प्रतिध्वनि हिन्दी साहित्यिक पत्रिका, जून, 2020
मात-पिता मेरे शिव शक्ति
मात-पिता मेरे शिव शक्ति
यह दोनों मेरे समाज सम्मान
इनके बिना क्षण भर जीवन ना
दोनों ही आत्मा महान
मात-पिता मेरे शिव और शक्ति
यह दोनों मेरे समाज सम्मान
इनका एक क्षण भर सुख
मेरे लिए है स्वर्ग समान
इनकी सेवा में तत्पर रहना
यही है मेरे कर्मों पर जान
मात-पिता मेरे शिव और शक्ति
यह दोनों मेरे परमानंद
छाया इनकी जो मुझ पर है
मेरी यही सर्वोपरि पहचान
भगवान से पहले इनको पूजूं
यही है मेरे दो प्रभु महान
मात-पिता मेरे शिव और शक्ति
यह दोनों मेरे समाज सम्मान
एक अभिलाषा मन भर की यह
बनी रहे इनकी आन और शान
हर जन्म मे बने ये मात पिता मेरे
और मैंं बनू इनकी संतान
मात-पिता मेरे शिव और शक्ति
यह दोनों मेरे समाज सम्मान
कविराज भट्ट
नई दिल्ली
शिवशंकर स्तुतिगान
शीश शशिधर गंग शोभित, शर्व शंभु सुरेश,
शिव शुभंकर सौम्य शंकर, शेष शैव्य महेश।
शंकरा शत शांकरी शुभ, शत्रुदमन शिवाय,
शक्ति शाश्वत शीर्ष शैवी, शील अति शोभाय। -1
भूत भैरव भद्र भोले, भार्गवी भरतार,
भाललोचन भूतवानी, भव्य भव भंडार।
भीम भीषण भीति भंजन, भावता भगवान।
भक्त भारित भाव्य भार्गव, एक शिव अधिदान। -2
व्याघ्र वल्कल विश्व वल्लभ, वाम वामा वास।
कामहंता कालयोगी, कर्मरत कैलास।
आदि अंतिम शून्य आकृति, नाम है ओंकार।
देवतामणि देवदेवा, दोष सब संहार। -3
आशुतोष अनंत अविचल, अगोचर अज आप।
सत्य सुंदर शिव सनातन, प्रभु हरो संताप।
नात्र निर्णुण हो निरंजन, सत सगुण श्रीनाथ।
वीर वैरागी विहारी, वल्लभा सुत साथ। -4
कन्हैया साहू 'अमित"
भाटापारा छत्तीसगढ़
रूपमाला छंद
(14/10=2122, 2122-2122, 21)
प्रतियोगिता: सुनहरा बचपन (चयनित रचनाये)
बचपन
बचपन आता याद सखी,
तब मन जाता हार सखी।
मात-पिता के घर जब तक थे,
बहुत मिला था दुलार सखी।
वो दोनों न नजर के आगे,
चुक गया सारा प्यार सखी।
जब-जब सावन की ऋतु आती
पीहर न देता गुहार सखी।
पूनों दूजों मैंके जाऊँ,
दिखता अब न त्योहार सखी।।
भैया भाभी अपने घर के,
छूटा पीहर द्वार सखी।
भूल न पाऊँ वो दिन दुपहरी,
ना सोने पर पड़ती मार सखी।
मन की बातें 'अंजू' कहती,
लगता सूना संसार सखी।।
डॉ अन्नपूर्णा वाजपेयी 'अंजू'
कानपुर, उत्तर-प्रदेश
कुलदीप बरतरिया,
गाजियाबाद, उत्तर-प्रदेश
सुनहरा बचपन
सुनहरा पल वो बचपन का,
सुनहरी यादेँ बचपन की।
कोई लौटा दे फिर वो पल,
वो सारी खुशियाँ बचपन की।।
न कोई द्वेष भाव मन मे,
न चिंता किसी चीज की थी।
न कुछ खोने का कोई डर था,
न कुछ पाने की आशा थी।।
बड़ा मासूम बचपन था,
दोस्त संग खूब मस्ती की।
लिपटना माँ से मन भाया,
यादें भी आज कुश्ती की।।
वो तुतलाकर बात करना,
बड़ा मनमोहक लगता था।
वो अम्मा की लोरियां थी,
वो बचपन सुन्दर लगता था।
पिता की डांट याद आयी,
बहन का प्यार याद आया।
आज भी माँ की ममता का,
वो बचपन ही नजर आया।।
साकेत बिहारी शुक्ला
चित्रकूट, उत्तर-प्रदेश
बचपन की यादें
बचपन की सोचता हूँ,
तो फिर मैंं बचपन हो जाता हूँ,
कभी पापा से डांट खाकर माँ से रूठ जाता हूँ,
तो माँ की गोद में चुपचाप से सो जाता हूँ।
आज भी जब माँ की गोद में सर रख पाता हूँ,
गमों को अपने भूल कर स्वर्ग सा बचपन पाता हूँ।
वो नानी दादी सब ने क्या पाला था मुझे,
आप सबको प्रथम पाठशाला का शिक्षक पाता हूँ।
कभी थपकी से क्रिकेट खेलता हूँ,
तो कभी फटी पतंग सद्दे से उड़ाता हूँ।
गुल्लक में रखे सिक्कों से बचपन की अमीरी पाता हूँ।
पापा की साइकिल, मां के सिलबट्टे से बचपन याद दिलाता हूँ,
मम्मी के हाथ के बुने स्वेटर से मोहब्बत आज भी पाता हूँ,
वह शाम को बाहर छुपन छुपाई खेल कर,
रात को कैरम और लूडो की गोटी में खो जाता हूँ,
हार जाता हूँ तो भाई-बहन सबसे खुट्टा हो जाता हूँ।
सोचता हूँ बचपन को, तो मैंं फिर बच्चा हो जाता हूँ,
सोचता हूँ बचपन को, तो मैंं फिर बच्चा हो जाता हूँ।
गाजियाबाद, उत्तर-प्रदेश
सुनहरा बचपन
सबसे सुंदर जीवन का हिस्सा बचपन का
आनंद से भरपूर हर किस्सा बचपन का
याद हमें रहती हैं बस मीठी सी बातें
याद किसे रहता है वो गुस्सा बचपन का।
बहुत याद आती हैं माँ की लोरियाँ
सारा दिन घूमना बना कर टोलियाँ
कहीं भी मिला नहींं वो मिठास आज तक
पाँच पैसे की वो दस मीठी गोलियाँ।
बचपन की बस एक ही रीत
पल में झगड़ा पल में मीत
कल की कोई फिक्र नहींं
खाओ पियो गाओ गीत।
दादी -नानी की वो मनोहर कहानियाँ
जुगनू को देखकर हमारी हैरानियाँ
छत पर लेटे-लेटे आसमान देखना
खो गई बचपन की वो सारी निशानियाँ।
माटी से सने पाँव गली-गली घूमना
तीज का त्यौहार और पींग पर झूलना
कैसे भूल जाऊँ सुनहरे बालपन का
वो कंचे को जीतकर फिर उसे चूमना।
नीटू कुमार 'नीता'रोहतक, हरियाणा |
बचपन की यादें
चलो आज कुछ खास करते हैं।
बचपन की बातों को याद करते हैं।।
वो मम्मी के हाथों की मार खाना।
वो पापा का चुपके से चाट खिलाना।।
बड़ी सुनहरी है बचपन की यादें।
भुलाये नहीं भूलती किसी की बातें।।
वो साइकिल से हर रोज़ स्कूल जाना।
अपने दोस्तों को देख खुशी से मचल जाना।
वो क्लास की बेंच में अपना नाम लिख इतराना।
'लो आ गयी तेरी वाली' कहकर दोस्तों का चिढ़ाना।।
बचपन के उन हसीन लम्हों का दीदार करते हैं।
चलो आज फिर एक बार बचपन को याद करते हैं।।
लिफ्ट लेकर उसके भाई को पटाना।
उनकी गलियों के रोज़ चक्कर लगाना।
वो खड़ी स्केल से सर का मारना।
किसी को रोते देख, खुद की आँखें भर आना।।
बहुत सी बातें हैं, कैसे उनका इज़हार करें।
कुछ तुम कुछ हम, मिलकर बातें दो-चार करें।।
काश लौट आये, बचपन के वो गलियारे।
आओ मिलकर यही फरियाद करें।।
चलो आज कुछ खास करते हैं!
बचपन की बातों को याद करते हैं!!!
