको भी सम्भलना उसकी जिम्मेदारी है और वो दौड कर माँ भाई के पास आता है और कहता है, मम्मी ये हॉस्पिटल अच्छा नही यहाँ कोई काम ठीक से नहीं हो रहा हम अपने पापा को लेकर लखनऊ चलेंगे वहाँ किसी बड़े हॉस्पिटल में एडमिट करायेंगे, पापा बिल्कुल ठीक हो जायेंगे तुम लोग नीचे बाहर जा कर आगे एंबुलेंस में बैठो, मैं पापा की देख रेख के लिए पीछे रहूँगा, इतना कहकर वो फिर अपने पापा की तरफ भागता है और ऐसा लगता है जैसे अपने पापा से कह रहा हो मम्मी ठीक है आप परेशान नही मैं सब संभाल लूँगा, फिर वो खुद को नही संभाल पाता और वहीं एक दीवार के खम्भे से लिपट कर रोने लगता है कि मैं कैसे संभालू अभी मेरी उम्र खेलने की है पढ़ने की है।         

       माँ भाई आँसू न देख लें इस वक्त उसको वो दीवार ही साथी दिख रही थी जिस पर वो लिपट कर रो रहा था, हम पति पत्नी से उसका रोना नही देखा जा रहा था , मेरे पति उसके पास गए और जैसे ही उसके कंधे में हाँथ रखा वो उनसे लिपट गया उस वक़्त ऐसा लग रहा था वो कोई अजनबी नही बस अपना है कैसे उसके दर्द को कम कर दें, कुछ देर बाद उसने फिर अपने को संभाला और हम सब ने मिलकर उसके पापा को एंबुलेंस तक पहुंचाया, आगे छोटा भाई और माँ इस खबर से बेखबर बैठे थे। वो अपने पापा के पैरों के पास अपनी माँ से आँसू छिपाता हुआ अपने घर की तरफ चल दिया, वो लड़का यूँ तो मेरे लिए बिल्कुल अंजान था, लेकिन इस उम्र वो किस तरह अपने बड़े होने जिम्मेदारी निभा रहा था वो मैं आज तक नही भूल पाई और आज भी वो घटना मुझको रुला देती है कि सच में पुरुष में ऊपर वाले ने बहुत शक्ति दी है, औरत तो रो लेती है पर पुरुष अपने दर्द में रो भी नही सकते सबकुछ सहते हुए सिर्फ अपनी जिमेदारी निभाते हैं। 



            शहनाज़ बानो

             चित्रकूट उ. प्र.



10

 मुलाकात बनी दोस्ती


     स्टेशन पर चारों ओर भीड़ और चहल पहल ,सभी अपनी अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे,स्टेशन पर गोआ जाने के 35 लोगो का टूर गोआ जाने के लिए बड़े ही उत्साह से गाड़ी का इंतजार कर रहे थे।गाड़ी आने ही वाली थी।चाय वाला चाय के लिए आवाज लगा रहा था,भजिया समोसा सब कुछ।

     हमारे सभी साथी अलग अलग डिब्बों में चढ़ गए क्योंकि सब की अलग अलग सीट रिजर्व थी।

    हमारे एक साथी का परिवार  जिनका 6 बर्ष बच्चा हाइपरऑटिज्म का रोगी था,अपनी ही दुनियाँ में मस्त किसी से इंटरेक्ट नहीं करता था।

गाड़ी अपनी स्पीड में दौड़ रही थी,तब तक हमारी साथ में सफर कर रही एक फैमिली से बातों ही बातों में अच्छी दोस्ती हो गयी,बच्चा भी उनके परिवार से घुलमिल गया। उस परिवार को शिरडी उतरना था,स्टेशन आने ही वाला था।गाड़ी रुकी,अफरा तफरी में उस फैमिली के साथ उनका  6 बर्षीय बेटा भी उतर गया। गाड़ी चलने लगी 200/300मीटर आगे जाने के बाद उनको बच्चे का ध्यान आया।सारी गाड़ी में अफरा तफरी मच गई ,तभी उनका  फ़ोन आया आपका बच्चा हमारे साथ स्टेशन पर उतर गया था,हम स्टेशन मास्टर के रूम में आपका इंतजार कर रहे हैं अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही हम दूसरी ट्रेन पकड़कर वापस शिरडी स्टेशन पहुँचे वह परिवार अपनी शिरडी दर्शन को छोड़ बच्चे के साथ खेल रहे थे,उसका पूरा ध्यान रख रहे थे।वो अजनबी हमारे लिए सारे रिश्तों से ऊपर दोस्त बन चुके थे।आज  वो अजनबी  से मुलाकात एक गहरे दोस्ती के रिश्ते में बदल चुका है।



       गीतांजली वार्ष्णेय



11

मनमीत अजनबी


   ग्रीष्म के दिनों में काँलेज के स्टुडेंट लैंस के समय अक्सर वृक्षो की छाँव में बैठते थे। काँलेज के बहुत बड़े ग्राउंड में हरे भरे पौधों की कमी नहीं। सभी दोस्त एक दुसरे की बांहो में हाथ रखते हुए शीतल हवा का आनन्द लेते दिखते। आलोक काँलेज के प्रथम वर्ष का छात्र है इसलिए वह अभी नए नए दोस्त बनाने में व्यस्त है। 

        काँलेज की माँर्निग में आलोक आजकल सबको गुडमोर्निंग बोलता है, उसको जवाब में अनेक हाय - हेल्लो मिलते है। काँलेज के लेक्चरर खत्म होने के बाद भी आलोक सभी मित्रों के साथ घर जाना ठीक समझता है। 

      हर रोज की भांति आज भी तीन लेक्चरर पूरे होने के बाद सभी स्टुडेंट लैंस का आनन्द  उठाने आ गए। सब अपने मन की धुन में व्यस्त है। आलोक आज अपने साथियों के साथ जाने की बजाय क्लास में अपनी पुस्तकों को इधर-उधर कर रहा था, शायद उसको कोई बुक मिल नहीं रही है। तभी आलोक की बैंस पर प्रियंका आकर बैठती है और आलोक से हाय करती है। आलोक ने जवाब में धीरे से मुस्कुराया और फिर अपने बैग को टटोलने लगा।

    प्रियंका नया लोक से पूछा कि "क्या ढूंढ रहे हो, और बहुत मुसीबत में नजर आते हो?" 

    आलोक ने हंसकर टालने की कोशिश की "कि कुछ नहीं वो....... "

   लेकिन पास बैठी प्रियंका ने अपने प्रश्नों को बयां किया कि 

     "वो , क्या वो ?कुछ मिल नहीं रहा है ?"

    आलोक -  "हाँ एक पुस्तक थी  लेकिन पता नहीं कल से मुझे नहीं मिल रही"

      प्रियंका हमेशा मस्ती के धुन में रहने वाली लड़की थी, जो हर किसी से मजाक कर लेती थी कुछ ऐसा आलोक के साथ किया जिससे आलोक अनभिज्ञ है। आलोक अपने बैग को पटक कर बाहर जाने लगा तभी प्रियंका ने आलोक के सामने पुस्तक रख दी।

     आलोक कुछ कहता उससे पहले प्रियंका बोली "हैलो....! आलोक मिल गई बुक ।

   आलोक - "हाँ पर आपके पास....!

   प्रियंका - "कल जब लेक्चरर

खत्म हो गए और तुम अपनी पुस्तक भूल गए ।"

    आलोक - "ओह.... शुक्रिया"

        यह क्षण भर की मुलाकात अब कॉलेज में आलोक को प्रियंका से हर रोज मिलने को मजबूर कर रही थी। आलोक के मन में एक प्रश्न था कि मैं बैंच पर पुस्तक नहीं भूला था। घर जाते वक्त बेग में थी पर प्रियंका ने बैंच पर पड़ी रहने की झूठी बात क्यों कही। 

     एक दिन कॉलेज में आलोक कि अचानक प्रियंका से मुलाकात हो जाती है एक पेड़ के नीचे।

    प्रियंका - "हाय आलोक हाउ आर यू ?"

  आलोक - "आई फाइन यू"

   प्रियंका -  "सैम" 

   आलोक - "आपको मेरी बुक बैंच पर मिली या बैग में"

   प्रियंका -  "क्यों ?क्या हुआ?"

