प्रतियोगिता #07: किसान की व्यथा विषय के प्रतिभागी
दिनांक -19जुलाई 20
दिन --रविवार
विद्या -कविता
विषय-किसान की व्यथा
1 कृषक की वेदना
भूमिपुत्र भारतीय अर्थतंत्र का विधाता।
आज स्वयं बना फकीर,
उसकी दशा हृदय देती चीर।
अन्नदाता के घर में पड़े अन्न के लाले,
अपनी बिगड़ती हालत कैसे सम्हाले??
बिचौलियों ने किए उसके दिन काले,
छीन लिए इनके मुख से निवाले।
मिट्टी के मोल बिकती हैं फसलें,
बिचौलिए नहीं सही कीमत उगलें।
दो पाटों के बीच पिसता है घुन-सा,
समझ नहीं पाता है दोष किनका?
ऋण माफी की लगाता रहता गुहार,
कागज़ों में पूरी होती उसकी पुकार।
कैसे दुर्दिन किसानों के आए?
रोज एक किसान फाँसी चढ़ जाए।
तड़पता हृदय मन जार-जार रोता,
किसानों का दर्द कहां कोई कहां सुनता!!
झूठे दिलासों से कहीं पेट भरे जाते हैं,
किसानों को नेता झूठे सपने दिखाते हैं।
चिंता में डूबा कृषक चिता चढ़ जाता है,
परिवार उसका कितनी ठोकरें खाता है।
चुनाव में कृषक बड़ा मुद्दा बन जाता है,
चुनाव के बाद कोई देखने नहीं आता है।
अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
2 किसान की व्यथा
आसमान से ओले आते देख आंख भर आयी ।
बने विधाता वाम कृषक ने कैसी किस्मत पायी ।।
कर परिश्रम्य असीम खेत में बीज कृषक ने बोया ।
चाम हो गया श्याम घाम से रात नींद अति सोया ।।
जमा बीज जब देख देखकर हुआ हृदय हरषायी ।।-.--.--.--.--.--.-१
नीद गुडाई करी कुटुम्ब संग ,सींच सींच श्रम भारी ।
किया कलेऊ बैठ कदम्ब तर ,जल भर लायी नारी।।
किया हास परिहास विगत श्रम , हाथ कुदाल उठायी ।।-.--.--.--.--.--.-२
लगा के बारी कर रखवारी बीत विभावरी जाती ।
रोज रोज और नील गाय के कारन नींद न आती ।।
मेङन मेङन करत रतजगा , गावत फाग दिवायी ।।-.--.--.--.--.--.--.-३
खेत लहलहा देख कृषक तब मन में है हरषाता ।
बरष जाहि में ब्याह बिटू को लगता करत विधाता ।।
कंगन कर्ज में रखे कबैके , अबके लेहु उठायी ।।-.--.--.--.--.--.--.--.--.-४
घटा घिरी घनघोर चहु दिश गया हृदय घबरायी ।
सोचा क्या क्या आज प्रभू जी कैसी विपदा आयी ।।
दौङा दौङा गया खेत पर गिरा भूमि भररायी ।।-.--.--.--.--.--.--५
आसमान से ओले आते देख आंख भर आयी ।
फसल नष्ट सी देख दुर्दशा हारा हिम्मत भायी ।।
चढ़ बबूल पर वाही दिन को फांसी गले लगायी ।।-.--.--.६
प्यारे ऐसा न करते तुम , मेहनत मजदूरी करते ।
पीले हाथ अपनी बिटिया के, सम्मेलन में करते ।।
सोची समझी नहीं सजन ने , आफद दई बङायी ।।
बने विधाता बाम कृषक ने,कैसी किस्मत पायी ।।.......॥॥.७
राजेश तिवारी "मक्खन"
झांसी उ.प्र.