हिमांशु राजा
बैंगलोर
तुम पे लिखूँ ग़ज़ल व गीत
तुम पे मैंं लिखता हूँ ग़ज़ल व गीत,
तुम हो मेरे जीवन के सच मनमीत।
तुम बिन कुछ भी न अच्छा लगता,
तुम बिन जीवन में न कोई संगीत।।
तुम बिन यह जीवन लगता अधूरा,
आ जाओ तो सचमुच जीवन पूरा।
तुम ही हो मेरे ख़्वाबों की मलिका,
भर दो जीवन के रंग जो है कोरा।।
साथ तेरे लगता जीवन ख़ुशहाल,
वरना जीवन कितना रहा बदहाल।
तुम बिन जीवन कैसा लगता सूना,
तुम संग फेरे लेना मुझे इस साल।।
तुम बिन सूना लगता है मेरा संसार,
तुम हो तो सचमुच, जीवन गुलज़ार।
न कभी बेवफ़ाई करना तुम मुझसे,
अपने से ज़्यादा तुम पर है ऐतबार।।
साथ तुम्हारेबनते हैं इंद्रधनुष से रंग,
जीवन में बहार लगती बस! तेरे संग,
तुम बिन ये जीवन उदास हो जाएगा,
तुमसे ही सीखा जीवन जीने का ढंग।।
तुम बिन शरीर में न लगती धड़कन,
तुम ने जीवन बना दिया मेरा चंदन।
तुमने मेरे जीवन पर किया उपकार,
तुमको दिल से करता मैंं नित वंदन।।
लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
बस्ती, उत्तर प्रदेश
बढ़े चलो- बढ़े चलो
घिरा समस्त विश्व में,
आज अंधकार है,
प्रलय सी बेला लिए,
कर रही चित्कार है।।
करुण अमृत धार लिए,
बढ़े चलो, बढ़े चलो।
सेवा और प्यार लेकर,
बढ़े चलो, बढ़े चलो।।
तेरे त्याग के प्रकाश से,
काली निशा समाप्त हो।
तेरी तपस्या, साधना से,
महामारी का विनाश हो।।
जीर्ण-शीर्ण, रोग-शोक,
क्लेश, दंभ व ढो़ग से,
अधर्म से, अन्याय से,
पाप व्यभिचार से।।
मनुष्यता कराह रही है,
आज मुक्ति चाह रही है।।
मनुष्यता को प्राण दे दो,
नूतन विहान दे दो।।
समस्त ताप, शाप, रोग,
हठी ये विषाणु मिटे।
सब सुखी, सब स्वस्थ,
सभी पवित्र रहे।।
नवीन क्रांति की आज,
उठी पुकार है।
नव सृजन के लिए,
प्रकृति की गुहार है।।
तुम मनुष्यता की,
मशाल थामे बढ़े चलो।
सृजन की अभिलाषा लेकर
बढ़े चलो, बढ़े चलो।।
अंशु प्रिया अग्रवाल
मस्कट ओमान
नारी की मौन व्यथा
आह! मौन भी कलवित
सम्मान भी चर्वित
लगा ठहाके होते गर्वित
देखो फंसी जाल में एक पर्वित
खुद को वो कैद पाती
शीशे की दीवारों में,
मन ही मन दशा पर पछताती,
बजा बजा के ताली
सब मन ही मन हरसाते,
छटपटाती, कह न पाती
व्यथा वो अपनी किसको सुनाती,
कहने को मानुष सरीखे,
क्यों......
फिर भी हृदय न होता द्रवित,
धीरे धीरे कुम्लहा वो जाती
घर की याद बड़ी रुलाती
सभी के दिल को तो बहलाती
खुद के मन की भूल ही जाती
तिल-तिल कर घुट-घुट कर
एक दिन पाई जाती मृत.......
नारी की व्यथा भी देखो
मछलीघर की मीन सरीखी
कभी थी मुक्त, अथाह जल की रानी
शीशे में बंद, मिला जरा सा पानी
कांच के बाहर दुनिया जब दिखती
नित नए नए ख़्वाब बुन लेती
कातर नयन से बांधे टकटकी
बेबस हो अपने आँसू पी लेती.....
नारी की मौन व्यथा
संपूर्ण जीवन की यही कथा
सबला-अबला का कैसा भेद
हर एक यहाँ पर रहती कैद
भुला दिया है जिसने खुद को,
अंतर्मन की व्यथा में....
एक ऐसे मन मे खुद की
पहचान कहाँ से लाए
चलते चलते थक गई है जो...
सपनों की उड़ान कहाँ से लाये
सृष्टि की खातिर जिसने किया विषपान
अपने भीतर वो भगवान कहाँ से लाए
कौरव सभा में बेच दिया हो.....
जिन अपनों ने उसकी मर्यादा को
ऐसे आंखों में स्वयँ के लिए
एक नारी सम्मान कहा से लाए.....
यक्ष प्रश्न यहाँ सबसे बड़ा है
नारी संसार की संचालन धुरी है
तो नारी के सम्मान पर ही,
क्यों दुनिया में चलती छुरी है...
ज्योति धाकड़
आगरा, उ.प्र.
प्रेम
मोहब्बत तो एहसास हैं दिल के जो ख़ूबसूरत होते हैं, पाक होते हैं। प्रेम सभी के दिल में होता है। चाहे प्रेमी और प्रेमिका का प्रेम हो या विवाह के बाद जीवन साथी का, प्रेम तो घटित होता है जरूर।
कभी तो 20 की उम्र में ही प्यार मिल जाता है तो कभी 50 के बाद सच्चे प्रेम की अनुभूति होती है।
कभी मोहब्बत पहली ही नज़र में हो जाती है तो दिल कहता है
तेरी पहली नजर ने
क्या जादू कर दिया
होश तो न रहे
चैन भी खो गया
कभी कभी महबूब धीरे-धीरे समाता है दिल में तो ख्याल आता है कि
पल पल तुम दिल में समा रहे हो
मुझको मुझ ही से चुरा रहे हो
बैचैन दिल को कर रहे हो
एक के इजहार और दूसरे के इकरार से शुरू होती है प्रेम यात्रा
इजहार हमारा स्वीकार कर रहे हैं
वो निग़ाहों से इकरार कर रहे हैं
प्रेम जब भी कीजिए, जिससे भी कीजिए पूरी शिद्दत से और पाक दिल से कीजिए। खुदा का अनमोल तोहफा है इसे पूरे मन से जी लीजिए।
इबादत सी पाक है मोहब्बत हमारी
हो उसकी नवाजिश ये दुआ है हमारी
अदिति
आगरा
प्रार्थना (ए मालिक तेरे वंदे हम)
ए मालिक कोरोना के मारे हम,
तेरे हों रहमों करम,
हाथ जोड़ चलें, दूरी बना के चले
ताकि कोरोना से बच के रहे हम।
ये वायरस चला आ रहा,
ये इंसान को खा रहा,
हो रहा घर में कैद,
कुछ न सूझे मगर,
है तेरी रोशनी में जो दम
तू करदे कोरोना को खतम।।
ए मालिक.............
हम घर में रहें, न बाहर निकले
गले मिलने को कर दें मना,
हर घड़ी हाथ धोएं हम
तेरा आभार करते रहें हम
हाथ जोड़ चले, दूरी बना के चले
ए मालिक।
है परेशान अमेरिका और इटली
लेगा कितनी जानें अभी
है धैर्य धरा, प्रधानमंत्री की सुन लो जरा,
लॉक डाउन का पालन करें हम
तेरी कृपा से जंग जीतेंगे हम।
हाथ जोड़ चलें, दूरी बना के चलें
ए मालिक.........…........।।
गीतांजली वार्ष्णेय
अलोना, बरेली
बन्दी जीवन भी क्या जीवन?
स्वर्ण दीवारों में बंन्धित हों,
कौर मिले चाहे सोने का।
अश्रुपूरित दो नयन भरे हैं,
व्यथित हुआ है अंतर्मन।।
बंदी जीवन भी क्या जीवन। 1।
अरुण वरुण भी दिखते नहींं हैं,
कुंठित हैं सब वातायन।
स्पंदन क्रंदन बंद हुआ सब,
उमस भरा है मूक जीवन।।
बन्दी जीवन...............। 2।
दिन और रात समान लगे अब,
आशा निराशा खत्म हुई।
आत्मबल भी टूट रहा है,
वृथा लगे सारा जीवन।।
बन्दी जीवन................। 3।
स्वप्न जगत के उन्मुक्त गगन में,
पंखों को स्व निहार रही।
इंद्रियां भी शिथिल हुई हैं,
भाव रिक्तिका का सूनापन।
बंदी जीवन....................। 4।
पराधीन सपनेहु नहींं भाई
घना विषाद है हृदयांगन।
अपंग हो रही क्षमताएं भी,
आशा का हर एक कण कण।।
बन्दी जीवन.................। 5।
एक उडान तो भरो दृढ़ता से,
मिल जायेगी कोई सञ्जीवन।
स्व क्षमता पर विश्वास करो तुम,
कर सकोगे स्वयं सृजन,
क्योंकि।
बन्दी जीवन भी क्या जीवन। 6।
अलकाकृति
बदायूं उ0प्र0
बस आंख लग गई
अभी कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में रेल की पटरी पे सो रहे 16 मज़दूर मारे गए। उनके लिए बहुत लोगों ने कहा ज़रूरत क्या थी पटरी पे सोने की। तो मज़दूर की भावनाओ को शब्दों में कहने की टूटी फूटी कोशिश।
पाँव थके थे, मन था हारा।
दूर तलक बस था अँधियारा
चलते चलते सांस थक गई
बाबूजी बस आँख लग गई।।
कर्ज़ की गठरी ढोते-ढोते
रिश्ते नाते खोते-खोते
स्वप्न जो टूट रोते रोते,
मन को थोड़ी आँच लग गई
बाबूजी बस आँख लग गई।।
मत पूछो थी क्या मज़बूरी
मखमल बन गई रेल की पटरी
रोते रोते हँसने बैठे, पल भर को
जीवन को अभिशाप डस गई,
बाबूजी बस आँख लग गई।।
बिखरे पल को चुन ना पाए
मौत की आहट सुन ना पाए
बोझ जो अपने सर लेना था
मौत किसी के नाम कर गई
बाबूजी बस आँख लग गई।।
अब मत कहना हम थे पागल
सच तो है तन-मन था घायल
खट्टी मीठी याद सुनाते,
दिवा स्वप्न ही काल बन गई
बाबूजी बस आँख लग गई।।
दर्द अभी भी टीस रहा है
घर का आँगन खींच रहा है
ऐसा भी क्या साथ निभाना
टूटी चूड़ी कान में कह गई।
बाबूजी बस आँख लग गई।।
आरती
नई दिल्ली
आज पैरेंट्स डे है ना!
अरे वाह कितना अच्छा दिन है।
"आज तो माँ बाबूजी के लिए एक मिठाई का पैकेट
ले लेता हूँ। और क्या लूं कपड़े भी ले लूं क्या?"