  आलोक - "कुछ नहीं मैंने उस दिन बुक बैग में रखी थी लेकिन आप बता रही है कि बुक बैंच पर थी।"

     प्रियंका -  (हंसते हुए) "ओह आलोक मैंने मजाक किया था।" 

   आलोक - "मजाक"

   प्रियंका - "हां"

 बातों बातों में आलोक और प्रियंका अब इतने उलझ गए की आस पास के वातावरण को भूल गए। 

    आलोक - "वैसे तुम भी प्रथम वर्ष में ही हो प्रियंका"

      प्रियंका - "हां आलोक"

 आलोक - "अच्छा चलो एक दोस्त मिला" 

    प्रियंका - "बिल्कुल मुझे भी नए दोस्त की जरूरत है !"


      आज आलोक अपनी जिंदगी का 50 वा जन्मदिन अपनी पत्नी प्रियंका के साथ मनाता हुआ कॉलेज की मुलाकात एक अजनबी के साथ पूरी कहानी सुना रहा था और प्रियंका भी आलोक के साथ अपने कॉलेज की यादों में खोई हुई है।


कमल कालु दहिया

जोधपुर, राजस्थान


12  सर्वश्रेष्ठ

बैग


   मेरी नई नई नौकरी लगी थी । वो शनिवार का दिन था , मैं अपने मित्र के साथ आफिस से सीधे रेल्वे स्टेशन पहुँचा । मेरे पास एक छोटा सा बैग के  अलावा कुछ नहीं था । ट्रेन आने में देर थी , हम बेंच पर बैठकर ट्रेन का इन्तजार करने लगे । बगल में एक अधेड़ उम्र की महिला बैठी थी । उसके पास बहुत सारे बैग थे । उसने पूछा ट्रेन कितनी देर में आएगी , मैंने बोला 5 मिनट में आएगी । उसने बोला बोला मेरा भी बैग ट्रेन में चढ़ा दोगे । मैंने बहाना बनाकर मना कर दिया कि मेरे हाथ में दर्द है । 

     कुछ देर बाद ट्रेन आती है , मैं और मेरा मित्र ट्रेन में चढ़ जाते है और वो महिला भी किसी तरह अपने बैग के साथ ट्रेन में चढ़ जाती है । सभी अपनी अपनी सीट पर बैठ जाते है । कुछ देर में ट्रेन चल देती है , मैं अपने मित्र से महिलाओ के ज्यादा सामान लें कर यात्रा करने की बुराई करता हूँ कि महिलाओ का बस चले तो वो पूरा घर साथ लें चलें । इसी बीच स्टेशन आ जाता है और मित्र उतर जाता है । ट्रेन फिर आगे बढ़ती है ठण्ड के  कारण सभी अपनी खिड़कियों बन्द कर लेते है । रात के  9 बजे सभी भोजन के  बाद सोने की व्यस्था में लग जाते है । मैं भी अपने मफलर बाँधकर सीट के एक कोने में दुबक जाता हूँ । ठण्ड के कारण बहुत देर नींद नहीं आती है फिर कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला । सवेरे लोगो की आवाज सुनकर उठता हूँ तो देखता हूँ कोई मुझे कम्बल ओढ़ा गया था । जैसे ही मैं कम्बल उठाता हूँ तो एक पत्र मिलता है । उसमें लिखा था मैं सिर्फ औरत ही नहीं माँ  भी हूँ । मैं तुरन्त समझ गया ये वही अजनबी औरत थी जो माँ का फर्ज निभा गयी और उन बैगो की कीमत समझा गयी , जिसमें से एक बैग मेरे लिए था जो खाली वही पर रखा था । 


विशाल चतुर्वेदी " उमेश "

जबलपुर मध्यप्रदेश


13

एक सच्चा दोस्त


  दोस्ती शब्द सुनकर ऐसा लगता है जैसे यह भरोसे का ही दूसरा नाम है।  हमारी दोस्ती बहुत से लोगों से होती है पर सच्ची दोस्ती क्या होती है इस बारे में मैं अपना नजरिया बता रहा हूं।

  मेरे रखने से सच्ची दोस्ती वह होती है जो हमारे लिए प्यार से भी बढ़कर हो अगर हम अपने सच्चे दोस्त का मतलब अपने ब्रेड फ्रेंड से बात कर ले तो हमारे चेहरे पर मुस्कान आ जाए।  निश्चित रूप से यदि आप "सच्ची दोस्ती" का मतलब समझ रहे हैं तो।  उसके लिए आपकी जिंदगी में एक ऐसा खास दोस्त होना चाहिए।  जिससे अगर आप एक बार बात कर ले तो कई दिनों तक आप दिल से खुश रहे, सच्चा दोस्त वह शख्स होता है जो हर पल आपके चेहरे पर मुस्कान देखने चाहता हो, खुद दुखी होकर भी आपको खुश रखना चाहता हो।अगर आपको कभी कोई परेशानी नहीं होती  में हो और आपकी बिना बताए सिर्फ आपकी आवाज सुनकर आपकी परेशानी समझ जाए वह सिर्फ आपकी सच्चा दोस्ती हो सकती है।  जो आपके लिए किसी से भी लड़ रहा हो, जो आप को दुखी देखकर खुद भी दुखी हो जाए वो सिर्फ आपका सच्चा दोस्त ही हो सकता है।प्यार में भले ही कुछ लोग पैसा, घर, रुतबा देखते हैं, रंग रूप देखते हैं पर "  सच्ची दोस्ती "में ये सब मायने नहीं रखता है सच्ची दोस्ती में मायने रखता है तो वह विश्वास है, भरोसा अपने सच्चे दोस्त की खुशी में।  नहीं देंगे।  अंत में यही कहना चाहूंगा कि अगर आपकी जिंदगी में भी कोई आपका सच्चा दोस्त है तो यकीनन आप इस दुनिया के एक खुश नसीब इंसान हैं।


केशव गौतम

कोटा राजस्थान🙏🏻✍🏻


14

वो सुहाना पल

राधा सहेलियों के साथ दार्जीलिंग घूमने आयी है।यहाँ वे लोग बिल्कुल अनजान हैं। फिर भी दार्जीलिंग में आटो रिक्शा रिजर्व कर सभी सहेलियाँ घूमने निकलती हैं। 

  " यह चाय बागान यहाँ का सबसे खूबसूरत जगह है।" एक अजनबी व्यक्ति बोलता है।

"तुम कौन हो? हमलोगों के पास क्यों आए हो?" राधा डरते हुए पूछी।

   " मैं यहीं का रहने वाला हूँ।थौड़ी दूर पर मेरी स्टूडियो है।आप चाहे तो यहाँ के परिधान पहनकर विभिन्न तरह की तस्वीर खिंचवा सकते हैं।मेरे स्टूडियो में परिधान हैं।" अजनबी व्यक्ति बोला।

    राधा और उसकी सहेलियाँ अजनबी से मिलकर उसकी बात सुनकर चुप है।

        "आप कहे तो परिधान यहाँ ले आऊँ।उन परिधानों में तस्वीर खिंचकर आपको दे दूँ।"अजनबी व्यक्ति बोला

        "अच्छा, ठीक है।लेते आओ।"राधा सोचकर बोली।

  अजनबी व्यक्ति परिधान लेकर आता है।सभी वहाँ के चटकीले रंग के परिधान पहनकर तस्वीर खिंचवाती हैं। राधा और उसकी सहेलियाँ इस हसीन पल से बहुत खुश होती हैं।




रीतु प्रज्ञा

दरभंगा, बिहार


15


प्रशिक्षण के वो पल


आज डायट केशव पुरम दिल्ली से  प्रकाश को प्रशिक्षण के लिए MCPS  प्रीतमपुरा विधालय में जाना था, वहां उसे एक प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य करना था। जीवन में पहली बार वह किसी विधालय में शिक्षक के रूप में ग‌या था। विधालय में प्रथम दिन उसका परिचय वहां के प्राचार्य से हुआ उन्होंने विधालय के नियम एवं सामान्य निर्देशों से उसको अवगत कराया । अगले दिन उसे और उसके साथियों को एक-एक कक्षा का अध्यापक नियुक्त कर दिया गया। उसी कक्षा में उन्हें अपने प्रशिक्षण के पूरे 40 दिन व्यतीत करने थे। प्रकाश को द्वितीय कक्षा का अध्यापक नियुक्त किया गया था, प्रकाश को उस कक्षा के शिक्षक की देखरेख में  छात्रों को पढ़ाना था।