3 किसान की व्यथा
पूरे देश को पालता है
खुद भूखा रह जाता है
पूरा जीवन इसका तो बस
मेहनत में ही जाता है l
किसान खेतों में, काम हैं करते
रात दिन वो मेहनत करते
तभी कहीं जाकर हमारे
घरों में खाना आता है
ये खुद करते हैं, मेहनत
तभी हमारे परिवार का
पेट भर, पाता है l
लेकिन इसी किसान की तरफ
किसी का ध्यान ही कहाँ जाता है
जब हम गर्मी- सर्दी में
घरों में दुबक के रात बिताते हैं
तब ये किसान, खेतों में
मोटरों पर रात बिताते हैं l
क्या इनको गर्मी नहीं लगती
क्या इनको "ए सी" नहीं भाता
क्या इनको खेतों में बैठे
परिवार का ख्याल नहीं आता
सब कुछ होता है दोस्तो
पर इनको इनका ये काम
इज़ाज़त नहीं देता l
लेकिन आज किसान की हालत
बहुत ही नाजुक, हुई पड़ी है
जब - जब आता है, कोई संकट
इनको बड़ी मार झेलनी पड़ी है l
यही किसान ,यही अन्नदाता
कई बार कर्ज़े के नीचे है दब जाता
तब कोई नहीं सुनता पुकार इनकी
जब ये कर्ज ना चुका पाने के कारण
फांसी के फंदे पर है, झूल जाता l
करमजीत कौर
शहर- मलोट
जिला श्री मुक्तसर साहिब, पंजाब
4 मैं खेतिहर किसान हूँ
माटीपुत्र कहाने वाला,मैं खेतिहर किसान हूँ।
ऋण में जीता ऋण में मरता,भारत की पहचान हूँ।।
अपढ़ देहाती सीधा-सादा, सुख-संतोष ही पूंजी है।
ठाट-बाट से कोसों दूर, तन पर एक लंगोटी है।।
छोटी-सी कुटिया के वासी, मैं बापुरा नादान हूँ ,
ऋण में जीता....।।1।।
थोड़ी सी जमीन है मेरी,घरवाली और बच्चे।
माता-पिता की देखभाल,सब कुछ मेरे जिम्मे।।
श्रम की पूजा करनेवाला, मैं कर्मठ इंसान हूँ,
ऋण में जीता...।।2।।
हल-बैलों के साथ सबेरे,खेत जोतने जाता हूँ।
फसल उगाता सींच पसीना, सबको अन्न खिलाता हूँ।।
भूखा रहकर भूख मिटाता, धरती की संतान हूँ,
ऋण में जीता......।।3।।
घोर गरीबी और महँगाई, सदियों से है निगल रहा।
सेठ जमीदारों से शोषित,मैं लाचार तड़प रहा।।
मंदमति मैं भोलाभाला, दुनिया से अनजान हूँ,
ऋण में जीता......।।4।।
खुले हाथ देते रहना ही, मेरा शाश्वत धर्म है।
त्याग और सेवा ही जग में, मेरा जीवन-कर्म है।।
जन्मभूमि की सदा सर्वदा, गाता मैं गुणगान हूँ,
ऋण में जीता.......।।5।।
लीलाधर प्रजापति
बलौदा बाजार
छत्तीसगढ़
5 धरतीपुत्र की व्यथा
दिन रात बहा पसीना,कृषक खेतों अन्न उगाता है।
मेरे गाँव का किसान,अभाव में जीवन बिताता है।।
स्वयं अभाव जीता,पर वो हर घर खुशियाँ लाता है।
मौसम कैसा भी हो, वह अथक परिश्रम करता है।।
मधुर झंकार पायल की,उसे कहां बहका पाती है।
खेतों में लहराता धान,उसे बहुत सदा लुभाता है।।
पसीना ओस बन पत्तियों पर,जब भी चमकता है।
उसे देख कर ही,कृषक चेहरा सदा ही दमकता है।
जय किसान का, बस उसे नारा ही दिया जाता है।
वो गर ना करें मेहनत, सोचो क्या आलम होता है?
नहीं कद्र मेहनत उसकी,अन्न व्यर्थ फेंका जाता है।
नहीं मिलती पसीने की कीमत,अभाव में जीता है।।
उसकी किस्मत रची विधाता,कर्जदार बन जीता है।
भारत का वह अन्नदाता,बेबस सा जीवन जीता है।।
ना मिला प्रशस्ति पत्र,उसे अपनी मेहनत का कभी।
मौसम देता दगा ,और वह खून के आँसू रोता है।।
कभी लगा लेता फांसी,कभी घुट घुट वो मरता है।
जग पालन कर्ता, देखो क्या हस्र उसका होता है।।
फटे कपडे़ पहन जीता,धोखा ना किसी को देता है।
बहा पसीना काम करता,चैन की नींद वो सोता है।।
नहीं चाहता कुछ ज्यादा,मूल्य मेहनत मिले आधा,
सबके हो अरमान पूरे,बस इतना ही वो चाहता है।।
देख छोटे छोटे सपने,मेहनत कर पूरा वो करता है।
ईमानदारी रख, देश के विकास में हाथ बढ़ाता है ।।
वीणा वैष्णव "रागिनी"
राजसमन्द
6 मन की व्यथा
वो भूमि से अन्न उगाता ,
अन्नदाता कहलाता है।
कड़ी धूप या आंधी पानी,
मेहनत से न घबराता है।।
इस बार फिर सोचा था,
अच्छी फसल उगाना है।
मेहनत करके रात दिन ,
उपज खूब बढ़ाना है।।
बिटिया हुई बीस की अबकी,
उसका ब्याह रचाना है।
अपनी पत्नी को भी अबकी,
नई साड़ी दिलवाना है।।
सपने आंखों में पाले थे,
मेहनत भी भरपूर करी।
बारिश, आँधी कड़ी धूप,
उसकी न परवाह करी।।
अंकुर फूटा फसल उपजी,
मन में हरियाली छाई।
लेकिन प्रकृति के आगे,
कब किसकी है चलने पाई।।
ओले बारिश ने देखो,
फसलों को बर्बाद किया।
कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ ने,
किसानों को एक दर्द दिया।।
अपनी व्यथा किससे कहूँ,
आँखों में सिर्फ पानी है।
हर वर्ष ऐसी ही किसानों की,
कोई न कोई कहानी है।।
शहनाज़ बानो
चित्रकूट, उ०प्र०
7 वो किसान है
"नहीं हम बीज, अपना खूं-पसीना डाल देते हैं.
धरा को सींचकर, उससे फसल निकाल देते हैं.
नहीं कीमत हमें मिलती है उतनी जितनी की मेहनत,
मगर फिर भी हम लाखों का पेट पाल देते हैं."
जिसका पसीना करता माटी का सम्मान है,
वो किसान है...