मनोज जी ने अपनी श्रीमती जी से पूछा तो वो भड़क गई
"कपड़े ही क्यों झूला ले लो ए.सी. ले लो, ओर भी बहुत कुछ है लेने के लिए महीने दो महीने का खाना पैक करवा लो उनके लिए।
बस मेरे लिए कभी मत सोचना की एक दिन मेरे लिए भी आता है"
मनोज मिश्रा उदास हो बैठे "अरे देवी इतना क्यों भड़कती हो, करता तो हूँ सबके लिए ही। ठीक है तू कहती है तो नहीं लेता हूँ"
इतना सुनते ही श्रीमती जी फिर भड़क उठी "क्या कहा आपने
की मैं मना कर रही हूँ, घर मुझे ही दिखता है सिर्फ, आपको तो कोई फर्क नहीं पड़ता ठीक है ले आओ कपड़े अभी के अभी ले आओ नहीं तो फिर कहते फिरोगे की कपड़े लेने से मेने मन किया था"
मिश्रा जी बड़ी दुविधा में थे सोचा ले ही लेता हूँ और एक कुर्ता पैजामा ओर एक साड़ी खरीद ली।
श्रीमती जी का मुंह फुला देख एक साड़ी उनको भी दिलवा दी। घर पहुँचते ही श्रीमती जी को बोला तू चलेंगी क्या श्रीमती जी ने ऐसी नजरों से देखा कि दोबारा नहीं पूछा।
बड़े खुश हो रहे थे मनोज मिश्रा जैसे अपनी माँ और बाबूजी के लिए बहुत बड़ा उपहार ले जा रहे हों।
घर से निकले थे कि रास्ते में शर्मा जी मिल गए मिश्रा की खुशी देखकर शर्मा जी पूछ बैठे "क्या बात है मनोज मिश्रा जी बड़े खुश हो रहे हो"।
मिश्रा जी बोले- "अरे होंगे क्यों नहीं आज इतना बड़ा दिन जो है"
"अच्छा... वैसे क्या है आज ऐसा"? शर्मा जी बोले
शर्मा जी की बात सुनकर मिश्रा जी उपहास वाली हँसी हँसकर बोले- "वाह शर्मा जी वाह आज पैरेंट्स डे है और आपको पता तक नहीं। देखो मैंं अपने माँ बाबूजी के लिए मिठाई और नए कपड़े ले जा रहा हूँ, आप भी किसी की औलाद है आपका फर्ज बनता है कि नहीं। आज के दिन उनकी देखभाल करने का पर आपको तो खुद के बीबी बच्चों से फुरसत कहाँ। खैर छोड़ो मुझे इन सब बातों से क्या। पर दुख की बात है कि आपको आज पेरेंट्स डे है, इस बात की खबर तक नहीं।"
शर्मा जी मिश्रा की नादानी पर पहले तो हँसे फिर बोले- "वो क्या हैं ना मनोज मिश्रा की हमारे माँ और बाबूजी तुम्हारे माँ बाबूजी की तरह वृद्धाश्रम में नहीं है वो घर पर हैं माँ को थोड़ी सर्दी हो गयी थी उसके लिए टेबलेट लेकर जा रहा हूँ, और क्षमा करना मिश्रा जी मुझे तो सचमुच नहीं पता था कि आज पेरेंट्स डे हैं और ये जो आज आप मना रहे है ना ऐसा पेरेंट्स डे हमारे घर रोज ही मनता हैं"
इतना सुनते ही मनोज मिश्रा की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी।
महेश शर्मा
झालावाड़, राजस्थान।
कॉलेज- एक सफर
एक सफर हैं जो अब खत्म होना बाकी है,
कुछ ऐसे कदम है, जिनको चलना अभी भी बाकी है,
ना जाने कैसे ये कट गए,
ये कॉलेज के दिन आखिर,
जब भी पीछे मुड़ती हूँ तो
बस यादें नज़र आती है,
और फिर उन यादों को लेकर आगे बढ़ना बाकी है।
कई सवालों से घिर चुके है अब हम,
शायद ये वक़्त अब आखिरी है,
मन तो नहीं करता यहाँ से जाने का
फिर भी हमे यहाँ से जाना है,
आखिर ये सफर बिना मंज़िल का है।
मंजिल मिलने की आस लिए आगे तो चलना बाकी है।
कल ना जाने कब कौन कहा होगा,
बस अब उन सब को दिल से लगाना बाकी है,
आंसुओं से सजने वाली
ये आखिरी मुलाक़ात अपनी,
अब तो उन आँखों को रोना बाकी है।
आखिर में सब कुछ कैसे यू बदल सा जाएगा
बस सबको ये यकीन दिलाना बाकी है,
ना चाहते हुए भी अब हमें यहाँ से जाना होगा
बस ये महसूस कराना बाकी है,
कॉलेज अभी भी बाकी है..
कॉलेज अभी भी बाकी है..
रक्षा विश्वकर्मा
माँ - तूम धन्य हो!
माँ ...
तेरा प्यार - दुलार
माँ तेरी ममता
माँ, तूने औलाद की खातिर
क्या - क्या नहींं सहा।
माँ, तुमने मन को मार कर
समय के साथ -साथ
दृढ़ता से जूझ कर
ज़हर के घूंट पी- पी कर
औलाद को तुमने पाला।
तुमने सहे हैं ताने
तुमने खाई है फटकारें
सास, ननद, देवरानी - जेठानी की
प्रताड़नाओं को फ़क़त- औलाद की खातिर
उनकी इच्छाओं - अरमानों को पूरा करने का सपना संजोया था।
माँ, धन्य है तूँ
आँखों की नींद, दिल का चैन -सुकून न्योछावर किया था
औलाद पर।
माँ
आज उसी औलाद के मुख से,
माँ - शब्द सुनने को तरसती हो!
माँ, बड़े जतनों से
मुहँ का नवाला दे कर
सपनों के संसार को
अपनी आँखों के सामने टूटते,
देखने के लिए औलाद को पाला था।
माँ कहाँ गई, तेरी ममता - करुणा दया,
अपनापन की तपस्या -त्याग का फल
क्या तुमने यूँ ही टुकुर टुकुर देखती-देखती,
आँखों में आँसूं छलकते रहने,
ये दिन देखने औलाद को पाला था।
गरजते झंझावतों, सर्दी - गर्मी - धुप की तपन में,
धतनार वृक्ष की तरह जिस औलाद को कलेजे से लगाकर रखा था,
आज उसी औलाद के मुख से....
माँ -माँ ...
सुनने को व्याकुल क्यों हो?
माँ तुम इतनी उदास, विचलित -लाचार सी
घट - घुट जीने को मजबूर
फुटबॉल सी बन
कभी उस औलाद के कभी उस औलाद के लिए,
तुम भार बन चुकी हो
क्या मौत से पहले?
मौत को गले लगाने के लिए
औलाद को पाला था
माँ, तुम धन्य हो!
माँ, तुम
धन्य हो, माँ
धन्य हो! धन्य हो!! माँ - तूम धन्य हो!
मईनुदीन कोहरी
"नाचीज़ बीकानेरी"
मोहल्ला कोहरियान
बीकानेर
इंसान भी रहना
बनना प्रेम की एक धुन, दया का गान भी रहना,
इस जग में सहजता की, सरल पहचान भी रहना,
सफलता मिल जो जाए तो, ये बातें भूल मत जाना,
बनो अफसर चाहे हाकिम, मगर इंसान भी रहना।
न अपनी इस सरलता को, झटके में बदल देना,
सदा ही सादगी के भाव, और मंशा को बल देना,
उडा़ना ना कभी उपहास, किसी लाचार से मन का,
कभी भी बनना न बंधक, किसी संकीर्ण बंधन का,
बसना हर किसी के दिल में, सबकी जान भी रहना।
बनो अफसर चाहे हाकिम, मगर इंसान भी रहना।
बनाए वर्षों के नाते को यूं, बेकार मत करना,
किसी से बदजुबानी या गलत, व्यवहार मत करना,
मिले अवसर तो उस करतार के, चरणों में झुक जाना,
जहां पर रुक जाए संस्कार, वहीं पे खुद भी रूक जाना,
बन जाओ कठिन जितने, मगर आसान भी रहना,
बनो अफसर चाहे हाकिम, मगर इंसान भी रहना।
बनो अफसर चाहे हाकिम, मगर इंसान भी रहना।
विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली
माँ
सबपे कुछ लिखा अब
माँ पर क्या सर्जना करूँ
जिन्होंने स्वयं रचा मुझे
उसपे क्या रचना करूँ
कोई शब्द ऐसा पर्याप्त नहींं है
जिससे माँ की उपमा कर सकूँ
कलम में इतनी स्याही नहींं है
कि कागज़ पर भाव भर सकूँ
माँ से ही मेरा ये अस्तित्व है
माँ की मैंं बस परछाई हूँ
जिसकी गोद ईश्वर खेले
उसकी ममता मैंं पाई हूँ
उस जननी को क्या लिखूँ
जिन्होंने स्वयं मुझे लिखा
बखान तेरी कुछ करूँ
शब्द मुझे न सही दिखा
कर सकूँ गुणगान मैंं
इतनी नहींं औकात है
कलम मेरी मौन पड़ी
बोलती नहींं क्या बात है
तू तो अथाह सागर है माँ
तेरी गहराई न मैंं पाऊँ
दे दे निज चरणों की धूल
अपने माथे पर लगाऊँ
जे. एस. गुर्जर
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
मजदूर हूँ
सारा पसीना बहाता हूँ
क्याेकि मैंं एक मजदूर हूँ
रूखी सूखी राेटी खाता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
अंबर अाैर घरती मेरा बसेरा है
सुख चैन से मैंें रहता हूँ
क्योंकि मैंं एक मजदूर हूँ
मेहऩत की कमाई खाता हू्ं,
जी जान से जीता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
अालिशान मकान, अस्पताल, स्कूल,
खून और पसीना बहाके ब़नाता हूँ
फिर भी झोपड़ी में चैन से साेता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
न गाडी, न बंगला, न माेटर की हमें फिक्र है
छाेटी सी झोपड़ी हमारी बहुत है
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
खुद की जिंदगी पसीने में बहाता हूँ
लाेगाे कि जिंदगी आलिशान बनाता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
काेई मेरा हाल पूछे या न
पूछे मैंं, हर हाल मैंं खुश और मस्त रहता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
नेकी, ईमानदारी, इज्जत दिल में रख के मेहनत करता हूँ
शुक्र अदा मैंं ईश का हमेशा करता हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ
न मान सम्मान का भूखा प्यासा हूँ,
न गले में फूलाे की माला चाहिए
मैंं ताे सीधा सादा मेहनतकश से जीता मजदूर हूँ
क्याेंकि मैंं एक मजदूर हूँ..