उस कक्षा के शिक्षक का नाम गौरव था। उसने  कभी अंग्रेजी माध्यम की कक्षा नहीं पढ़ाई थी। वह उस दिन उन सर से पहले ही कक्षा में पहुंच गया था। सभी छात्र उसे देख रहे थे।वह कक्षा में  अपना परिचय दे ही रहा था कि गौरव सर आ ग‌ए और उन्होंने उनका परिचय विधार्थियों से करवाया।प्रकाश गौरव सर से बात करने से हिचक रहा था।तब भी उसने हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया कि उसने कभी अंग्रेजी कक्षा नहीं पढ़ाई है कृपया उसका मार्गदर्शन करें। उसने सोचा कि कहीं वो विधालय प्रार्चाय से इस बात को लेकर उसकी शिकायत ना कर दे। परंतु सब उसके विचारो के विपरीत हुआ ।सर ने उसे बहुत प्यार से समझाया कि आप जो भी पढाए  इनको समझ आना चाहिए। उनकी बात सुनकर उसके मन में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। उसनेे सर के बताए गए बात को ध्यान में रखते हुए।अपनी शिक्षण प्रक्रिया प्रारंभ की छात्रों को विषय समझाने के लिए विभिन्न प्रकार के शिक्षण अधिगम सामग्री का इस्तेमाल करने लगा जिससे कक्षा बेहद ही रूचिपूर्ण होने लगी थी।आस पास के शिक्षक भी कक्षा में आकर उसकी प्रसंसा करने लगे थे।धीरे धीरे सभी शिक्षक एवं विधालय सदस्य से वह परिचित हो ग‌या था। उसे अब विधालय एक परिवार की तरह लगने लगा था। तभी देखते देखते उसके प्रशिक्षण की समय अवधि पूरी हो गई।आखरी दिन गौरव सर से उसकी भविष्य में आगे बढ़ने से संबंधित बहुत सारी बातें हुई सर ने उसे पूरे 40 दिन पढ़ाते हुए देखा था। अंततः उन्होंने कहा आप जैसे होनहार शिक्षक की इन विधालयो मे अत्यंत आवश्यकता है। आप जल्दी ही एक सफल शिक्षक बनेंगे यह मेरी मनोकामना है। प्रकाश उस दिन उनकी बातों से बहुत प्रेरित हुआ था और सफल होने की और कार्यरत हो गया बाकी शिक्षको ने भी उसे भविष्य में आगे बढ़ने का मार्ग दर्शन दिया। और जल्द ही सरकारी शिक्षक की नौकरी प्राप्त हो इसी शुभकामनाओं के साथ उसको विदाई मिली। 

अजनबी से परिचित तक का प्रकाश का सफर यहां संपन्न हुआ और कथा भी समाप्त हुई।



प्रकाश

शहर-दिल्ली


16  सर्वश्रेष्ठ


पुलिसवाला


कहते हैं  मुश्किल समय में जो साथ दे वो शख्स अपनो से भी कई बड़ा होता है। बात कोरोना काल के मई माह की ही है। जब लॉकडाउन में थोड़ा राहत देकर लोगों को शहर छोड़ अपने गाँव अपनों के पास जाने का मौका मिला।इसी बीच रोशन भी बहुत खुश था कि वह जल्द ही अपनो के बीच होगा।पर यह ख्वाब टूटने लगा था क्योंकि उसके पास कोई संसाधन नहीं थे।कहीं से मदद मिल भी जाती पर वह मायूस था।क्योंकि घर मे उसकी माँ और बहन उसका बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे थे।ऐसा पहली बार था कि वह खाली हाथ घर जा रहा था।वैसे तो कुछ समय से सब बंद था।पर उसकी आँखों की धुँधलाहट मानों जैसे भगवान से कई मन्नतें कर रही हो।अब जैसे उसे घर जाने की भी कोई ज्यादा खुशी नहीं।

मायूस रोशन अपना झोला रख सड़क किनारे बैठ गया। तभी एक पुलिसकर्मी की नज़र उस पर पड़ी। पहले तो रोशन डरा लेकिन पुलिसकर्मी के प्यार और स्नेह के सामने आँसू गिराते पोंछते हुए उसने अपनी सारी व्यथा सुना दी।पुलिसकर्मी ने उसे अपने हाथ से स्वादिष्ट भोजन दिया।और उसकी कुछ मदद कर उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उसे उसकी बस तक बैठाया।रोशन ने मदद लेने से इनकार करते हुए हाथ जोड़े।तब पुलिसकर्मी ने रोशन की उम्र पूछी तो उत्तर में उसने कहा साहब सत्रह बरस।

यह सुनकर पुलिसकर्मी की आँखे नम हुई और वे बोले तुम तो मेरे बेटे से भी कम उम्र के हो।आज अगर वह इस दुनिया में होता तो तुमसे बड़ा होता।जिसे हमने उसके बचपन में ही खो दिया था।यह मैं तुम्हें अपना बेटा समझ कर दे रहा हूँ।तुम सही वक़्त आने पर कोई अच्छा सा अपना कार्य शुरू करो तो मुझे ये लौटा देना।और हाँ मैं ब्याज जरूर लूंगा इस पर दोनों हँस पड़े जैसे बरसों की पहचान हो।

आज रोशन अपने घर में बहन और माँ के साथ बहुत खुश है। नया जोश है उसमें के वह कोई काम करेगा मेहनत करेगा। वह भविष्य के लिए सकारात्मक प्रयास करने की सोच रहा है।लेकिन जब भी भगवान से प्रार्थना करता है तो उन पुलिसकर्मी की लम्बी उम्र की दुआ माँगता है और सोचता है कि उस रोज मुलाक़ात एक अजनबी से न होती तो उसका जीवन कैसा होता।

      आज भी उसे उम्मीद है कि उसकी मुलाक़ात उन अज़नबी फिर दोबारा जरूर होगी और अबकी बार मुलाक़ात में मुस्कुराहट हँसी प्यार स्नेह सब पहले से ज्यादा होगा। रोशन के मन में एक प्रश्न अनायास ही आ रहा है कि अब मुलाक़ात में वो उन्हें भेंट में क्या उपहार दे।



मोनिका रावत मगरूर

शहर-कोटद्वार,पौड़ी गढ़वाल।


17  सर्वश्रेष्ठ


वो अजनबी


 हॉल खचाखच भरा हुआ था।चारों तरफ शोरगुल था। हर कोई इधर उधर घूम रहा था।मैं भी अंदर आ चुकी थी,आज से पहले मैं इस तरह के किसी समारोह मे नही गयी थी।ये एक सम्मान समारोह था जहाँ शायद आज मेरा नाम भी लिया जा सकता था।

   दिल काबू में ही नही था,मैं एक कुर्सी ले कर कोने में बैठ गयी।बार बार मेरी निगाहें हॉल के दरवाजे पर थी।हथेलियों से पसीना टपक रहा था,चेहरा भी सुर्ख लाल सा हो गया था। आखिर वो वक़्त भी आ गया जब इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ लेखिका का नाम पुकारा जाना था।मैंने अपनी आँखें मूंद ली। एक नाम सुनाई दिया....पूजा जी please come on the stage!! आपको इस साल की सर्वश्रेष्ठ लेखिका का सम्मान दिया जाता है।

   मैं अपने को संभालती हुई मंच पर पहुँची, तमाम लोग मौजूद थे,पर मेरी निगाहें किसी को ढूढ़ रही थीं। अचानक मैं दो साल पीछे चली गयी।

    एक अजनबी मुझे मिला,ना उसने मुझे देखा ना मैंने उसे।बस एक बार उसका मेरी wall पर एक मैसेज Hi.