अन्नदाता होने का जिसको वरदान है,
वो किसान है...
कभी समाज, कभी प्रकृति की मार झेलता है.
फिर भी खेतों में अपनी किस्मत से खेलता है.
न थकता, न हार मानता, कैसा इन्सान है,
ये जो किसान है...
मेहनत की हर पराकाष्ठा को पार कर जाते हैं,
उचित मूल्य अपनी फसलों का फिर भी न पाते हैं.
अपनी फसल के असली मूल्य से जो अन्जान हैं,
ये जो किसान है...
संग अपनी फसलों के ये कर्ज भी बोते हैं,
कर्ज न चुका पाते तो ये फंदों पर भी होते हैं.
कभी कभी ये टूट जाते हैं, पर बलवान हैं.
ये जो किसान हैं...
इनके व्यथा की कथा सुना रहा हूँ ताकि तुम समझो,
अपने जैसे ही हैं, उनको तुम अपना समझो.
वो भी मेरे तुम्हारे जैसे ही इन्सान हैं...
ये जो किसान हैं...
सुनील गुप्ता 'श्वेत'
मोहाली, पंजाब
जन्मस्थान - आयोध्या जी
8 कैसे भूल गया हिंदुस्तान, जय जय अन्नदाता किसान
*कैसे भूल गया हिन्दुस्तान*..
*जय जय अन्नदाता किसान*।
*रूखी सूखी ,आधी अधूरी*
*रह कर भूखे, फसलें उतारी,*
*ले जाये जमींदार फसल आधी*,
*ले गया महाजन ,सूद में तुम्हारा आधा धान*।
*कैसे भूल गया हिन्दुस्तान*...
*जय जय अन्नदाता किसान*।
*धरती सींचे बहा पसीना जैसे नीर*,
*बंजर भी सोना उगले सीना चीर*,
*दुनिया सोये चैन से पूरी पूरी रैन*,
*किसान जागे रात भर फसलों का रखे ध्यान*।
*कैसे भूल गया हिन्दुस्तान*...
*जय जय अन्नदाता किसान*।
*कलाकार के बच्चे कलाकारी*,
*नेता के बच्चे करे नेतागिरी*,
*रखे सभी अपनी अपनी नस्लो का ध्यान*,
*गोली पत्थर खाये फौजी बेटा जवान*,
*परिवार संग आत्महत्या करे ईमानदार किसान* ।
*कैसे भूल गया हिन्दुस्तान*
*जय जवान,जय किसान*।
*तुम को शत शत प्रणाम*
*देश के अन्नदाता किसान*।।
*स्नेहदिल* नरेश चावला
जोधपुर - राजस्थान
9 किंमत जिसकी अनमाेल
कि- किंमत जिसकी अनमाेल
सा- सारे जहां का भरता वह पेट
न - मेहनत का न मिला सही माेल
इन्हीं तीन लाईने में
कह दिया मैने बहुत कुछ
राजनैतीक पार्टीया इनके
हित की बात करती
बहुत कुछ
देती नही कुछ भी
चुस लेती बचा हुआ
खुन बहुत कुछ ।।
ईश्वर भी खेलता
इनके साथ बडे खेल
कभी जादा बारीश
कभी कम
कभी सुखे अकाल में
निकाल देता
इनका तेल।।
फिर भी डटा रहता
कर्म पथ पर
हमें गर्व हमारे इन
धरती मां के सुपुत्राे पर ।।
किसानाे की व्यथा
शब्दाें में
आसान करना है बंया
पर जाे स्वयं भुक्तभाेगी
उसकाे काेई न
समझें यहां ।।
इनके जीवन भर
यही रहेगे हाल
ईश्वर भी नही देता
इन्हे प्रकृति रूपी साथ
गलती से कभी सब
ठीक रहा हाे
सरकार कर देती बेहाल।।
यही मेरा कहना
मानाे या न मानाे
न जाने कब दाैडेगे ये
सरपट तेज चाल ।।
सतीश लाखाेटिया
नागपुर ( महाराष्ट्र)
10 व्यथित किसान
देख मुरझाती फसल को व्यथित है किसान,
झांकता अंबर को पल-पल, पपैया सामान।
अन्नदाता की दशा हो गई है खराब,
खेत के किसी मोड़ पे देखता नव ख्वाब।।
रोदन मन में छिपाए नई आश ली ठान,
देख मुरझाती फसल को व्यथित है किसान।
बदन पे पसीना मंद आवाज में खड़ा है,
क्या होगा हमारा, इसी प्रश्न से वह लड़ा है।
तपन भूमि से फसल छोड़ रही जान,
देख मुरझाति फसल को व्यथित है किसान।
नित करता अपनी हालत की बयां प्रभु को,
स्वप्न को बूझते देख वह कैसे रोके अश्रु को।
नाव है डूबती उसकी, सुने कौन बखान,
देख मुरझाती फसल को व्यथित हैं किसान।।
कमल कालु दहिया
जोधपुर, राजस्थान
ई - मेल - kaludahiya082001@gmail.com
11 किसान की व्यथा
क्यों आज लाचार है वो,
देश का पालनहार है वो।
मत सताओ इतना उसे ,
आखिर एक इंसान है वो।
नहीं है सीसी टीवी खेतो में,
तम तिमिर में काम करता है वो।
चंद निर्थक नीतियों के कारण,
फसल कौड़ियों में नीलाम करता वो।
सपने दिन रात सजाता है ,
फसल बिकेगी दिन सुधरेंगे,
ऐसे ख्याब नित सजाता है वो।
ऊपर - नीचे वालो के कारण
आत्महत्या करता है वो ।
देख कृषक की करुण दशा ,
अंतरमन हो रहा भावन है ।
उसका छुआ हर कण- कण,
देखो हुआ कितना पावन है ।
अनुज पटैरिया 'आदिशेष '
(इंचार्ज प्रधानाध्यापक)
उरई,जनपद जालौन
उत्तर प्रदेश।
12 मेहनत किसान की
आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,
दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।
जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,
तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।
गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,
मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।
बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,
कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।
जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,
सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।
मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,
कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।
दूसरों का पेट भर, अपनी तो जान दी,
आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।
रवि श्रीवास्तव
रायबरेली
13 अन्नदाता
क्या सुनाऊं मैं व्यथा शब्दों में किसान की,
उनके अरमान या उनके बलिदान की!