जादव नरेशभाई.ऐम. "कवि जाऩ"
मलेकपुर बड गाँव
ता.बडनगर, जि.मेहसाऩा
सच बतलाओ कब आओगे
प्रतीक्षारत तकती हैं आंखें
जिस पथ से तुम आओगे
कितना अब तड़पाओगे तुम
सच बतलाओ कब आओगे..।।
कितनी ऋतुएं बीत गई हैं
उम्मीदों का दामन थामे
मुझे रुलाओगे अब कितना
सच बतलाओ कब आओगे..।।
आज वही पदचाप तुम्हारी
सुनने को लालायित मन है
कितना अब बहलाओगे तुम
सच बतलाओ कब आओगे..।।
बार-बार वादा करके तुम
मुकर भला क्यों जाते हो
कब तक ऐसे झुठलाओगे
सच बतलाओ कब आओगे..।।
स्मृतियों के साथ भला मैंं
कब तक खुद को बहलाऊँ
सच्ची प्रीति निभाओगे कब
सच बतलाओ कब आओगे..।।
सच बतलाओ कब आओगे..।।
विजय कनौजिया
ग्राम व पत्रालय-काही
जनपद-अम्बेडकर नगर
(उ0 प्र0)
कोरोना विषाणु का आतंक
दुनिया भर में फैल रहा
कोरोना विषाणु का आतंक
संचरित होकर कर रहा
मानव जाति का अन्त
दुनिया भर में वैज्ञानिक
खोज रहे वैक्सीन
अपने देश की खोज खबर
क्यों छिपा रहा है चीन
कोरोना से लड़ाई में
जीतेगा भारत देश
घर में रहकर एकता का
देना है संदेश
हर दिवस हर समय
बढ़ रहा है संक्रमण
कोरोना कर रहा है
मानव का भक्षण
खाँसी, छींक और छूत से
फैल रहा यह रोग
स्वयं को घर में क्वारन्टीन करें
रूक सकता है रोग
कोरोना को रोकिए
करिये घर में टास्क
बाहर जाये तो रखे
अपने मुख पर मास्क
इक्कीस दिन का लॉकडॉउन
अब बढ़ा तीन मई
कोरोना से बचाव ही
अच्छा उपाय भई
1 मीटर की दूरी से
करिये सबसे बात
सावधानी ये जरा सी
देगी कोरोना को मात
घर की लक्ष्मणरेखा को
कदापि न लांघे आप
संयम धीरज रखें हृदय में
भाग जायेंगे कोरोना रूपी सांप
हर दिवस लक्षण में
बदल रहा कोरोना रंग
मात देने के लिए
रखिए सैनेटाइजर संग
निहाल छीपा
गाडरवारा
मोबाइल ने सब कुछ छीना
मोबाइल ने इस कलयुग में लोगों का सब कुछ है छीना।
मोबाइल के चक्कर में लोगों का हुआ मुश्किल जीना।।
माता-पिता का प्यार छिना और, दादा दादी का दुलार।
छोटी छोटी बातों पर होता झगड़ा, टूटा संयुक्त परिवार।।
अपने अपने मोबाइल पर लगे रहते और कुछ न किना।
मोबाइल ने इस कलयुग में लोगों का सब कुछ है छीना।। 1
युवाओं का हाल देखो चेटिंग पर लगे रहते हैं दिन रात।
पढ़ाई लिखाई सब भूल गए बड़े बुढो की सुने नहींं बात।।
देर रात तक रहे भूखें प्यासे शरीर को कर रहे है झीना।
मोबाइल ने इस कलयुग में लोगों का सब कुछ है छीना।। 2
लड़के लड़की दोनों को देखो, लुप्त हुए इनके संस्कार।
गपसप बातें मोबाइल पर करते, चाहे पास हो परिवार।।
मोबाइल की लीड लगाकर कानों में, पढ़ाई अब किना।
मोबाइल ने इस कलयुग में लोगों का सब कुछ है छीना।। 3
कलियुगी मां बाप से हाथ जोड़कर मैंं करूं अब पुकार।
मोबाइल मत दो इनके हाथों में घर से होने लगे हैं फरार।।
समय रहते हुए तुम बातों को ध्यान में धर तुम धर लिना।
मोबाइल ने इस कलयुग में लोगों का सब कुछ है छीना।। 4
पूरण मल बोहरा
सवाई माधोपुर राजस्थान
लाकडाउन मे शराब
चुनाव समय पीते है, सत्ता बदलने के लिए।
संक्रमण काल मे पीते, अर्थव्यवस्था के लिए।।
कतार लगे शराबीयो पर, बरसाये गये फूल।
अर्थव्यवस्था के आधार, सत्य बात मत भूल।।
70% अल्कोहल, सेनेटाईजर होना जरूर।
30% पानी शराब मे, हुए शराबी मशहूर।।
लाँकडाउन का पालन, आनलाईन मे शराब।
मियाँ किया मेसेज, बीवी का दिमाग खराब।।
ढूंढते ढूंढते डिलीवरी बाय, पहुंचा घर जब।
बेलन झाडू से स्वागत, डिलवरी हुआ रद्द।।
45 दिन जनता सही, शराब नहींं दरकार।
बिना शराब के शासन, चल न सके सरकार।।
औरो का करके बंद, खोले ठेका शराब।
बंद न हो आयस्रोत, अर्थव्यवस्था खराब।।
तम्बाकू, बिडी, गुडाखू, कोरोना का प्रसार।
शराब मानो पंचामृत, सरकार का प्रसाद।।
कमलकिशोर ताम्रकार
अमलीपदर जिला गरियाबंद छत्तीसगढ़
मन का रंग
"चलिए ना भाभी आज होली है, रंगों से खेलते हैं। "
"नहींं रानू, मन नहींं कर रहा। "
"क्यों, क्या हुआ भाभी?"
भला सफेद रंग से कोई होली खेलता है क्या रानू?
"अरे मेरे पास बहुत सारे रंग है... नीला, लाल, गुलाबी, हरा....बोलो कौन सा रंग पसंद है भाभी आपको? क्या सोच रही हो भाभी?"
"सोच रही हूँ रानू कि जब तुम्हारे भैया थे तो हर रंग रंगीन लगता था और जब वह इस दुनिया में नहींं है तो मन की आंखों से तो हर रंग मुझे सफेद ही दिखाई देता है। रंग केवल आंखों से नहींं देखा जाता रानू, मन से भी रंग दिखाई देता है। "
"हां भाभी आप ठीक कहती हो। यदि हमारा मन खुश है तो पूरी दुनिया खूबसूरत लगती है। आंखों से ज्यादा महत्वपूर्ण मन का रंग होता है। लेकिन जिंदगी को आगे बढ़ाने के लिए मन के रंग को भी बदलना पड़ता है भाभी।"
डॉ चित्रा जैन
बुधवारिया उज्जैन
जिंदगी और मैंं
तेरे राग में विराग में, किंचित नहीं लवलेश हूँ,
मैंं वही तो भारत देश हूँ.....
जब थी गुलाम ये आत्मा, तब भी मैंं तेरे साथ था,
तू कर रहा था सब जतन, आज़ाद हो अपना वतन,
खिलता रहे अपना चमन, तेरे हाथ के थे सब जतन,
तेरे राग में विराग मे, किंचित नहीं लवलेश हूँ,
मैंं वही तो भारत देश हूँ.....
अब आज़ाद है तेरा चमन, तेरा वतन तेरा वतन,
तेरे हाथ से मंडित है मेरा हिमालय से ऊंचा समर,
तेरी नोक हल की जब चले, सिंचित हो मेरा ये बदन,
तेरे राग में विराग में किंचित नहीं लवलेश हूँ,
मैंं वही तो भारत देश हूँ......
ये समय अब ऐसा आया, सुनसान है तेरा चमन,
व्याकुल हैं मेरी आत्मा, कृदन कर रहा परमात्मा,
मुझे माफ़ कर मेरे ललन, क्षमा मांग रहा तेरा वतन,
तेरे राग में विराग में किंचित नहीं लवलेश हूँ,
मैंं तेरा ही भारत देश हूँ.....
तेरी क्षुधा से तमस सा आंखों में मेरी छा गया,
तेरी हृदय की वेदना ने भूकम्प मुझमे ला दिया,
मेरे सत्तादारो ने, मेरे लाल तुझको रुला दिया,
तेरे राग में विराग में किंचित नहीं लवलेश हूँ,
मैं तेरा ही भारत देश हूँ....