   बस फिर यूँही एक दूसरे को जानने लगे।जिंदगी के जिस मोड़ पर वो मुझे मिला था,वहाँ मेरा सब कुछ खत्म हो चुका था।मैं बेहद मानसिक तनाव से गुजर रही थी। कई बार सोचा खुद को ख़त्म कर लूं,वो अक्सर समझाया करता था कि जिंदगी मे ख़त्म होने जैसा कुछ नही होता है। पर तू क्यों मरने से पहले मरना चाहती है।

    एक दिन उसने कहा जितना भी दर्द है पगली कोई नही सुनता तो लिख दी पन्नो पर। 

       ना जाने क्यूँ उसकी हर बात मानने को जी चाहता था। मैं लिखने लगी वो सुनने लगा।उसने वादा किया था कि जिस दिन मैं किसी मुकाम पर पहुँचूंगी वो मिलने आएगा।

       मैं तालियों की आवाज से वापस आयी ,पूछा आपको किसको श्रेय देना चाहेंगी---मैंने दरवाजे की और देखा

       वो अजनवी आ रहा था उसने अपना वादा पूरा किया। मैं पहली बार उसके रूबरू हो रही थी।मैंने माइक पर उसका नाम लिया ,जी किया कि उसके गले लग जाऊ,पर हैसियत ना थी उसके कदमों में झुक गयी ,उसने मुझे उठा कर गले से लगाया।मैंने काँपते हाथों से ट्रॉफी उसके हाथ में दे दी

      रिश्ता अजनबी से कुछ ना था,

         पर वो फरिश्ता हो गया,

     मेरी हर कहानी का वो किरदार

         हो गया।

      और मेरी कलम का हर अल्फाज

       उसका शुक्रगुजार हो गया।

      

अर्चना पंत अर्चना

लखनऊ उत्तर प्रदेश।


18  उत्तम

मुलाकात एक अजनबी से 



शर्मा जी केदारनाथ शर्मा यही नाम था उनका पूरा शासकीय विभाग के रोबदार बाबूजी जिनके नाम की पूरे विभाग में चर्चा होती थी उनके इमानदारी के चर्चे ऊपर सचिवालय से लेकर दफ्तर के चपरासी तक होते थे रिटायर हुए उन्हें आज सात साल हो गए थे इमानदारी के भूत ने उनके घर की जड़ों को खोखला कर दिया था 


          सिर्फ तनख्वाह मात्र में छह बच्चों की शादी पढ़ाई लिखाई दो बहनों की शादी और फिर शर्माइन के इलाज के खर्च में पूरी तरह से टूट चुके थे शर्मा जी का बैंकबैलेंस मरुस्थली कुए की तरह बिल्कुल सूख चुका था हाथ में खर्च को कौड़ी तक भी नहीं होने से और अपने उसूलों पर चलते रहने से घर में बहू बेटों से भी नहीं बनती थी और अब यह बात तिरस्कार अनादर तक पहुंच गई थी स्वाभिमानी शर्मा जी अब बिल्कुल टूट चुके थे बैंक बैलेंस के साथ-साथ घरेलू आत्मीता भी खत्म हो चुकी थी अस्वस्थता और उम्र होने की वजह से रिश्ते भी अब वेंटिलेटर पर ही थे ।


      शर्मा जी को भी नकली चेहरे पर नकली मुस्कुराहट उनके जीवन भर के अनुभव से समझ में आ जाती थी और एक दिन शर्मा जी दृढ़ निश्चय करके घर से निकल पड़े पूरे जीवन भरपूर स्वाभिमान से जीने वाले शर्मा जी आज अपमान और तिरस्कार से आहत हो अपने जीवन की लीला समाप्त करने चल पड़े थे और पहुंच गए शहर के बड़े तालाब के किनारे छलांग लगाने वाले ही थे कि किसी ने पीछे से उन्हें दबोच लिया शर्मा जी की गीली आंखें भरा कंठ उतरे चेहरे को देख अजनबी सब कुछ समझ गया और खींचकर पास पड़ी बेंच तक ले गया ।


       झोले में रखी पानी की बोतल निकाल शर्मा जी को पानी पिलाया और बिना कहे बिना पूछे कहना शुरू कर दिया श्रीमान जी देखने में आप संभ्रांत परिवार के लग रहे हैं मैं आपसे आपका परिचय नहीं पूछूंगा नहीं मैं अपना परिचय दूंगा परंतु आपसे मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि यह जीवन ईश्वर का अमूल्य उपहार है और इसे क्षणिक बुराई को हेतु बना खत्म नहीं किया जा सकता है आपने अपनी पूरी उम्र अपने उसूलों के साथ बहुत बड़ी बात है परंतु अब आपको अपने जीवन से समझौता करना होगा आप बच्चों में सब तरह की उम्मीद को छोड़ राम नाम में अपना जीवन निर्वहन करें राम के लिए जिए राम के लिए ही मरे जब आप सब से उम्मीद छोड़ देंगे मौन पूर्वक रहेंगे तो आपके बच्चों के व्यवहार में भी अवश्यंभावी परिवर्तन आएगा जैसा भोजन मिले प्रसाद समझकर ईश्वरीय अनुग्रह मानकर प्रसन्न चित्त हो उसे स्वीकार करें घर में बहुत ही जरूरी हो या जोर देकर बच्चे आपसे आपकी राय पूछे तो ही बताएं अन्यथा मौन धारण करे रहे और वह अजनबी धीरे-धीरे उनकी आंखों से ओझल हो गया वह कोई और नहीं उनकी अंतरात्मा ही था वो और इस तरह से उस अजनबी से उनकी मुलाकात अविस्मरणीय हो गई ।


कवि शरद अजमेरा "वकील"



19  श्रेष्ठ


वो अजनबी


ग्रेजुएशन के बाद का समय.....


मीना जिसे सभी लोग एक होनहार लड़की कहते थे,  बाहर से ग्रेजुएशन खत्म कर घर आ चुकी थी। वह घर आई थी ताकि अब कम से कम अपना पोस्ट ग्रेजुएशन अपने बल पर कर सके , और अब उसे तलाश थी एक ऐसी नौकरी की जिससे वो अपनी साधारण सी पढ़ाई खत्म कर सके। और बहुत जल्द ही उसे एक कोचिंग सेन्टर में मैथ्स टीचर की जगह नौकरी मिल गई। माहौल नया था और ये होनहार लड़की मन में वो सारे सपने दबाए बैठी थी जो उसने बचपन में देखे थे। उसे लगता था वो आसमाँ को छू ही लेगी लेकिन वो ये नहीं जानती थी कि समय से बलवान न तो पैसा है और न उस अहम की सीढी जिसे चढकर वो आसमाँ छूना चाहती थी। 

इस सीढ़ी का एक भाग तब टूटा जब वो दसवीं कक्षा में थी, रिजल्ट तो काफी अच्छा आया लेकिन ये वो दौर था जब परिवार का आर्थिक बल शून्य हो गया। इस सीढ़ी का टूटना उसे अन्दर तक जख्मी कर गया। और ये जख्म समय के साथ साथ बढ़ते ही गए, मीना की रातें जहाँ किताबों के साथ बीतनी चाहिए थी , वो उन्हीं रातों में अपने आँसुओं से सारा दुख अपने दुपट्टे पर लिखती रहती और सुबह होते ही सब मिटा देती। ग्रेजुएशन के लिए जब बाहर गई तो वो सब लोग भी उसे झूठे लगने लगे जो उसे बचपन से होनहार कहते आ रहे थे। और इस मोड़ पर उसकी अहम की सीढ़ी का एक और भाग टूट गया। अच्छे नम्बरों से ग्रेजुएशन पास तो किया लेकिन आत्मा बहुत ज़ख्मी हो चुकी थी, इतनी ज़ख्मी कि मरहम भी पास आने से डरे, मानो उसे भी शंका हो कि मैं ज़ख्म ठीक न कर सका तो....??


इन सब जख्मों के साये में उसने वो नौकरी शुरू की लेकिन अब उसके पास ऐसा कुछ नहीं था जिसके बल पर वो सिर उठाकर जी सके। आत्मसंयम, आत्मविश्वास जैसे शब्द जैसे वो दसवीं की परीक्षा में लिखने के बाद भूल ही गई थी । कोचिंग में और शिक्षक भी थे लेकिन मीना में सामर्थ्य न था कि किसी से दो टूक बात करे। लेकिन कहते हैं ना जब व्यक्ति के भीतर का भगवत् अंश कहीं खो जाए और उसका मार्गदर्शन न कर पाए तो किसी रूप में तो भगवान आते ही हैं।

           कुछ दिनों में मीना से बात की उसी के कोचिंग के एक शिक्षक  गर्वित ने। यूँ तो मीना बात नहीं करना चाहती थी लेकिन संयोगवश वो बात करने लगी। और उनमें उसने वो रूप देखा, जिसकी वो केवल कल्पना करती थी और फिर सोचती थी ऐसे तो केवल भगवान होते हैं। गर्वित ने मीना के भीतर सुलग रहे सभी ज़ख्मों की पीड़ा महसूस की। और इसके बाद उसे नया साहस, नई उम्मीद , नई प्रेरणा सब कुछ दिया। आत्मविश्वास और आत्मसंयम जैसे शब्द फिर से उसकी स्याही ने लिखना सीख लिए। मीना को इतने अच्छे से पहले न कोई समझा था और न कोई समझ सकता था। हालाँकि मीना कभी कभार अधिकारवश गर्वित को बुरा भला कह देती लेकिन गर्वित , वो तो बस मुस्कान लिए मीना को सुनता रहता और बदले में जितना हो सके उसका मनोबल ही बढ़ाता था।