लिख नहीं रही मैं कल्पना के शब्द आज,
लिख रही हूं सच्चाई, क्योंकि मैं खुद बेटी हूं किसान की!
जोखिम उठाता है एक किसान जितना,
नहीं उठा सकता एक उद्यमी उतना!
नफा हो या घाटा,लगा देता है पूंजी,
जो भी मिलेगा प्रभु भाग्य था इतना!
लहराती फसलों को देखकर होता है प्रफुल्लित,
तो सूखे पौधों से मन होता है व्यथित!
भादों की चिलचिलाती धूप हो या हो बारिश,
हौसला किसान का होता है अडिग!
बात आई है किसान के व्यथा की,
तो व्यथा एक और सुनाती हूँ,
विपणन केंद्र का मैं दृश्य दिखाती हूं!
नहीं होती सुविधा वहां क्रिकेट स्टेडियम सी,
पड़े रहते हैं दिन-रात अनाज मैदान में!
मच्छर काटे या काट जाए कोई जीव,
पड़ा रहता है किसान भी उसी अन्न के बीच में!
मेरी लेखनी भी नमन कर बैठी है आज,
जब लिखना पड़ा बारे में,अन्न के भगवान के!
धन्य हो किसान!!
मैं नतमस्तक हूं आगे तुम्हारे, हर बलिदान के!!
शिल्पी शहडोली
शहडोल, मध्यप्रदेश।
14 विषय किसान की व्यथा
विधा कविता
कोरोना जब से है आई
नही हो रही कमाई
फसल बेच जो पैसा हमने थी पाई
घर बैठ परिवार की खर्च है चलाई
और बढ़ गई फिर महंगाई
ऊपर से बरसात है आई
खाद बीज ने चिंता बढ़ाई
कैसी हो निंदाई गुड़ाई
लॉक डाउन मे काम नही कोई
बंद हो गई हमारी कमाई
अब राशन न पैसा आई
घर मे कैसी बिपत है छाई
एक किसान की व्यथा सुनाई
लॉक डाउन ने कथा बनाई
महेत्तर लाल देवांगन
बिलाईगढ़ छत्तीसगढ़
15 किसान की व्यथा
किसान हैं देश के अन्न प्रदाता,
इनके कारण ही हमें भोजन है मिलता,
तपती धूप में परिश्रम करते हैं ये सदा,
तब जाकर अन्न का भंडार भरा रहता है सदा।
करते हैं ये माँ वशुन्धरा की सेवा मनोभाव से,
अपने पूर्वजों के कार्य को बढ़ाते हैं आगे बड़े ही गर्व से,
मगर क्या इनको उचित सम्मान है मिल पाता,
क्यों इन्हें ही भर पेट भोजन नहीं है मिल पाता।
आये दिन अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं,
किसानों की समस्याओं के समाचारों से,
कभी किसी किसान के आत्महत्या कर लेने से,
तो कभी किसी के परदेश पलायन कर जाने से।
कभी झेलते हैं ये मार सूखे की,
तो कभी आती है आफत बाढ़ की,
प्रकृति भी देती है इन्हें अक्सर ही धोखा,
रोते-रोते ही गुजर जाता है जीवन इनका।
कर्ज में डूबे रहते हैं हमारे अन्न प्रदाता सदा,
इन्ही के घर अक्सर बुझ जाता है चूल्हा,
भर तन कपड़े को भी ललक जाते हैं इनके बच्चे,
त्योहारों में भी उदासी छायी होती है घर पर इनके।
सरकारें बनती गयीं और बिगड़ती गयीं,
किसानों की समस्याएँ ज्यों की त्यों रह गयी,
आज भी तांता लगा रहता है महाजनों का द्वार पर इनके,
कर्ज वसूली को अक्सर बंधुआ मजदूर बन जाते हैं बच्चे इनके।
कोई तो इनके समस्याओं का करो समाधान,
इनकी दयनीय स्तिथि का अब तो करो निदान,
कहीं वो दिन न देखना पड़े हमसभी को,
जब देश में बाकी न रह जाये कोई किसान।
बिप्लव कुमार सिंह।
फ़रीदाबाद, हरियाणा।
16 दर्द किसान का
चीर कर घरती का सीना
बोता है जो अपना पसीना
और पैदा करता है नगीना
खुद रह कर के भूखा जो
दूसरे का पेट भरता है
वह किसान कहलाता है
कभी सूखा तो कभी बाढ़
इस तरह प्रकृति की मार
कभी नीलगाय तो कभी