हर्ष निःशब्द
झालावाड़ (राजस्थान)
दिल्ली के दिल का दर्द
मैंं दिल्ली हूँ मेरा चर्चा मंदिर और मीनारों से
मेरा रुतबा बहुत बड़ा है महफ़िल और बाजारों से।
देश का इतिहास रचा है मेरे ही गलियारों से
मेरा मस्तक अब तक ऊंचा है आजादी के नारों से।
भारत की राजधानी हूँ देश की धड़कन ही कहलो
जंग ए आजादी हो या कोई भी आंदोलन हो
मैंंने झेली हर पीड़ा बम, गोली और तलवारों से।
मेरा मस्तक अब तक ऊंचा है आजादी के नारों से।
मेरे लिए देशभक्तों ने जान की बाजी लगाई थी
तत्कालीन लुटेरों से तब मेरी जान बचाई थी
निकल पड़े थे देश की खातिर छोड़ छोड़ घरबारों से।
मेरा मस्तक अब तक ऊंचा है आजादी के नारों से।
शरण में सब आए मेरी, उसका सिला क्या मुझे मिला
जात, मजहब के झगड़ों ने छलनी किया मेरा सीना
मुझे डर है अपने ही घर में छिपे हुए गद्दारों से।
मेरा मस्तक अब तक ऊंचा है आजादी के नारों से।
आए थे बड़े बड़े सूरमा एक दिन हस्ती मेरी मिटाने को
बड़े दौर देखे मैंंने भी अपनी पहचान बनाने को
गूंज उठी थी कभी यह दिल्ली जयघोष के नारों से।
मेरा मस्तक अब तक ऊंचा है आजादी के नारों से।
चंचल हरेंद्र वशिष्ट,
वरिष्ठ हिन्दी अध्यापिका एवं कवयित्री, आर के पुरम, नई दिल्ली
राधा कृष्ण
प्रेम की परिभाषा,
मन में अभिलाषा।
राधा श्याम की, श्याम
राधा की आशा।।
पूनम की रात्रि, संगीत;
करें नृत्य सखी।
चंद्र निहारें रास,
देखें प्रेम लीला सखी।।
प्रेम की डोर ऐसी,
बाँधी रंग लाल लिया।
राधा के गालों का,
रंग ही गुलाल किया।।
नैनों में जैसे,
नौकाएं विहार करें।
श्याम, राधा से,
मधुर सा मनुहार करें।।
बंशी जो सुन ली,
राधा का हृदय स्पंद बढे।
श्याम की बंसी, नया
राग, और आनन्द गढे।।
कोमल राधा पैजनी,
जब बजाती हैं।
श्याम का स्मरण करके,
मन ही मन लजाती हैं।।
श्याम भी संगीत,
पैजनी का सुनते हैं।
घँघरू के राग का, वो
स्वप्न सकल बुनते हैं।।
अधरों की लालिमा,
सूरज को मात देती है।
श्याम की दृष्टि, प्रिया
को आघात देती है।।
नैनों ही नैनों में,
संवाद प्रेम होने लगे।
राधिका श्याम की, वो
राधिका के होने लगे।।
करूँ क्या और मैंं,
बखान प्रेमाधारों का।
मेल ये हृदय का, न
शब्द और विचारों का।।
डुबो के रख दिया,
श्रृंगार के कलसुओं में।
कभी संयोग और,
वियोग नीर अँसुओं में।।
नमन करूँ मैंं प्रेम,
और प्रेम भावना को।
मुझे भी दीजो कृपा,
मौका आराधना को।।
मेघा जोशी
खटीमा, उत्तराखण्ड।
उनके फ़िराक से वाकिफ़ न था!!
मुद्दतों बाद मिरे दिल के दहलीज़ के करीब
कोई शिरकत फ़रमाया है,
ज़माने गुज़र गये, पर कोई अज़ीज अजीब
शायद कोई फ़ुरकत में मिरे पास आया है.
रकीबों की बस्ती में, फिरा करता था मैंं
यकीं था सब पर
मगर उनके फ़िराक से वाकिफ़ न था,
बेकल्लुफ़ से जीता था
मगर इत्तफ़ाक से वाकिफ़ न था.
आज नुमाईशों के भीड़ में मुझे कोई अपना बनाया है
ख्वाहिशों की दुनिया में इक सबब मिला,
चाहता रहा, फिर भी बेबस मिला.
नौबत ना आये किसी की, इस कदर जीने की
मुस्कान रहे होठों पर, फ़ुरसत न मिले गम-ए-अश्क़ पीने के,
आज बिन मयकदे के, जाम पी लिया मैंंने
कोई दस्तक दिया इस कदर, बस यही ख़ुशी पा लिया मैंंने,
यादों की बस्ती में, आग लगी है किससे कहूँ-
कि कौन आग लगाया है?
दर-ब-दर मैंं फिरता रहा मारा- मारा,
अपने हबीबों से भी सहारा ना मिला,
ख़ामोश लबों को हम सिल भी सकते हैं
पर इस कदर कोई प्यारा ना मिला.
वफ़ा के चाहत में, आ गये रुस्वाइयों के कगार पर
महफ़िलों में जगह बनाता रहा,
पर संग हो लिए तन्हाईयों के दरकार पर.
रोता हूँ अब मैंं सोचता हूँ,
कि वफ़ा कोई इस कदर आज़माया है
निशां भी नहीं मिलेगा,
यदि मिरी मय्यत जल गयी.
मनाये ना मानेगी, गर इक बार तमन्ना मचल गयी
होश में आओगे जब, सोंचेगें या रब
कोई मिरे यार को इस कदर ज़लाया है.
मुद्दतों बात मिरे दिल के दहलीज़ के करीब
कोई शिरकत फ़रमाया है.
ज़माने गुज़र...
डॉ. ओम प्रकाश रत्नाकर
पता- दानपुर, करमा
मां तेरी बहुत याद आती है
मां तेरी मुझे, बहुत याद आती है।
दुनिया जालिम है, बहुत सताती है।
इससे तो अच्छा मैंं बालक ही रहता,
मतलबी दुनिया, मुझे नहींं भाती है।
तूने मेरी खातिर, कितने दुख उठाए,
मन में छुपा कर रखे, न आंसू बहाए,
मां तुझे किस मिट्टी से बनाया उसने,
तू इतनी ए हिम्मत कहां से लाती है।
वह तेरा मुझे, डांटना फटकारना,
मेरा रूठना, मनाना पुचकारना,
राजा रानी कहानी तेरी जुबानी,
फिर सुना दो अब नींद नहींं आती है।
मां तुम्हें देखकर, मैंं खुश हो जाता था,
आती बाहर से, मैंं लिपट जाता था,
जब लगता था मैंं राजकुमार हूँ कोई,
जो तू हर बात, पूरी कर जाती है।
मां चिंता न कर, पैसा मैंं कमाऊंगा,
भूल गई मुस्कान, वो वापस लाऊंगा,
वह गांव आंगन में, फिर दौड़ लगाऊंगा,
पर बचपन की बहुत याद आती है।
अनिल प्रजापति जख्मी
पता- ग्राम सिमथरा भांडेर दतिया मध्य प्रदेश
वक़्त गुनाहगार
बचपन हमसे छिना जा रहा है,
वक़्त गुनाहगार बना जा रहा है!!
फिरते थे हर गली मोहल्ले,
घर में रहते थे निठल्ले!
जवानी के जख्म कुछ याद दिला रहा है,
वक़्त गुनाहगार बना जा रहा है!!
आजादी के पर होते थे,
आसमान में घर होते थे!
घर के सारे चीजों को,
जोड़ जोड़ कर तोड़ देते थे!
होश संभाला है जब से,
बचपन बहुत रुला जाता!
गम जवानी के नहींं मिटा पा रहा है,
वक़्त गुनाहगार बना जा रहा है!!
ना कोई सोच, ना स्वभाव होता था,
ना कोई जाति, ना मजहब होता था!
जिंदगी एक खिलौना था,
खिलौने से बस खेला जा रहा था!
उम्र दगा अब दिया जा रहा है,
वक़्त गुनाहगार बना जा रहा है!
रविन्द्र सिंह "रवि"
(फार्मासिस्ट )
बुंगा, अल्मोड़ा
उत्तराखंड
भारत में हाइब्रिड स्टडी
Covid -19 महामारी के कारण सभी विश्वविद्यालयों व विद्यालयों ने ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से शिक्षण कार्यों को सुचारु रूप से रखने की पहल की है। इंटरनेट के माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाने की यह तकनीक हाइब्रिड शिक्षण प्रणाली के अंतर्गत आती है।
हाइब्रिड शिक्षण प्रणाली में शिक्षक व विद्यार्थी इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ कम्प्यूटर से जुड़े होते हैं तथा शिक्षक विद्यार्थी को अभिलिखित व्याख्यान (recorded videos) इंटरनेट के माध्यम से साझा करता है। इस अभिलिखित व्याख्यान (recorded video) को विद्यार्थी घर बैठे अपने कम्प्यूटर पर पूरी दिनचर्या में कभी भी देख कर समझ सकता है। तकनीकी व आधुनिकता के मेल से बनी यह क्रान्तिकारी तकनीक एक ओर पठन-पाठन को रुचिकर, सहज व संकेन्द्रण प्रदान करके वरदान साबित हो रही है, वहीं दूसरी ओर उस शैक्षिक अंतराल को भरने में असमर्थ दिखाई दे रही है, जो हमेशा से ग्रामीण व शहरी इलाकों में रहा है। एक ओर शहरी तबका है जो आधुनिक संसाधनों से परिपूर्ण माना जाता है दूसरी ओर सीमित संसाधनों के बल पर मुख्य धारा में सम्मिलित होने के लिए अथक प्रयास करता ग्रामीण तबका।
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति आय शहरी क्षेत्रो में प्रतिव्यक्ति आय की लगभग आधी है। डिजिटल साक्षरता इस प्रणाली की रीढ की हड्डी है जो फिलहाल टूटी नज़र आती है, हाँलाकि इस क्षेत्र में राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन (NDLM) जैसे राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, जिनकी मौजूदा हालत में स्थिति चिंताजनक है। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डिजिटल साक्षरता की दर भारत की कुल जनसँख्या की १.६ % है। देश में सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन होने के कारण हाइब्रिड शिक्षण प्रणाली एक सार नहींं दिखाई पड़ती है। इसकी दिशा में सरकार को और भी ज्यादा प्रभावी कदम सुचारु रूप से उठाने की आवश्यकता है।
गौरव सिंह ( शिक्षक )
खटीमा, उत्तराखण्ड।
तुझे तो और चलना है.....