जैसे भगवान भक्त की सारी गलतियाँ माफ करके अपने भक्त के होकर रह जाते हैं , बिल्कुल वैसे ही गर्वित मीना का होकर रह गया और मीना गर्वित की। आज मीना अपने भगवान के साथ खुश है और गर्वित अपनी मीना के साथ।



मेघा जोशी 

खटीमा , उत्तराखण्ड।



20  उत्तम


सच  का संजोग 


 

एक दुबली पतली लड़की रोडवेज बस पर अकेली बैठी l उसके बगल वाली सीट खाली थी l थोड़ीदेर में एक लम्बी, तंदुरुस्त महिला जो माथे पर लाल बड़ी गोल बिंदी लगाए, तीख़ी नाक वाली, जिसके ब्वॉयकट  बाल थे, काली साड़ी पहने उसी लड़की के बगल में बैठ गयी l थोड़ी देर में बस चल दी और उस महिला ने लड़की कानाम पूछा , इस पर लड़की ने अजनबी  होने के कारण अपना नाम पूजा बताया जो गलत था, पर गाँव का नाम सही बताया l 

महिला ने बताया की उसी गाँव की एक लड़की की शादी उसके किसी जानने वाले के बेटे से हो रही है l लड़का जो निकम्मा  और कामचोर है, साथ ही उस पर तीन मर्डर  के केस लगे है l उन्होंने दूसरे का बंगला दिखाकर एक गरीब बाप को फांस  लिया l बेटी बहुत दुर्भाग्य शाली है l 

इतना ही कहा कि  वो लड़की बोल पड़ी, नहीं नहीं !ऐसे न कहो वो बहुत सौभाग्यशाली  है क्योंकि शादी से पहले आप मुझे मिल गयी l मेरा नाम पूजा नहीं कल्पना है मैं ही वो लड़की हूँ l  इस पर वो महिला स्तब्ध हो गयी l


            फिर उस महिला ने  कागज़ 

 पर अपने घर का पता लिखा और कहा ज़ब तुम्हारी शादी हो इस पते  पर खबर भेजना मैं आउंगी l 

ये सारा किस्सा कल्पना  ने अपनी माँ  को बताया पिता के पता करने पर सब कुछ वैसा ही निकला जैसा उस महिला ने बताया था l 

ठीक पांच साल बाद कल्पना  देखती है कि उसकी शादी में पैर पूजन की रस्म  में वो महिला उसके पैर पूज रही थी l 


( ये महिला पेशे से एक वकील थी, और वो लड़की मैं )


कल्पना भदौरिया  "स्वप्निल  "

अध्यापिका  

बेसिक विभाग 

जनपद  हरदोई 

उ. प्र.



21  श्रेष्ठ



घायल


              सूरज ढलते हुए पहाड़ो के पिछे छिपने ही वाला था।कुछ दुकाने बंद होने ही वाली थी।मैदान में खेल रहे बच्चे घर के लिए निकल रहे थे।शाम को मस्जिद से अजान की आवाज सुनाई दे रही थी।मैं अपने जॉब से घर के रास्ते निकल चुका था।अचानक मेरी नजर उस लाल रंग की सूट पहनी हुई लड़की पर पड़ी।लाल लिबास में हँसते हुए ऐसा लग रही थी मानो कोई असमान से उतरी हुई परी है ।काली काली हिरनी जैसी आंखे,चाँद सा चमकता चेहरा,शाम से भी हसीन जुल्फे,और उनके हंसी की आवाज मेरे कानों में गूंज ही रही थी और अचानक मैं किसी चीज से टकरा गया उसके बाद मुझे कुछ याद नही।

               दूसरे दिन जब मुझे होश आया तो देखा कि सफेद ड्रेस में नर्स उसी लड़की के जैसी नजर आरही थी ।मुझे तो यकीन नही हुआ मेरी माँ दौड़ती हुई मेरे पास आई बहुत रोने लगी ।मेरे पापा डांट रहे थे बेटा संभल कर बाइक चलाया कर तुन्हें अगर कुछ हो जाता तो ।मगर इतना सबकुछ होने पर भी मुझे बस उस लड़की की हंसती हुई मीठी आवाज के शिवा कुछ सुनाई नही दे रहा था। पापा ने बताया पैर की हड्डी फ्रैक्चर हुई है एक हफ्ते लगेंगे ठीक होने में।मुझे भी अब धीरे धीरे दर्द का एहसास होने लगा था।

               कुछ देर बाद अचानक फिर से वही लड़की आंखों के सामने मगर इसबार उन्होंने मुझसे कहा जनाब ध्यान से गाड़ी चलानी चाइये।फिर क्या था मुझे तो एक्सीडेंट का दुख कम मगर उस लड़की से मिलने की ख़ुशी ज्यादा थी। बातों ही बातों में दिन भर उनसे मुलाकात होती रही।मगर रात काटना बहुत मुश्किल था। हर दिन उसे देखते देखते जाने कैसे छः दिन गुजर गए पता भी नही चला।मगर उस आखरी रात की बात मुझे आज भी याद है कि उनकी ड्यूटी नाइट में थी और मैं रात भर एक पल भी व्यर्थ ना गवांते हुए उन्हें ही देखता रहे गया। इतने दिनों में उन्होंने जितना अपनेपन से खयाल रखा शायद ही कोई रख पाता। मैं अब तक सिर्फ उनका नाम ही  जान पाया था।पैर तो कुछ दिनों में ठीक हो गया लेकिन दिल हमेशा के लिए घायल हो चुका था।प्रिया के ट्रीटमेंट और देखभाल से मैं जिंदगी भर के लिए उनका मरीज बन बैठा।



कवि हेमंत मोहारे "बसंत"

आमगांव (महाराष्ट्र)



22


अस्तित्व

   बात ऐसे वक्त की है जब सारी दुनिया हर दिन नए दौर की तरफ ऐसी तेजी से बढ़ रही थी शायद वक्त को भी ऐसा अहसास हो रहा होगा कि कहीं मेरी गति में कुछ गड़बड़ी आ गई है उस दौर में हो रहे हर बदलाव दुनिया की एक नई तस्वीर सभी के सामने ला रहे थे इसके साथ ही पैदा हो रही अन्य आकांक्षाएँ धरती, आकाश और जल में कब्जे के बाद भी कहीं और, कुछ और की होड़। मानव अपने सामाजिक दायरे को बढ़ाकर पारिवारिक सीमा की कमी में भी प्रतिस्पर्धा कर रहा था पर उसकी चाहतो में बदलाव किसी परमाणु विस्फोट से कम नहीं था। तो दूसरी तरफ धर्म की जड़ों के फैलाव के ठेके भी जोरो पर चल रहे थे तो भला देशों की सरहदें क्यों सिमट कर रहने वाली थीं, हर देश कुछ न कुछ पाने की चाहत में कुछ भी कर गुजरने को तैयार था। 

शायद इस भागदौड़ में सब ने अपनी प्रगति में प्रकृति को अजनबी ही बना दिया और अपने अस्तित्व का अहसास कराने के लिए प्रकृति ने भी अपना एक संदेश हम सब तक पहुंचा दिया एक अजनबी के रुप में और उस अजनबी से इस तरह से सामना हुआ कि हर दिन नई उँचाई की चाह रखने वाला खुद में ही सिमट गया और अपने ही अस्तित्व की तलाश के रास्ते इज़ात करने में ही जुट गया। 

शायद ये शुरुआत है एक नए दौर की, प्रकृति के संरक्षण की ओर की।          

"जब-जब छोड़कर चले हैं किसी का साथ, 

तब-तब हुई है मुलाकात एक अजनबी से।।। 


अभिषेक सिंह 

चित्रकूट, उत्तर प्रदेश 


23 सर्वश्रेष्ठ


अजनबी देवदूत 

 

  ये ज़िन्दगी भी इंद्रधनुषी रंगों सी है।सारे ही रंग बड़े मोहक लगते हैं।इन्ही रंगों में एक रंग है उस अजनबी से मुलाकात का,जिसके साथ बिताई हुई एक रात आज भी मुझे हर बारिश में याद आ ही जाती है।

     आज मुम्बई में जब बारिश की पहली बूदों ने धरती से वो सोंधी सोंधी सी महक उठाई ,तो मुझे उस अजनबी की सोंधी याद फिर आ गयी । 26 जुलाई 2005 की वह रात आसमान से बारिश का कहर लेकर आई थी। 