बंदरों के अत्याचार सहता है
फिर भी उफ नहीं कहता है
वह साहसी किसान कहलाता है
सर्दी गर्मी या हो बरसात
करता रहता काम दिनरात
हो अगर कड़कड़ाती ठंड
या चिलचिलाती धूप प्रचंड
मिलता नहीं उसे कभी आराम
वह इंसान किसान कहलाता है
बीवी के तन पर कोई वस्त्र नहीं
लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र नहीं
माँ के लिए कोई दवा-दारू नहीं
बाप के लिए टूटा चश्मा भी नहीं
ऐसे हो जिसके हालात यहाँ पर
वह बेचारा किसान कहलाता है
दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश"
कलकत्ता
17 मैं अभी जिंदा हूँ।
मैं अभी जिंदा हूँ दुनिया का बोझ उठाने को।
हल नही छोड़ा हूँ फसल उपजाने को।।
आ गया है मौसम खेतों को सजाने का।
भुला नही हूँ अपने कर्तव्यों को सजाने को।।
इसलिए तो बदरंग हो गया हूँ अपने ही पोशाकों से।
क्योंकि मातृभूमि को गले लगा लिया हूँ अपने ही सीने से।।
चिर सीना वसुधा का दाँव लगाया हूँ बीजों का।
मौसम बैरी पासा बनके भाग्य उदय जो करवाएगी।।
लाभ हानि मैं न सोचु अपने देश की जनता का भूख कैसे मिटाऊंगा।
इसी ख्यालों में जीता हूँ हरदम इसलिए दाँव लगा जाता हूँ बीजों का।।
हरबार मुँह की खानी पड़ती है।
फिर भी हल उठा लेता हूँ।।
135करोड़ जनता का पेट जो हमें याद आ जाती है।
इसलिए धरती के सीने पर हल हमारी चल जाती है।।
विशाल कुमार
कार्य -लोको पायलट
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
18 किसान हमारा अन्नदाता है
किसान हमारा अन्नदाता है
भारत का भाग्य विधाता है
कड़ी धूप में जल जलकर
धरती से सोना उपजाता है
यूं भूख मिटाता है सबकी
स्वयं भूखा ही रह जाता है
अपनी पीड़ा भूलकर वह
देश को धनवान बनाता है
चाहे जितनी मेहनत कर ले
कहीं दिखती नहीं थकान
ऐसा है अपने देश का किसान
किसान ही लाते हैं खुशहाली
रहती सुदृढ़ अपनी हालत माली
धरती से सोना उपजाने वाले
महान बहुत होते किसान
नमन इन्हें आओ करें सब
भारत की यह असली शान!!
मोहम्मद मुमताज़ हसन
टिकारी, गया, बिहार
19 किसान की व्यथा
हृदय में सजीव है,
अन्नदान की प्रथा।
अब बड़ी अजीब है,
हर किसान की व्यथा।
आप अन्नदान की,
वाहवाही लूटकर।
सो लिये हैं चैन से,
अपनी आँखें मूंदकर।
कोई सुन नहीं रहा,
है किसान की कथा।
अभ बड़ी अजीब है,
हर किसान की व्यथा।।
सूदख़ोर के महल,
चूम रहे आसमान।
कृषक झोपड़ी पड़ा,
है जहाँ का पासवान।
खेत औ खलिहान में,
बाद फसल की कटन।
फिर भी कर्ज से लदा,
रो रहा किसान मन।
जिनका ख़ैरख़्वाह वह,
है वही तो बेबफ़ा।
अब बड़ी अजीब है,
हर किसानों की व्यथा।।
वायदे,शकल रहित,
कायदे,शकल रहित।
फायदे शकल रहित.
दर्द ही साकार है।
लाभ दोगुना करे,
कोशिशों में है मगन।
लाड़ली के पीत-हस्त,
स्वप्न निराकार हैं।
जगत क्षुधा का हती,
आज खुद गया हता।
अब बड़ी अजीब है
हर किसान की व्यथा।।
■■■■■
जय जय किसान,
अब सिरफ किताब में।
अब जवाँ के दिल का दर्द,
है किसानी राग में।।
प्रश्न,हित किसान का,
मौन है जबाब में।
आप हैं उलझे हुए,
लाभ में,शराब में।
कृषक-हित मथानी से,
जा रहा विकट मथा।
अब बड़ी अजीब है,
हर किसान की व्यथा।।
संतोष श्रीवास्तव"विद्यार्थी'
डिप्टी कलेक्टर(से.नि.)