मत बैठ बीच राह यूं थककर ऐ मुसाफ़िर
कि मंज़िल पाने को अपनी तुझे तो और चलना है।
ना कोई होगा हमराही सिवा परछाई के तेरी,
इसी उम्मीद पर कायम तुझे तो और चलना है।
सफर में लाख मुश्किल हो, कदम ना रोक तू अपने,
ना जाने कितने कांटों पर तुझे तो और चलना है।
सफर माना अकेले ही तुझे करना पड़े पूरा,
मगर एक ख़्वाब भी पूरा तुझे तो और करना है।
तुझे पाकर तेरी मंज़िल को भी हो नाज़ कुछ ऐसे,
ये साबित करने को आगे तुझे तो और बढ़ना है।
मुकम्मल ख़्वाब सोने से कहां होते हैं ऐ नादां,
हक़ीक़त में बदलने को तुझे तो और जगना है।
परिंदे भी हौसलों से भरा परवाज़ करते हैं,
परों को खोल तू अपने, तुझे तो और उड़ना है।
मुश्किलें ज़िन्दगी की यूं कहां आसान होती हैं,
अभी अपने मुकद्दर से तुझे तो और लड़ना है।
इन तूफानों में भी जलता हुआ तू वो चिराग़ है,
कि राहें रोशन करने को तुझे तो और जलना है।
अभी बिखरी कहां खुशबू, तेरी हर एक तबस्सुम की,
कि महकाने को ये गुलशन, तुझे तो और खिलना है।
पवन सोलंकी
सुमेरपुर पाली राजस्थान।
बचपन
इस बचपन को जी लेने दो
ये आनंद रस पी लेने दो
फिर लौट के दिन न ये आएंगे
मीठी यादो बिन हम रह जायेंगे
पलक झपके ही जैसे ये
दिन बदल से जायेंगे
इस भागदौड़ की दुनिया में
हम भी फंसकर रह जायेंगे
इस बचपन को जी लेंने दो
ये आनंद रस पी लेने दो
नर्सरी से ही आरम्भ हो जाती है मारामारी
मम्मी कहती बेटा इस बार फर्स्ट आने की तेरी बारी
पापा के दोस्तों में भी तो शर्ट लगी थी भारी भारी
दादा कहते अव्वल न आये तो समझो नाक कटी हमारी
इन सब की उम्मीदों का, बोझ लदा है मुझ पर भारी
दबी इच्छाये कोमल मन में पर न आ रही उनकी बारी
सोच वीचारु चिंतित मन से, कब खत्म होगी ये भेजामारी
इस भेजामारी से दूर मुझको कुछ क्षण तो जी लेने दो
दोस्त मेरे सब खेल रहे है, मुझे भी तनिक खेल लेने दो
इस बचपन को जी लेने दो, ये आनंद रस पी पीने दो
गुड्डे गुड़िया बाट जोह रहे
बस्ते का हम भार ढो रहे
भाग दौड़ की इस दुनिया में
न जाने हम है कहा खो रहे
हमे भी बगियन में जाकर के
यूं आम तोड़ खा लेने दो
इस बचपन को जी लेने दो
ये आनंद रस पी लेने दो
पापा आपके भी तो बचपन के
दिन कहा वापस आते है
मम्मी आपके भी तो दोस्त अब
वाट्सअप्प पर ही मिल पाते है
फिर हमे भी तो इस बचपन में
थोडा ऊधम कर लेने दो
इस बचपन को जी लेने दो
ये आनन्द रस पी लेने दो
गौरव सिंह घाणेराव
(अध्यापक, कवी, लेखक, विश्लेषक)
सुमेरपुर
वाट्सअप
सब के मन को भाता है
वाट्सअप वो कहलाता है
सुबह को यही जगाता है
शाम को यही सुलाता है।।
प्रेम की धुरी मानो यही है
हिंसा भी भडकाता है
मानव मन यदि व्यथित हो
सुकून भी पल में दिलाता है।।
टूटे रिश्तों की डोर को जोडे
इक जो प्यारा मैंसेज आता है
रिश्तों को बिखराने में भी
वाट्सअप आगे आता है।।
क्या दुनिया रुक ही जायेगी
वाट्सअप बंद हो दो दिन के लिए
क्या समय किसी के पास नहींं
रिश्तों को बाॅधने के लिए।।
वृद्ध जनों की आस को तोडा
मात पिता के साथ को छोडा
आज व्यक्ति बस खुद में मगन है
चौपालौं से मुँह है मोडा
डॉ० रजनी धाकरे
ग्राम- कुशलपुर
मैंनपुरी
राष्ट्रीय रोगों से देश बचाओ
राज धर्म समाज नेताओं संगठित होकर कदम बढा़ओ।
करो चिकित्सा तन मन धन से राष्ट्रीय रोगों से देश बचाओ।
पदलिप्सा, असत्य, परिग्रह, चमचावाद,
भ्रष्टाचार, उत्पीड़न, कदाचार जातिवाद,
शोषण, दुराचार, दमनभाषा प्रान्तवाद,
लूट, खसोट, अपहरण अनैतिकता रुढि़वाद,
रागव्देष, पक्षपात, प्रवंचना भेदभाव,
गुंड गर्दी, चरित्रपतन, दुराग्रह, दुराव,
घूसरिश्वत, दहेजप्रथा, अन्याय, अलगाव,
कथनीकरनी में अन्तर, निर्णयशक्ति का अभाव,
दुरव्यहार, नशेबाजी, मिलावट प्रतिशोध,
कुपप्रथाएं, धर्मान्धता, षड़यन्त्र काम क्रोध,
मानवता का अवमूल्यन, आर्थिक अपव्य,
प्रदुषण, वैमनस्य, अनावश्यक संचय,
योग्यताप्रतिभा का अनादर शिक्षा वैषम्य,
चुनावी भ्रष्टता श्रम बुध्दि का असमंजस्य,
बचो बचाओ इन रोगों से "बाबूराम कवि "जागो जगाओ।
करो चिकित्सा तन मन धन से राष्ट्रीय रोगों से देश बचाओ।
बाबूराम सिंह कवि
विजयीपुर (भरपुरवा)
जिला -गोपालगंज (बिहार)
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
पापी पेट ले गया शहर में,
पत्नी बच्चे ले गया कहर में,
शोषण कितना सहता मां
भूखों कितना मरता मां,
व्यथा कथा बतलाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
रागद्वेष छल छिद्र वहां पर,
लूटपाट सब गिद्ध वहां पर,
पिंजर से प्राण निकाले हैं,
ख़ंजर में छिपे निवाले हैं,
गांवों को स्वर्ग बनाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
रात दिन वहां कटते पीटते,
धूप, बीमारी, सहते लुटते,
सिर पर दुनियां लेकर आए,
सारी कमाई देकर आए,
अब कभी नहींं ठगाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
मेरा गांव कितना सहता,
रोटी देता अपना कहता,
मां बनकर गले लगाया है,
छालों पर मरहम लगाया है,
खेतों को गले लगाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
गांव मेरा कुछ कहता है,
भारत यहीं पर रहता है,
लघु उद्यम लाओ यहां पर,
बाजार लगाओ यहां पर,
बहुत पसीना बहाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
सुनो सरकारों मेरे नाले,
देखो कर्णधार मेरे छाले,
ग्राम स्वराज लाना होगा,
बापू का देश बनाना होगा,
बस, रघुपति राघव गाऊंगा!
मां, रूखी सूखी खाऊंगा!
शहर कभी नहींं जाऊंगा!
--- रमेशचंद्र शर्मा
16 कृष्णा नगर इंदौर
मुसाफिर हूँ यारों
लगातार मजदूरों के पलायन की बातें सुन सुनकर और टीवी, व्हाट्सएप जैसे बहुत से माध्यमों के द्वारा बड़ी ही दुखदाई फोटो देख-देख कर मन बहुत ज्यादा व्यथित हो रहा था। सोच रहा था क्यों ना कुछ मजदूरों के पास जाकर उनकी स्थिति को जाना जाए।
मन के कोतुहल को मिटाने के लिए मैंंने इन लोगो के बीच जाकर इनकी स्थिति को समझने का कुछ प्रयास किया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी करना था और किसी भी तरीके से अपने आप को और दूसरे लोगो को भी कोरोना कि बीमारी से बचाया जाए। इसी विचार के साथ अपने सबसे निकट हाईवे पर पहुँचकर कुछ मजदूरों की परिस्थिति का जायजा लिया।
मैंं अपने घर से निकल कर मेरठ रोड की तरफ चल पड़ा। अभी गाजियाबाद से थोड़ी दूरी पर आया ही था। सिहानी चुंगी के पास से एक मजदूरों की अपार भीड़ देखकर कुछ घबराहट सी महसूस हुई। पलायन करने वाले मजदूरों को मैंं प्रवासी नहींं कहूँगा। अपने ही देश में इस तरीके का नाम पाने का शायद उन्हें अर्थ भी नहींं पता होगा।
मजदूर अकेले नहींं जा रहे थे। छोटे छोटे मासूम बच्चे भी उनके साथ जा रहे थे। वो बच्चे जो मजदूरी नहींं करते हैं। वो अपने मेहनती माता पिता के पूरे दिन मेहनत करने की वजह से स्कूल में पढ़ते है। चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट हो लेकिन जैसे तैसे अपनी पढ़ाई कर रहे थे।
सफर की थकान से लिप्त ऐसे ही लगभग 30-32 साल के एक युवक से मैंंने पूछा भैया तुम लोग इतना पैदल चलकर जा रहे हो। यह जो बच्चे तुम्हारे साथ हैं। कौन-कौन सी कक्षा में पढ़ते हैं। वह मजदूर इतना भी नहींं बता पाया कि उसके बच्चे कौन सी कक्षा में पढ़ते हैं। उसने कहा भैया मैंं इतनी मेहनत करता हूँ। कि मैंं अपने बच्चो को पढ़ा सकूं। बस इसी लगन से 12-14 घंटे किसी ना किसी काम पर लगा रहता हूँ और रात को थक कर सो जाता हूँ। कक्षा का तो मैंं बता नहीं पाऊँगा। बस इस बात की खुशी थी कि मेरे बच्चे पढ़ रहे है।