     ऑफिस से  निकलते ही दौड़कर बस पकड़ी,और घर पर फोन करके मम्मी को बोला," मम्मी बस 1 घंटे में पहुंच जाऊँगी । फ़ोन डिस्चार्ज हो जाएगा परेशान मत होना।लेकिन बस भी चींटी की भांति भी कुछ दूर चली और फिर रुक गयी । ड्राइवर ने जब आगे न जाने की असमर्थता जताई। तो सभी बस से उतर गए। हर तरफ ऑफर तफरी का माहौल था,लोग किसी तरह अपने घरों को पहुंचना चाहते थे। ट्रैक में जलभराव के कारण लोकल बंद हो चुकी थी । मैंने फोन निकाला ,लेकिन ये क्या मोबाइल भी साथ छोड़ चुका  था। घर की चिंता सताने लगी। बारिश मूसलाधार बहती जा रही थी,बिजली की कड़कती आवाज हृदय कंपा देती थी और रही सही कसर बिजली के फेल होने ने पूरी कर दी।

        बड़ा ही डरावना मंजर था। अनजान लोग एक दूसरे को दिलासा दे रहे थे। जिस दुपट्टे से में अपने गीले बदन को छुपा रही थी,वो भी बेबस हो चला था। कुछ लोग एक दूसरे का हाथ पकड़कर पानी भरे रास्तों पर चल पड़े थे।मैंने भी यही  फैसला किया कि स्टेशन तक पैदल जाऊँगी।

        अपनी ऊंची हिल की सैंडल को हाथों में लिया और पर्स को अपने हाथों में दबाये चल पड़ी नही पता था कि क्या होगा,पर संघर्ष का दूसरा नाम ही तो ज़िन्दगी है। आंखों में चिंता और बेबसी के आंसू थे,पर वो बारिश की बूदों के बीच अपना अस्तित्व खो दे रहे  थे।।बड़े बड़े कदमों से लड़खड़ाते और संभलते हुए मैं भी आगे बढ़ी जा रही थी ।कुछ दिखाई नही दे रहा था। बस दूसरों के सहारे हम आगे कदम बढ़ाते जा रहे थे। तभी मेरा पैर किसी बड़े गड्ढे में पड़ा , में जोर से चिल्लाई , ऐसा लगा अब दुनिया खत्म ।मेरा पैर एक खुले मेनहोल के बीच में फंस चुका था।लोगों ने काफी मशक्कत की पर मेरी हर चीख पर वो रुक जाते। तभी एक लड़के ने उस बड़े पत्थर को ही  हटा दिया जिससे मेरा पैर निकल आया। लेकिन पैर में  बहुत चोट लग गयी थी। चला नही जा रहा था, मैं वहीं बैठ  गयी। उस लड़के ने कहा मैडम मैं आपको छोड़ दूं क्या? ,मैंने कुछ नहीं सोचा बस यही बोल पाई बहुत मेहरबानी होगी।उसने मेरे पर्स को उठाया ,मुझे सहारा दिया। उस दिन मेरे लिए वह किसी देवदूत से कम न था।मेरे हाथ पैर ठंडे पैड चुके थे, उसने पूछा आप कैसे जाएँगी। मेरा उत्तर था ,पता नही और में रोने लगी। 

       बारिश की गति और तेज हो गयी थी। सभी  इस बेरहम बारिश से छुपने का आसरा ढूंढ रहे थे।पैरों का दर्द अब असहनीय हो गया था। मैंने उसको बोला आप जाइये ,मैं देख लूंगी। उसकी तेज आवाज में कहा "  क्या देख लोगी, कहाँ जाओगी? मर जाओगी ...देख नही रही क्या हालात हैं। और यह कहकर उसके हाथों की पकड़ और तेज हो गयो थी। जैसे वो मुझे आज इस प्रलय से बचाने की ठान चुका है।   और उस अजनबी पर  मैंने पूरा भरोसा कर लिया।  दौड़कर हम सड़क किनारे  एक खाली गाड़ी में  बैठ गए। और बारिश के इस कहर के कम होने का इंतजार करनेलगे।  बारिश थमने का नाम नही ले रही थी।

          उसने कहा लगता है आज की रात यहीं गुजारनी पड़ेगी । मैं सहम गयो थी  ,मैंने तुरंत कहा ,""अरे नहीं ,में चली जाऊँगी । यह कहकर जैसे दरवाजा खोला बारिश  की तेज बौछार और दर्द की वजह से खुद को संभाल नही पाई।

और बिना कुछ कहे दर्द को भींचते हुए गाड़ी में बैठ गयी।   

      उस दर्द और दहशत से भरे माहौल में एक खिड़की पर वो बैठा रहा और एक खिड़की से चिपककर मैं बैठ गयी ।बस बीच बीच में वह पूछ लेता दर्द कुछ कम हुआ।और मैं ना में सिर हिला देती ।उसका ये कहना कि .. मुझसे डरिये नहीं आज भी मेरे कानों को सुकून देता है।।कब आंख लगी और कब बारिश बंद हुई नहीं पता,सूरज की रश्मियों जब हम पर पड़ी मैंने जल्दी से कार का दरवाजा खोला। और उस लड़के की तरफ देखा सूरज की लालिमा में उसका चेहरा दिखा,  बहुत सुन्दर।खुद में ही लजा गयी मैं, वो भी उठा,और हंसते हुए बोला बचा लिया आपको नहीं तो बह गयी होती आप। मैंने कहा,"  जी इस एहसान को पूरी उम्र नही भूल पाऊँगी।यह कहते हुए लड़खाड़ते हुए मैंने कहा बस स्टेशन तक छोड़ दीजिए। 

        स्टेशन पहुंचकर ,मैं लोकल ट्रेन में बैठ  गयी ,और उसे धन्यवाद कहते हुए मेरी आँखों में उसके लिए बहुत निश्छल प्यार था, उसकी बातों से पता चला वो  नागपुर में रहता है यहां किसी इंटरव्यू देने आया था । पर मुझे तो बस इतना पता था कि वो अजनबी मेरे लिए देवदूत था। सिर्फ सच्चा अजनबी  देवदूत।


कल्पना श्रीवास्तव (मुंबई)



24  सर्वश्रेष्ठ


वो दोस्त



सुनहरी धूप खिली थी उस दिन| मैं हर सुबह की तरह पार्क में टहलने गयी थी| थोड़ी देर टहलने के बाद मैं थक कर एक बेंच पर बैठ गयी| आप जानना चाहते होंगे कि मैं कौन हूँ?  मैं हूँ अंजलि मल्होत्रा, एक 52 वर्ष की महिला| मैं गुजरात की ही रहने वाली हूँ और यहीं पार्क के पास की एक कॉलोनी में हमारी एक बहुत आलीशान कोठी है| मेरे पति मिस्टर राज मल्होत्रा, जो की गुजरात के एक बहुत बड़े बिज़नेस मैन थे| घर में दो जवान बेटे और दो बहुएं हैं और तीन पोते-पोतियाँ हैं| भरा- पूरा घर है मेरा, लेकिन किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है| बस सब अपनी मर्जी के मालिक हैं, छोटे से लेकर बड़े तक सभी| मुझे डॉक्टर ने रोज टहलने के लिए कहा है क्योंकि मेरे घुटनों में बड़ा दर्द रहता है|


मिस्टर राज मल्होत्रा जो कि मुझे मेरे कॉलेज में मिला था| पहले तकरार हुई, फिर प्यार हुआ और फिर इकरार हुआ| ग्रेजुएशन करने के बाद घर पर बताया और फिर हमारी शादी हो गयी| सुहाने सपनों के साथ अपनी ज़िन्दगी जीते हुए कब सोनू और मोनू ने जन्म लिया और फिर हमारी ज़िन्दगी ही बदल गयी| बच्चो की परवरिश, नौकरी दोनों एक साथ थोड़ा मुश्किल था, तो मैंने अपनी नौकरी छोड़ने का मन बना लिया| जब राज को बताया तो उन्होंने बस इतना ही कहा-जैसी तुम्हारी मर्जी| घर के लिए, बच्चो के लिए या कैसा भी निर्णय लेना हो वो सब मुझ पर ही छोड़ दिया करते थे| आज फिर एक निर्णय लेना है मुझे सोचा उनसे पूछ लूँ, जवाब तो पता है मुझे कहेंगे जैसी तुम्हारी मर्जी| लेकिन फिर भी पूछना तो मेरा फ़र्ज़ है|