मकरोनियाँ, सागर, मध्यप्रदेश 470004
20 मैं किसान हूँ
अन्नदाता ,धरतीपुत्र और भी अगणित हैं नाम,
मैं वही हूँ, हाँ वही हूँ देश का गरीब किसान।
कड़ी धूप में जलकर, सन- कर ,
करता रहता हूँ अथक परिश्रम ।
अपने हित जो मिला ठीक है,
पर अर्जित करता सबके हित भोजन।
धरती का सीना फाड़-चीर कर ,
बीज मोती का हूँ धरता।
लहलहाए धरा अपनी ,
यत्न मैं सब कुछ वो करता ।
स्वावलंबी, मेहनती हूँ ,
रखता नही किसी से आस।
पर प्रकृति जब रूठ जाए,
तो मैं जाऊं किसके पास ।
पूँजी लगाकर उम्र भर की,
बंजर धरा में भी दाँव हूँ मैं खेलता।
अतिबृष्टि, अनाबृष्टि, हिमपात
हिंसक जानवरों का दंश भी हूँ झेलता।
मिलती नही फसल की लागत ,
तब मन हो जाता है खिन्न।
हौसला दें प्रभु मुझको,
अविचल, आजीवन उत्पन्न कर सकूँ अन्न ।
विवेक मिश्र "अंचल"
स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश
21 मौन मुग्ध संध्या
■■■■■■■■■■
मौन मुग्ध संध्या में ,रह-रह उठती आशंका।
अम्बर में धूम -धुवारे कजरारे मेघा,
गर्जन के तेज तमाचे पड़ते,बिजुरी डंडे दे जाती।
दिनकर का रश्मि समाज छिप जाता,
राकापति के शीतल शर तो बेदर्दी हो जाते है।
नक्षत्र लोक के अगणित सितारे,
कहीं भाग्य से छिप जाते है।
प्रचण्ड हवाओं का क्या कहना ?
वो छिप-छिप आशंका के घाव कुरेद जाती!
प्रकृति का कहना भी क्या अब !
हर साल पकी फसल पर,
ओलों की मार जो दे जाती।
सरहद पर और भीतर देश के,
अम्बर सेना,जल सेना, थल सेना
कर पाती है सुरक्षा राष्ट्र जीवन की!
पर, करकापात से आत्मघाती,
जो स्वयं खत्म होकर दे जाते मंजर कृषक बर्बादी।
बदला ले,तो किससे ले…….!
कहाँ एयर स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते है !
कभी शीत का पाला पड़ता,
कभी करकापात हो जाता।
आमों की मंजरी मिट जाती,
तो कभी पशु गर्भपात हो जाता।
कभी पशुधन बिक जाता , तो कभी मुँह का निवाला धरती पर रो पड़ता।
फटी रह जाती आँखें बेबश,
हाथों को लकवा मार जाता।
जोड़ो में पानी भर जाता,
गात शिथिल हो जाता।
चिंता और आशंका की रेखा,
धूँधली से स्पष्ट चित्रपट बुन जाती।
जो हुए जवानी में बूढें,
वहीं बचपन में रहे अधपढ़े।
बन किसान पाल रहे जग पेट,
अपनी क्षुदा,प्यास,स्वप्न को मेट।
कैसे सार्थक होगा कृषक जीवन ?
भटक रहा वो राजनीति के वन-वन !
अपनी ठंडी रोटी के टुकड़ों पर,
जग को नाचते देख रहा !
उसकी भाग्य बारहखड़ी बाँचते विधाता देख रहा(उदास)
उसके परिश्रम की मेहंदी को,
कोई ना राचते देख रहा !
टूटी-सी ढीली खटिया पर,
टूटे स्वप्न देख रहा !
लड़की ब्याह कैसे हो ?
कौन कृषक के घर में,
अपनी लड़की को मेरे लड़के संग…….!
टूटे से आवास हमारे,आले में मकड़ी के जाले !
आँगन में चूहों की बारातें,
जीर्ण काया पर व्याधियों की घातें ।
उठा फिर नई फसल की उम्मीदों से,
वृद्ध मन उड़ न सकता परिदों सा,
टूटी सी खटिया पर……
डोल रहा उसका घर !
ज्ञानीचोर
मु.पो. रघुनाथगढ़, सीकर राजस्थान।
22 किसान की व्यथा
खेती कर अन्न उगाता,
बहा पसीना मेहनत करता,
कहलाता वो किसान है।
मेरा देश कृषि प्रधान है।
अन्नदाता तू, तू भारत का प्रधान है।
मेरा देश कृषि प्रधान है।
जूझ रहा मौसम की मार से,
लेता फिर कर्ज उधार है,
मेरा देश कृषि प्रधान है।
पकती फसल,मानता प्रभू उपकार है,
तुझसे ही हर तीज त्यौहार है,
मेरा देश कृषि प्रधान है।
पकती जब धान की बाली
मनाता तब दीवाली,
नष्ट करने रोगों की संतति
काट जौ,सरसों की बाली
तब मनाता है होली।
हर फसल का अर्पण कर,
किसान लगाता भोग है,
मेरा भारत कृषि प्रधान है।
हा, दुर्भाग्य प्रकृति का होता प्रकोप जो कभी,
कर्ज में डूब जाता किसान है।
मेरा भारत कृषि प्रधान है।
घर,जमीन पर लेता लॉन,
सरकार करती माफ है।
पर सुविधा नहीं पहुँचती उस तक,
खा जाते बीच के दलाल हैं।
डूब कर्ज में फिर दे देता किसान अपनी जान है।