अब मेरा मन पहले से भी ज्यादा व्यथित हुआ। वह छोटे-छोटे बच्चे जिनके लिए वह मेहनत कर रहा है ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो जाए। उसे पता भी नहींं कि वह कौन सी कक्षा में पढ़ रहे हैं। शायद इतने घंटे की मेहनत के बाद वह इस तरह बेसुध हो कर सो जाता है कि उसे पता ही नहींं चलता कि कब नींद आई और कब रात गई।
खैर इन को छोड़कर मैंं थोड़ा सा आगे निकला और आगे जाकर मैंं एक औरत से मिला। जिसके दो बच्चे थे लगभग दोनों बच्चों के बीच में 1 साल का फर्क था एक 4 साल का और एक लगभग 5 साल का होगा। एक बच्चे को गोद में लिए हुए थी और दूसरा उसके साथ पैदल पैदल चल रहा था। जब पैदल चलने वाला बच्चा थक जाता था तो वह पहले को नीचे छोड़ दूसरे को उठा लेती थी। इसी तरह उन्हें अदल बदल कर अपना सफर तय कर रही थी।
मैंंने उससे पूछा इस तरह कब तक कल चलोगे। तुम्हारा पति कहां है, एक बच्चे को वह क्यों नहींं पकड़ता है। तब उस औरत ने अपने पति की तरफ इशारा करते हुए बताया। कि वह जा रहे मेरे पति जिनके सर पर एक भारी सा बक्सा है। जिस तरीके से भारी बक्सा लिए वो चला जा रहा था उसके लिए बच्चे को उठाना नामुमकिंन था। उसे देखकर मुझसे और कुछ पूछा ही नहीं गया और मैंं दुखी मन से आगे चल पड़ा।
आधे घंटे के सफर में मुझे बहुत ही प्यास लगने लगी। मैंंने अपनी गाड़ी से ठंडी पानी की बोतल उठाई और पानी पीना शुरू किया। अचानक मेरी नजर एक बच्चे की तरफ गई। जो मेरठ रोड पर स्थित पीएनबी बैंक के प्याऊ वाले नल से पानी पी रहा था। मन किया गाड़ी वहां छोड़कर उसी पानी को पीकर देखा जाए। जैसे ही मैंंने उस नल खोला। उसमें से एक दम गरम पानी आया। मेरी उसे पीने की हिम्मत ही नहींं हुई। जिस पानी को को वो बच्चे आराम से पी रहे थे।
इस बीच जगह-जगह मुझे रास्ते में कुछ लोग भी दिखाई दिए। जो कुछ खाने के पैकेट लेकर इन लोगों की सहायता भी कर रहे थे। लेकिन वह सहायता इतनी नहींं थी कि सभी मजदूरों की भूख को खत्म कर सकें। जिसको जहां-जहां जो भी कुछ मिल रहा था। बस वह अपना उससे ही पेट भर कर आगे बढ़ रहा था। मैंं समझ ही नहींं पा रहा था कि इस तरह ये लोग कब तक चलेंगे। जहां तक देख रहा था बस मजदूर ही मजदूर नजर आ रहे थे।
उनके साथ छोटे-छोटे मासूम बच्चे बस अपनी धुन में अपने मां-बाप के पीछे पीछे चले जा रहे थे। उन्हें ना किसी मंजिल का पता था ना यह पता कितना और चलना होगा। बस यह पता था कि अपने मां-बाप के पीछे पीछे चलना है और वह मां-बाप भी अपनी पूरी ताकत से अपनी मंजिल की तरह जल्दी पहुँचना चाह रहे थे।
अपने मन की जिज्ञासा में आकर मैंंने एक बुजुर्ग से पूछा कि क्या घर जाकर खाना पीना मिल जाएगा और इस बीमारी से बच जाओगे। उस बुजुर्ग की आंख में एक आशा दिखाई दी और जुबां पर एक बड़ा ही पॉजिटिव जवाब था। ये तो नहींं पता वहां खाना मिलेगा या इस बीमारी से बचेंगे। लेकिन अपने लोगों के बीच में जाकर कुछ दर्द तो दूर हो जाएंगे। उसकी इस बात से मन निशब्द हो गया।
यहीं से मैंंने वापसी आने का फैसला किया। मन में एक दुख यह भी था। इस पूरे रास्ते में कोई भी सरकारी वाहन, बस या टेंपो मुझे उनकी सहायता करता हुआ दिखाई नहींं दिया। मैंं इन सभी लोगों को अपने मंजिल की ओर बढ़ता हुआ छोड़कर वापसी अपने घर की तरफ चल पड़ा।
लगभग 1 घंटे तक मैंंने इन लोगों से विचार-विमर्श किया और पाया कि इतनी निराशा के बीच हुई इन लोगों के बीच में एक विश्वास था कि वे जल्द से जल्द अपने घर से पहुंच जाएंगे और अपने लोगों से मिल ही लेंगे। शायद छोटे-छोटे बच्चे जो बीच में ही पढ़ाई छोड़ आए हैं वह बाद में पढ़ लेंगे। अगर जिंदा रहे तो वापसी जरूर करेंगे, क्योंकि बड़े बड़े शहरों में रह रहे लोगो को इनकी जरूरत हो या ना हो लेकिन ये लोग कल भी इसी उम्मीद में गांव से शहरों की तरफ आए थे, कि इनके बच्चे पढ़ लिख कर जीवन में आगे बढ़ सकें। इन सबके बीच मैंंने बस यही अनुभव किया कि भारत मे सरकारे आएंगी और जाएंगी लेकिन इन लोगो का समय ना बदला है और ना ही बदलेगा। बस ये लोग अपने जीवन की अच्छी कल्पना की उम्मीद में जीवन भर चलते ही रहेंगे।
नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश )
बेटियां बड़ी प्यारी होती हैं
हमारी होती है या तुम्हारी होती है
पर बेटियाँ बड़ी प्यारी होती है।
आँखों से समझती है माँ के प्यार को
और समझ लेती है पिता के स्वभाव को
बिन कहे ही भाँप लेती है घर के अभाव को
मुस्कुराकर दूर करती है वो हर तकलीफ
चाहे हमारी होती है या तुम्हारी होती है
पर बेटियाँ बड़ी प्यारी होती है।
दो घरों की दहलीज को जोड़ती है ये
दो घरों के सुख को सहेजती है ये
संस्कार सेतु बन पीढ़ियो को समेटती है ये
बेटी तो बेटी ही है वो हर हाल मे
ब्याही होती है या फिर कुवाँरी होती है
पर सच में बेटियाँ बड़ी प्यारी होती है।
सुदीप कुमार त्रिवेदी
पाकुड़ झारखंड
हिंदी
हिन्दी मेरी मातृभूमि है।
हिन्दी अविरल बहती भाषा है ॥
हिन्दी माँ का अनुराग है
हिन्दी पिता का त्याग है
हिन्दी गुरु की परछाई सी
हिन्दी ब्रह्माण्ड की गाथा है
हिन्दी मेरी मातृभूमि है।
हिन्दी अविरल बहती भाषा है ॥
हिन्दी हिन्द का ताज है
हिन्दी विश्व का आज है
हिन्दी है उत्पति सृष्टि की
हिन्दी मन की अभिलाषा है
हिन्दी मेरी मातृभूमि है।
हिन्दी अविरल बहती भाषा है ॥
विशाल चतुर्वेदी ' उमेश '
जबलपुर
समय
मुझे इंतज़ार है
उस क्षण का जब /बेलगाम
भागते समय में
आदमी पकड़ेगा सम्वेदनाओं
की डोर को
उम्मीद के स्वप्न जीवित हो उठेंगे
मानवता कराहती न
रहेगी किसी कूड़ेदान में
या
किसी की आत्मा यूँ भटकती
न रहेगी कहीं सड़कों पर,
रेल की पटरियों पर
या लावारिस मौतों के घटना स्थल
पर,
मुझे इंतज़ार है उस क्षण का
जब एक भी आदमी नहींं मरेगा
आदमी की /संवेदनहींनता से ....
मोहम्मद मुमताज़ हसन
रिकाबगंज, टिकारी, गया, बिहार
कोई दर्द है क्या
सागर मे ये जो लहरें उठ रही है,
पूछो तो जरा इसे भी कोई दर्द है क्या।
तुम दिल मे यूं गुबार सा लिए बैठे हो,
तुम पर अब तलक बाकी किसी शख्स का कोई कर्ज़ है क्या।
महफिलों में भी कहीं गुम से रहते हो,
तुम्हें भी इश्क़ का मर्ज है क्या।
आँखों से तुम्हारी उदासियाँ छलकती है,
अब तलक जहन में किसी शख्स का नाम दर्ज है क्या।
यूं मुस्कुराहटों से मुँह फेर लेते हो तुम,
तुम्हें फूलों के महकने से कोई हर्ज है क्या।
"बताओ तो तुम्हे भी कोई दर्द है क्या"।
प्रमोद कुमार (आवारा)
भरतपुर, राजस्थान
मैंं भी बन जाऊ बुद्ध!
मन का राजा में भी हूँ,
ये विशाल काया राजपाट,
मानस जन्म पाकर,
मैंं भी हुआ निहाल,
बचपन बीता मनमर्जी से,
हठधर्म रहा सदा साथ,
इसके आगे किसकी चलती,
सब झुके बारम्बार,
जब तन उमंग भरता है,
कहां दिमाग कि सुनता है,
दिल के आगे सब बेबस है,
प्रियसी के मोह-रुप मे जब फसता है,
सुख-दुख के इस झंझट से,
उठ रहा है मन में बैराग,
प्रियतम कि आस छोड़ कर,
मैंं भी जाऊ वनवास,
बौद्ध गया कि धरती पर,
मैं भी ढूँढू वन विशाल,
मगन होकर तब तक बैठु,
बोधित्व का ना हो आभास,
इसलिए मोह-माया को छोड़कर,
मैंं भी बन जाऊ बुद्ध!
गौतम के॰ गट्स
युवा कवि, लेखक एवम सामाजिक कार्यकर्ता
सरदारपुरा, जोधपुर, राजस्थान
आतंकवाद....
न धर्म है न ज़ात है
आतंकवाद इक़ ख़ौफ़ है
न इंसान है न ईमान है
हैवान बस हैवान है
आंक़वाद दुनिया का
दहशत का बहुत बड़ा सामान है
बेगुनाहों के कत्ल का इल्ज़ाम है
बेबसों की दर्द भरी दास्तान है
मज़लूमों की, गरीबो की
अमीरों की सब की इस पे मार है
ये आतंकवाद है इसका
कोई नहीं धर्म, ईमान है
दहशतगर्दी की ये पहचान है
सत्ता को पाने की सब की शान है
इंसान इसमें जिंदा बम है
जिंदा लोगो की मौत है
ये देश की नहीं पूरी
दुनिया की मुश्किल है
आओ मिलकर हम सब
इस का ख़ात्मा करे
मिलकर इस नासूर को
जड़ से खत्म करें
खुशहाल दुनिया
खुशहाल इस क़ायनात को बनाए...