जैसे ही बेंच पर बैठे हुए मैंने खुद की बगल में देखा तो वो मुस्कुरा रहे थे| और बोले कि कितना कुछ बदल गया है लेकिन तुम अब भी नहीं बदली| पता है अब तुम कितने साल की हो गयी हो, अब तो बिना मुझसे पूछे ही फैसले लेने की आदत डाल लो| मैं मुस्कुराने लगी और मैंने कहा -नहीं राज ऐसे अच्छा थोड़े न लगता है, कि मैं अकेले - अकेले कोई फैसला ले लूँ| मुझे नहीं पसंद ऐसे करना|


तुम्हें अच्छा लगता होगा ऐसे तभी तो छोड़ कर चले गए मुझे यहाँ अकेला| और मैं फूट-फुट कर रोने लगी| तभी किसी ने मुझे कहा -क्या हुआ अंजलि, क्यों रो रही हो? मैंने गर्दन ऊपर उठा कर देखा तो वो कोई औरत थी| वो मेरा नाम जानती थी लेकिन मैं उसे नहीं पहचानती थी, बिल्कुल भी नहीं| आप कौन? मैंने पूछा तो उसने झट से कहा- तुम्हारी सहेली हूँ पार्वती| पार्वती नाम तो कुछ सुना-सुना सा है लेकिन मेरी ऐसी कौन सी सहेली है? मुझे कुछ याद क्यों नहीं है? उसने हंसते हुये कहा - कोई बात नहीं परेशान न हो उम्र का तकाज़ा है| ऐसा हो जाता है, मैं खुद ही भूल जाती हूँ बहुत सी बातें|


अच्छा चलो अब ये बताओ रो क्यों रही थी| कुछ नहीं बस राज की याद आ गयी थी| कौन राज? मेरे पति-मैंने कहा| ओह्ह तो तुम्हें ऐसे रोना नहीं चाहिए, क्योंकि वो तुम्हारे आस-पास ही है| मैंने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में एक अजब सी चमक थी, एक अलग सा नूर था| उसने कहा -मेरी तरफ देखो- ज़िन्दगी मुश्किल नहीं होती बस स्वार्थी होती है, जब तक हमारा स्वार्थ पूरा होता है, ज़िन्दगी हमें अच्छी लगती है| लेकिन जब कुछ हमारी इच्छा के विरुद्ध होता है, जिससे हमारा स्वार्थ पूरा नहीं होता तो ज़िन्दगी हमें बेमानी सी लगती है|


मैं उसकी तरफ एकटक देख रही थी और समझने की कोशिश कर रही थी, जो वो मुझे समझाना चाहती थी| उसने कहा पति नहीं रहे और बच्चे अपने स्वार्थ में व्यस्त है, यही दुख सता रहा हैं न तुम्हें| लेकिन ये जीवन का शाश्वत सत्य है| तुम जीवित हो इसका मतलब अब भी तुम्हारा कोई स्वार्थ पूरा होने को बाकी है| उसे ढूंढों और व्यस्त हो जाओ अपने उस स्वार्थ की पूर्ति में| उसने कहा -अब मैं चलती हूँ| तुम अपना ध्यान रखना| उसने मुझे गले लगाया और कहा - अपने हुनर को फिर से पहचान लो और जब तक जीवन है, जीना मत छोड़ना| वो चली गयी और मैं उसे जाते हुए देखती रही| कौन थी वो पार्वती? मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है? अपने आप को युहीं सवालों में उलझाए हुए मैं अपने घर पहुंच गयी|


2 साल बाद:-


मालकिन अचार की डिलीवरी कितने बजे तक होनी है| अंदर से आवाज आयी 4 बजे तक| माँ जरा बाहर आओ कुछ पेपर्स साइन करवाने है| मिसेस अंजलि मल्होत्रा अपने कमरे से बाहर आती है और सोफे पर बैठते हुए कहती है-लाओ कहाँ करने है साइन| उनका पोता भाग कर आता है और अपनी दादी की गोद में बैठते हुए कहता है- यू आर अमेजिंग दादी! आपने बहुत अच्छी रिमोट कंट्रोल कार दी है मुझे, थैंक यु सो मच दादी| दोनों बहुये जूस और नाश्ते के लिए उन्हें टेबल पर बुलाती है| सबने साथ में नाश्ता किया और सभी अपने-अपने कामों में लग गए|


एक इंटरव्यू के दौरान कहे गए अंजलि मल्होत्रा के शब्द :-


अंजलि मल्होत्रा आज एक बहुत बड़ा ब्रांड बन चुका है| जो मेरे पास बैठने से भी कतराते थे, आज मेरे आगे-पीछे घूमते हैं| भला हो उस पार्वती का जिसने मुझे जीवन का असल अर्थ बताया, वरना राज के जाने के बाद मैं तो मर रही थी हर रोज| दरअसल अंजलि यानी की मैं बहुत अच्छा अचार बनाया करती थी| और यही मेरा हुनर था, जो राज से शादी के बाद कभी याद भी नहीं आया और जब याद आया तो इस हुनर ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी| आप लोगों से निवेदन है कि अपना-अपना हुनर पहचाने वहीं तो एकमात्र उद्देश्य है आपके जीवन का, उसे पूरा करें और खुश रहें|


अंत में उन्होंने कहा -एक अजनबी दोस्त ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी| मैं आज भी नहीं याद कर पायी हूँ कि मेरी कौन-सी दोस्त थी जिसका नाम पार्वती था| लेकिन मैं आज भी नहीं भूल पायी हूँ वो मुलाकात एक अजनबी से, वो एक अजनबी थी लेकिन वही अजनबी मेरी ज़िन्दगी की गुरु निकली और मुझे सीखा गयी ज़िन्दगी के सही मायने| आशा करती हूँ कि आप सब अपने उस अजनबी को खोज कर निकालें ताकि आप समझ सकें अपने जीवन का उद्देश्य|


मीना सिंह "मीन" सर्वाधिकार सुरक्षित

नई दिल्ली


25  सर्वश्रेष्ठ


कभी जब मिलो खुद से


उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने अपनों की फ़िक्रमंदी में काट दिया था। बचपन से ही सबकी उम्मीदों को अपने कांधों पर रखकर एक-एक कदम बहुत ही एहतियात से बढ़ाया था श्रीकांत जी ने। किसी की नजर में खुद को कभी खटकने न दिया था। बोल चाल की सौम्यता हो या रहन-सहन की सहज शालीनता, घर-परिवार-मुहल्ले से लेकर दूर-दूर तक जानने वालों के बीच वो एक आदर्श की भाँति रहे। पत्नी ने उन्हें बीच सफर में अकेला छोड़ दिया था, बेटे-बहु अपने अपने गृहस्थ जीवन के मँझधार में एक दूसरे की पतवार बने हुए थे। बेटियां ब्याह कर अपने-अपने ससुराल की हो रहीं। ऐसे में किसी से कोई उम्मीद न रखने वाले श्रीकांत जी किसी देवदार की तरह सीधे खड़े रहकर अपने आगे आने वाले कुछ वर्षों की यात्रा के लिए अकेले चलने का मन बना चुके थे। खैर अभी कोई बहुत उम्रदराज भी नही थे। कनपटियों में छुपे इक्का दुक्का बाल ही पकना शुरू हुए थे अभी। मूंछो पर अब भी वही रौब था और चेहरे पर किसी परिपक्व युवा सा आत्म-विश्वास। मगर जिस घर परिवार और समाज की उम्मीदों को बिना किसी उम्मीद के अपने कंधों पर ढोते आये थे, उसकी नजर में अब कई प्राथमिकताओं से वर्जित हो चुके थे वो। किसी ने भूले से भी उनसे यह पूछने की जहमत न उठायी थी, कि उन्हें क्या महसूस होता था अपने जीवन साथी को खोकर।


निःसंदेह, जीवन साथी से आपकी डोर कुछ ऐसी बंधी होती है कि वो चाहकर भी तोड़ने से नही टूटती। मगर यथार्थ की जमीन पर पैर टिकाते ही बड़े बड़े सेठ भी दिवालियापन का शिकार हो जाते हैं। आज कार्यालय से वापस आते हुए वो रास्ते में ही उतर गए और सुभाष पार्क की तरफ चल पड़े। आज जैसे उन्हें घर जाने की जल्दी न थी। थोड़ा वक़्त काटने की नीयत से एक खाली बेंच पर बैठकर अपनी पसंदीदा साप्ताहिक पत्रिका 'नवदीप' पढ़ने लगे। पढ़ते पढ़ते उनकी नजर वैवाहिक-प्रस्ताव के छोटे से कॉलम पर पड़ी, और एक नाम पढ़कर वो चौंक पड़े।