मेरा देश कृषि प्रधान है।।
गीतांजली वार्ष्णेय
बरेली उ.प्रदेश
23 अन्नदाता
हरितक्रांति का अग्रदूत हूँ
स्वेद श्रम का क्रांतिदूत हूँ
हल कुदाल लिए फावड़ा
भोर भये चल पड़ता हूँ
जेठ आषाढ़ की झुलसाती धूप में
ठंडी छाँव की लालसा किये बिना
बदन जलाते ताप में स्वेद बहाता हूँ
पूस माह की ठिठुरते तड़के में
गर्म नर्म रजाई में दुबके बिना
खेतों में मैंड बना पानी सींचता हूँ
कठोर परिश्रम से सोना उगाता हूँ
छोटे बड़े अमीर गरीब सबका पेट भरता हूँ
हां-हां मैं अन्नदाता कहलाता हूँ
स्वयं की बेबसी पर घुटता हूँ
अनावृष्टि से सूखे की मार सहता हूँ
अतिवृष्टि से होती फसल चौपट सिर धुनता हूँ
भारी मन से ब्याज के पैसे से बीज लाता हूँ
मां की दवा गुड्डू मुन्नी की फीस
नये जूते नहीं खरीद पाता हूँ
पत्नी की साडी में लगे पैबंद देख
नजरें झुका लेता हूँ
फसल पकने पर महाजन का
बेशुमार बढा ब्याज चुकाता हूँ
ऐसे ही झंझावातों को हरपल झेलता हूँ
हां-हां मै अन्नदाता कहलाता हूँ
अब यदि सरकारी मुआवज़ा मिले
किसान के हालात सुधर सकते हैं
मौसम की मार से मरे, वे बच सकते हैं
आज के हालात यदि नहीं सुधरे तो
कल को खाने के लाले पड़ सकते हैं
नकद धन राशि सहायता हमें मिले
इच्छाशक्ति बढ़े सुविधा देवै दुख मिटे
फांसी खानेवाले थे वो बेचारे मजबूर विवश
ना रहो,कृषकों के हालात से बेखबर अवश
किसान का अस्तित्व है तभी आरामदायक जिंदगी है
बिन किसान ना दाना मिले, पेट भरने को तंगदिली है
आज अपने हालात के जज्बात बता देता हूँ
हां-हां मैं अन्नदाता कहलाता हूँ
सीमा गर्ग मंजरी
मेरठ
24 किसान की व्यथा
मैं किसान हूँ,आज बहुत उदास हूँ
देख अपनी स्थिति पर रोता हूँ
कभी समय तो कभी मौसम की मार
मुझे पल पल मारा है
बढ़ती जा रही हैं मेरी प्रतिदिन लाचारी
बिखरता जा रहा हूँ
रोजाना अपनी हालत पर
घुट घुट मर रहा हूँ
जब भी अपनी मैं
जीवनदायिनी माँ को देखता हूँ
आँखों में आँसू आते हैं
माँ की हरियाली रूप कहा खो गया
कितनी सजीली सुंदर अन्नकण
आज परेशा हूँ
कहते हैं इस मातृभूमि की मिट्टी में
मैं पैदा हुआ अब लग रहा है
इसी में मेरी करूण दशा से मर जाना है
मैं किसान हूँ,इसी मिट्टी से मेरा अस्तित्व है
आज इतना बेबस और लाचार
सरकार भी मदद के नाम पर कुछ नहीं कर रही
मैं कभी सोचा नहींइतनी बुरे कभी हालात होंगे
बताओ मेरा खेत और खलियान बिन
क्या अस्तित्व आज अपनी किस्मत कोस रहा
मैं किसान हूँ,आज बहुत उदास हूँ ।
भावना गौड़
ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश)
25 ???
तपती धूप और झुलसती गर्मी में
भी किसान तनिक भी नहीं घबराता
मिट्टी से सोना मोती उपजाता
मेरे भारत का किसान
मन में एक विश्वास लिए
भोर को ही निकल जाता
दिन भर कड़ी तपस्या करता
सुनहरी ढलती शाम को घर आ जाता
मेरे भारत का किसान
अपने खून पसीने की कमाई का
बाज़ार में नहीं पूरा मूल्य पाता
राजनीति में हमेशा छलता किसान
सबकी मार वो खाता है
मेरे भारत का किसान
विचार करो तुम अगर कृषक ना होते
क्या तुम अन्न खा पाते
सृष्टि को तो हम नष्ट करते
परिणाम उसका किसान भोगते
मेरे भारत का किसान
ओला वृष्टि के कारण किसान की
ना जाने कितनी फसलें बर्बाद हुई
उसकी सारी किस्मत पर तो
सफेद चादर चढ़ गई
मेरे भारत का किसान
गर्व करो तुम इस कृषक पर
जो खुद भूखा रहकर भी
तुम्हें भूखा कभी नहीं वो सुलाता
जीवन में खुशियां लाता
मेरे भारत का किसान
जया वैष्णव
जोधपुर राजस्थान
26 क्यों आज बादल रोया है?
बंजर धरती पड़ा अकाल ,
किसान रोता हाल बदहाल ।
कर्जा ,भूखमरी ,संतप्त परिवार ,
बादल न बरसें जीवन मँझधार।।
कैसे चलेगा घर संसार?
कौन थामेगा पतवार?
बद से बदतर होता हाल ,
जार- जार तड़पे बारंबार ।
किसान की व्यथा कौन सुने ?
उसका तकलीफ ,दर्द कौन गुणे?
किससे अपना दर्द कहे?
कोई नहीं जो पीर समझे?