आरिफ़ असास...
नर्सिंग ऑफिसर
दिल्ली.....
शिक्षा एवं बच्चे
पानी दोगे तो पौधे निखर जायेंगे,
शिक्षा दोगे तो बच्चे संवर जायेंगे।
संस्कारो की बगिया घनी लग गयी
तो अक्षयवट स्वयं ही पनप जायेगे
शिक्षा दोगे तो बच्चे संवर जायेगे।
दूर ग्रामीण परिवेश के फूल ये,
कुछ जरुरत व सुविधाओं से दूर ये
पुत्रवत प्रेम रुपी मिला जल अगर,
पेड़ बन छाँव जग को ये दे जायेगें
पानी दोगे तो पौधे निखर जायेगे,
शिक्षा दोगे तो बच्चे संवर जायेगे।
हम है शिक्षक निभाएंगे अपना धरम
सींचकर पुष्प कालिया खिलाएंगे हम
मानवी रूप से ध्यान देंगे अगर,
ये सितारे है नभ में चमक जायेगे।
पानी दोगे तो पौधे निखर जायेगे।
शिक्षा दोगे तो बच्चे सुधर जायेगे।
कवि-विपिन त्रिपाठी
(स0अ0, स्काउट मास्टर) बेसिक शिक्षा, टंडियावा, हरदोई
मेरे देश के वीर जवान
1 सरहद की रक्षा के लिए डटे वीर बलवान है।
तन-मन जीवन समर्पण करता नौजवान है।
माँ भारती की रक्षा में प्राणों की आहुति देता।
देश रक्षा का दृढ़ संकल्प लिए वीर जवान है।
2 देशभक्ति की ज्वाला धधकती सीने में तूफान है।
अखंडता का दीप जलाता, शौर्यता की पहचान है।
राष्ट्रहित ही सर्वोपरि सीमा के सिपाही के लिए।
प्राण पुष्प अर्पित करता, माँ भारती की संतान है।
3 सीमा का सिपाही, देशभक्त, वीर जवान है।
बाधाएं कितनी भी आए, देता हर इम्तिहान है।
बाढ़, सूखा, भूकंप, महामारी या हो युद्ध की तैयारी।
हर मुश्किल से डटकर लौहा लेता मेरा वीर जवान है।
सुन्दर लाल डडसेना"मधुर"
तह.-सरायपाली, जिला-महासमुंद(छ. ग.)
पिता
एक उम्र चढ़ी थी कंधे पर,
एक उम्र हुई थी कंधे की।
इक जिंदगी तैयार खड़ी थी,
इक उम्र थी अब ढलने की।
इक को उड़ कर छूना आसमान था।
इक का वही तो केवल जहान था।
एक बुन रहा था सपने पंखों को फैलाने की,
एक की ज़िद्द थी उसके सपनों को पूरा करने की।
एक अपने सपनों को पाने,
सुदूर उड़ान भर गया।
एक की आँखे खूब बरसी,
फिर भी दिल से आशीष दिया।
एक रचता बसता गया वहाँ,
एक रास्ता ही तकता रहा यहाँ।
एक जीवन के बन्धन में बंधने लगा
इक अब जीवन के बंधन से मुक्त होने चला।
सो चुकी पलकों में इंतज़ार उसका था।
आंखों में आज भी उसका ही चलचित्र था।
उसकी अंतिम यात्रा को
जाने कितनों ने उसको कंधा दिया।
पर वो कंधा ना मौजूद था
जिसका सपना लिए वो मरा।
अर्चना श्रीवास्तव
लखनऊ
प्रकृति की देन
हे प्रकृति! तुम कितनी कोमल
कितनी शीतल, कितनी निर्मल।
नदियां बहती सतत ही अविरल,
नीर बहाए वो सदा ही निर्मल।
तरु दिए तुमने, कितने प्यारे
जिनसे मिलते बहुत सहारे।
प्रसून भी उनके प्यारे प्यारे,
जिनकी छटा खुद ईश निहारे।
पर्वत भी फैले है चहुं ओर,
मानो खड़े पहरेदार कठोर।
औषधियां बूटी उनमें घनघोर,
सुंदरता से मन ले रहा हिलोर।
मानव तुमको बहुत सताते,
करके दोहन तुम्हे रुलाते।
सारे रत्न धन तुमसे ही पाते,
काश तुम्हे सब शीश झुकाते।
अनुज पटैरिया
(इंचार्ज प्रधानाध्यापक)
प्राथमिक विद्यालय - टिकरिया
चित्रकूट
उसका घर
घर में रह कर,
मैंं घर का मोल समझ गया...
तन्हाई अब रास नहींं आती...
घर में रह कर
मैंं घर का माहौल समझ गया...
वो बाबा का दरवाज़े पे टकटकी लगाना...
अम्मा का बेवजह आंगन में आना जाना...
चौका बरतन बुहारी
करते करते उसका यूं बच्चों पर झुंझलाना ...
घर में रह कर
मैंं उसके घर की धड़कन समझ गया...
कुछ सपनो को जोड़ वो आई थी...
सब अपनो को छोड़ वो आई थी...
घर की इस बगिया में कुछ फूल नए खिला...
घर में रह कर
मैंं उसके घर की महक समझ गया...
स्नेहदिल नरेश चावला
जोधपुर, राजस्थान
एक सीख
बड़े नाजों-नखरों से पाला है
गंवा ना देना लाज लाडो।
रखना ख्याल के मिटते नहींं
इज्जत पर लगे दाग लाडो।
भाई तेरे चलते सीना तान कर
भूल कर भी ना भुला देना।
अपने पिता के सर का ताज हो
सर उनका ना झुका देना।
सथ में बैठकर बोल सके
इतना बस मान रखना।
झुकने ना देना कभी तुम
ऊँची हमेशा शान रखना।
उम्र भर ना भूलना तुम
जो पाठ आज पढ़ा रही हूँ।
ना मां के नाते, ना गुरु के नाते
सखी बनकर समझा रही हूँ।
भले ही रोशन ना कर सको नाम
पर कभी बदनाम ना करना।
जिस डर से कोख में
मार दी जाती है बेटियां
ऐसा तुम काम ना करना।।
ओमदीप वर्मा
बीकानेर, राजस्थान
बेटियों का महत्व
लड़की समाज के लिए हमेशा आशीर्वाद रही।
वहीं संसार की निरंतरता का कारण सही।।
त्योहारों पर देवियों की पूजा करते।
घर की महिलाओं के प्रति थोड़ी-सी भी
दया महसूस नहींं करते।।
लड़कियाँ समाज का आधार स्तम्भ।
बच्ची, बेटी, बहन, पत्नी, माँ के रूप में
दूर करती जीवन के तम।।
मैंं पूछती हूँ, समाज से-
लड़कियों के बारे में सत्य जानने के बाद भी
लोगों की आँखें क्यों न खुले फिर से...
लोगों की आँखे क्यों न खुले फिर से...
श्रीमती रूपा व्यास,
चित्तौड़गढ़(राजस्थान)
मेरा गाँव
अम्मा की जगह,
मम्मी ले ली,
बापू की जगह,
पप्पा!
महुआ की जगह,
समोसे खाते,
पेट न हो रहा सफा,
नींद न आती खासी!
पानी की जगह,
वाटर हो गया,
हँसिया की जगह,
लिया मोबाइल!
गाँव छोंड़ शहर को भागा,
आया कोरोना,
भागे शहर से,
गाँव में ही शरण पाया!
अब न जैहैं कभी,
शहर ए,
ठाढ़े ठाढ़े नाम सुनत ही,
थर थर थर काँपैं!!
सतीश "बब्बा"
आज फिर बहुत टूटा हूँ मैंं
प्रचण्ड वेदना से फूटा हूँ मैंं,
आज फिर बहुत टूटा हूँ मैंं।
प्रचण्ड वेदना से.....
भाग्य ने भी किया है उपहास
छाया ने भी किया है निराश
सावन ने तृप्त किया सबको
मिटा न पाया मन की प्यास
प्यास अपनी अधरों पर लिए,
व्यथित हूँ , अंतर से घुटा हूँ मैंं।
प्रचण्ड वेदना से.....
देकर सब कुछ फिर ले लिया
घूँट केवल आँसुओं का दिया
ले - देकर शून्य कर भावों को
बोलो कर्म क्या विशेष किया
छला गया हूँ निष्ठुर नियति से,
हर पग पर नियति से लुटा हूँ मैंं।
प्रचण्ड वेदना से.....
अब तक जिसका अपना था मैंं
भावों की मधुर कल्पना था मैंं
जग से कहीं अधिक ऊँचे का
नयनों का मोहक सपना था मैंं
दूर हुआ हूँ उसकी ही छाया से,
उसके स्नेह बंधन से छूटा हूँ मैंं।
प्रचण्ड वेदना से.....
मुकेश शर्मा
पिता - स्व. श्री रामदयाल शर्मा
मुस्कान
जिंदगी कुछ ऐसा आसान चाहिए
हरेक अधरों पर मुस्कान चाहिए..
जज़्बात उड़े सब पतंगों संग संग
हौसले बुलंद और जवान चाहिए..
सहयोगी बने हर एक राह में ही
हमेशा साथ दे वो इन्सान चाहिए..
इंसानियत को जो शर्मशार करे
जगत में नहीं ऐसा हैवान चाहिए..
दया करूणा प्रेम हो सर्वोपरि
भावनाओं में भगवान चाहिए..
कुकर्म-पूर्व जिसका चित कचोटे
संस्कार से सजी सन्तान चाहिए..
पीर समझे जो हरइक जीव की
दिलों मे जीवित ईमान चाहिए..
मुख मुस्कान सजाना न आसां
पीर भूल हँसाने का अरमान चाहिए..
यूँ दूर न होती दुःख दर्द ग़रीबी
एहसासों का धनवान चाहिए..
पुष्प से खिलते चेहरे मुस्कान से
कोई दानी धनी धैर्यवान चाहिये..
अनामिका वैश्य आईना
लखनऊ

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