नाम- अनुज्ञा शर्मा

उम्र- 42 वर्ष

वैवाहिक स्थिति- अविवाहित

पेशा- अध्यापक


कुछ जरूरी-गैरजरूरी बातों के आखिर में एक अदद फ़ोन नम्बर लिखा हुआ था। एक छोटा सा तनिक धुंधला सा टिकट के आकार का फोटो भी लगा हुआ था जिसे देखकर कोई चेहरे-मोहरे को ढंग से न समझ पाता। मगर श्रीकांत के लिए वो चेहरा नया नही था। बरसो से नही देखा था जिसे, आज वो किसी बयार सी उसकी आंखों के सामने लहरा रही थी। कॉलेज के दिनों से श्रीकांत से एकतरफा प्रेम करती थी अनुज्ञा। मगर श्रीकांत मानो किसी बोझ से दबा हुआ, कभी अपने कंधे सीधे करके, नजर उठाकर, उसकी नजरों में अपने लिए प्रेम की अनुभूति देख ही न पाया था। वो यंत्रवत सा कॉलेज आता, पढ़ाई करता, हर साल अव्वल रहता और चाहकर भी इधर-उधर न देखता। अनुज्ञा ने कभी कहा भी नही, श्रीकांत से कभी सुना भी नही। मगर जब अनुज्ञा ने श्रीकांत को खत लिखकर अपने मन की गांठ खोली तब तक श्रीकांत के जीवन की गांठ किसी और से जुड़ चुकी थी। उसका रिश्ता तय हो चुका था। श्रीकांत को पता तो चला, मगर बहुत देर में। अनुज्ञा ने भी अपने फूल से मन पर मन भर भारी पत्थर रख लिया और घर वालों के बहुत दबाव देने के बाद भी विवाह न किया। मानो अपने मन की बात समय रहते न कह पाने की सजा, खुद को देने का फैसला कर लिया हो उसने। 


श्रीकांत ने उसी शाम अनुज्ञा को फ़ोन किया, और दूसरी तरफ से एक जानी पहचानी सी मधुर आवाज जिसमें परिपक्वता का पुट भी आ गया था, उसके कानों में पड़ी। अनुज्ञा के लिए ये किसी स्वप्न से कम नही था। औपचारिक बातों के बाद श्रीकांत ने मिलने की मंशा जाहिर की। न चाहते हुए भी जैसे श्रीकांत खुद को फोन करने से न रोक पाया था, वैसे ही अनुज्ञा मिलने से खुद को न रोक पायी। अगले दिन तय समय पर दोनों एक कॉफी-शॉप में मिले। बिल्कुल सादगी का लिबास ओढ़े वो दोनों एक दूसरे को मिले। किसी बनावटीपन की खैर अब जरूरत भी कहाँ थी। एक दूसरे को जानते हुए भी इतने सालों तक अजनबी रहने वाले दो लोग आज फिर आमने सामने थे। 


इधर उधर की बातों के बाद जब श्रीकांत से इश्तिहार वाली बात पूछी तो अनुज्ञा ने जवाब देने के बजाय हँसकर पूँछ लिया - "शादी करना चाहते हो मुझसे।" श्रीकांत की पत्नी की के बारे में श्रीकांत से जान चुकी थी वो, इसलिए ऐसा सवाल पूछने में उसे कोई हिचकिचाहट न हुई। श्रीकांत थोड़ा झेंप गया, मगर फिर खुद को सम्हालते हुए उसने कहा- "अनुज्ञा, मुझे ये नही मालूम कि मैं तुम्हारा गुनह-गार हूँ भी या नही, मगर मैं एक बार फिर से खुद से चलकर आयी जिंदगी को अब दूर नही होने देना चाहता।" जवाब सुनकर अनुज्ञा ने कहा- "श्रीकांत, मैंने इतने सालों तक शादी नही की, तुमसे मेरे प्रेम की अलख जलाए रखी, पर जाने क्या हुआ कि पिछले हफ्ते मेरे मन मे एक खालीपन ने घर कर लिया। सब कुछ होते हुए भी ये जीवन नीरसता में डूबता मालूम होने लगा था। सो इश्तिहार दे दिया शादी का। मन में ये भी था कि उम्र 42 साल देखकर कौन भला मुझसे शादी करने की सोचेगा। मगर नियति का खेल देखो, तुम मेरी जिंदगी में एक फ़ोन के जरिये वापस आ गए। इसे नियति का खेल कहूँ या विद्रूपता। समझ नही आता। मगर इस बार फैसला तुम्हे लेना होगा, क्यूँकि मैं तो किसी बंधन में नही बंधी, पर तुम्हे बहुत से बंधनों ने बांध रखा है। मैं तुम्हे उन्हें तोड़ने को न कहूंगी, पर क्या तुम उन बंधनों के रहते मुझसे रिश्ता जोड़ सकोगे।" 


श्रीकांत ये सब सुनकर जैसे सुन्न सा रह गया। कितने रेशमी तारों से बंधा हुआ था वो। मगर आज जैसे उसके शरीर मे किसी और श्रीकांत ने अपनी जगह बना ली थी। हमेशा जिम्मेदारियों को आगे रखकर सोचने वाला श्रीकांत आज सिर्फ अपने और अनुज्ञा के बारे में सोच रहा था, अनुज्ञा की इतने सालों की तपस्या के बारे में सोच रहा था, उस खूबसूरत इत्तेफ़ाक़ के बारे में सोच रहा था जो पिछले 24 घंटो में उसके साथ घटित हुआ था। इससे पहले की कोई दूसरा ख़याल उसके दिलो-दिमाग पर हावी होता, उसने अपना अंगूठा अपने मुँह में डालकर दांतों से काट लिया और उससे निकली खून की चंद बूंदों को अनुज्ञा की मांग का सिंदूर बना दिया।


सिर्फ अनुज्ञा ही नही, खुद श्रीकांत भी आज खुद के सबसे अजनबी रूप से मिल रहा था। 



सचिन 'राकेश' मौर्य

निरीक्षक-आयकर विभाग, मुम्बई

निवास स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश


26  उत्तम

भगवान खुद आये



         मैं घर की पिटाई के डर से और  बेज्जती व सहपाठियों के बिछड़ने के डर से आत्महत्या करने के लिए चली गई थी क्योंकि मैं कक्षा बारहवीं में फेल हो गई थी ट्रेन ठीक मेरे सामने एक हाथ दूर थी कि अचानक किसी ने मुझे पीछे की ओर धकेल दिया मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो एक अजनबी सुंदर सी महिला मुझ पर चिल्ला रही थी यह क्या करने जा रही हो तुम मरना कायरता की निशानी है और जीवन का दूसरा नाम ही संघर्ष है मैं उनसे लिपट कर रो रो कर अपनी पूरी बात कहने लगी मेरी बात सुन कर वह मुस्कुराए और मुझसे  बोली मैं तुम्हें आज अपने बारे में एक बात बताती हूं मैं भी कक्षा 12वीं में एक बार नहीं पूरे 2 बार फेल हुई थी मेरे टीचर व परिवार वालों ने मुझे सब्जेक्ट चेंज करने की सलाह दी जो मुझे उस समय उचित लगी और मैंने वैसा ही किया जानते हो उस साल मैंने पूरे यूपी में टॉप किया मैं हर पेपर में छाई हुई थी मुझे अंदर से बहुत खुशी हो रही थी और आज मैं एक डॉक्टर हूं और मेरा छोटा सा अस्पताल भी है आज जब मैं दूसरों की जिंदगी बचाती हूं तो मैं सबसे ज्यादा खुशी होती हूं कुछ लोग मुझे ईश्वर का भी दर्जा देते हैं मेरा दिल  बहुत खुश होता है जब मैं दूसरों के कष्टों को कम करती हूं हो सकता है ईश्वर ने तुम्हारे लिए भी कुछ अलग अच्छा पहले से बहुत अच्छा सोचा हो और याद रखना जब ईश्वर एक दरवाजा बंद करता है तो वह दूसरा दरवाजा भी खोलता है उस अजनबी सुंदर सी महिला ने मेरी सारी जिंदगी बदल दी थी हर किसी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं कि कोई अजनबी की साधारण बात भी उसका पूरा जीवन बदल देती है और मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था मैं निराशा से आशा की ओर हमेशा बढ़ती चली गई

 

शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव

 कानपुर


Comments

Popular posts from this blog

प्रतियोगिता #08: गजेंद्र कुमार घोगरे

प्रतियोगिता #08- गीतांजली वार्ष्णेय “सूर्यान्जली’

प्रतिध्वनि समूह प्रतियोगिता #9: अनमोल पाती भाई/ बहन के नाम