रोज-रोज की तंगी लाचारी ,
उसको तोड़ती रही !
तरसती निगाह,सूखी धरती ,
भाग्य भी रूठी रही।।
तिल- तिल कर मरता गया ओ,
धरती पुत्र था सहता गया वो!
उमंग- विहीन ठूँठ सी जिंदगी,
फैली चहूँ ओर मायूसी ।।
जिजीविषा मरती रही ,
व्यथा पीर कहती रही।
जीवन के धूप ताप में ,
जलता रहा रिसता रहा।।
जूझते- जूझते, लड़ते- बढ़ते
हार गया था वो।
जीने की इच्छा तो थी ,
पर मर रहा था वो।।
आज धरती पर ,
धरती पुत्र सोया है ।
आह! धरिणी रोती ,
क्यों आज बादल रोया है?
अंशु प्रिया अग्रवाल
मस्कट ओमान
27 बेबस किसान
व्यथा हलधर की आज सुनाता हं, खून पसीना बहता !
1. सर्दी गर्मी की नहीं चिंता. श्रम साधना जीवन बनता!
खेती खलिहानों तक सीमित. फसल भी उसकी नहीं है बीमित !
बरसें बदरा मन खुश होता, खुशी खुशी वो अन्न भी बोता !
फसल उगी चौतरफा खुशियाँ, औरत मिलकर गाती रसिया !
टिड्डी रुकी नहीं अब रोके से - खून पसीना बहता !
व्यथा हलधर की आज सुनाता हूँ, खून पसीना बहता !
1. सर्दी गर्मी की नहीं चिंता, श्रम साधना जीवन बनता !
खेती खलिहानों तक सीमित, फसल भी उसकी नहीं है बीमित!
बरसें बदरा मन खुश होता, खुशी खुशी वो अन्न भी बोता!
फसल उगी चौतरफा खुशियाँ, औरत मिलकर गाती रसिया! !
टिड्डी रुकी नहीं अब रोके से - खून पसीना बहता !
व्यथा हलधर की आज सुनाता हूँ, खून पसीना बहता !
2. गांव में रहके अभाव में जीता, मेघ की चिंता नीर न पीता !
झुलस रहा है भरी धूप में, पानी सूख गया है कूप में !
नियति कैसे दिन दिखलाती ,सोच सोच आखें भर जाती !
अन्नदाता होकर वो तरसे, निष्ठुर मेघा भी नहीं बरसें !
अंखिया फटी रह गयींआशा में- खून पसीना बहता !
व्यथा हलधर की आज सुनाता हूँ खून पसीना बहता !
3. सोचा मेहनत रंग लायेगी, बदकिस्मत पृलय आयेगी !
फसल हुईं है चौपट मेरी, घर के कर रहे माथा फोडी !
अब तो जीना दूभर हो गया है- खून पसीना बहता
व्यथा हलधर की आज सुनाता हूँ खून पसीना बहता
4. भूमि पुत्र के सपने बिखरे फसल देख घर वाले बिफरे !
सोचा वो अरमान बह गया, सोने जैसा महल ढह गया !
ठानी मेहनत से न डरूंगा, बिटिया के पीले हाथ करूँगा !
सपने देख देख हर्षाया, बदकिस्मत चेहरा मुरझाया !
" बेजान " हुआ तन आज मेरा- खून पसीना बहता
जगदीश " बेजान " व्याख्याता
भरतपुर
28 भारत के किसान हम !
================
भारत के किसान हम !
मेहनतकश इंसान हम !... भारत
उपेक्षा सब की सहते हैं,
अपेक्षा सभी रखते हैं ,
अनाज हम उपजाते हैं,
पसीना खूब बहाते हैं ,
भरते खेत खलिहान हम !... भारत
शोषण हमारा होता है ,
पोषण दूसरा पाता है,
सही दाम नहीं मिलता है,
मानसून भी छलता है ,
सहते सबका अपमान हम !... भारत
कर्जदार सदा रहते हैं,
बदहाल जीवन जीते हैं ,
मौसम की मार खाते हैं ,
जीती बाजी हार जाते हैं ,
पाते नहीं कभी सम्मान हम !... भारत
तन लंगोटी जन्मों से है ,
मन उदासी सदियों से है,
व्यथा कथन बेकार है ,
आश्रय नहीं अपकार है,
फिर भी जीतेंगे मैदान हम !.... भारत
=====================
रमेशचंद्र शर्मा
16 कृष्णा नगर इंदौर
29 संघर्ष धारी कृषक
--------------
कड़ी धूप से जो लड़ता
मेहनत दिन रात करता
तब जाकर कुछ उगता
हे किसान की ये व्यथा।
सुबह शाम परिश्रम करता
दो वक्त की रोटी पे जीता
पर उसे कहाँ हे मिलता
हे किसान की ये व्यथा ।
पल पल उसपे है बीता
जहाँ काम ना आए गीता
फल मेहनत का ना मिलता
हे किसान की ये व्यथा।
जब मौसम ही उससे रुठा
मिला ना एक भी मौका
जीने से उनको रोका
हे किसान की ये व्यथा।
मिला हर पल हे धोखा
खाते हम वो हे बोता
सम्मान बिना वो जीता
हे किसान की ये व्यथा।
जब नहीं उसे कुछ मिलता
किसलिए परिश्रम हे करता
मर कर जिंदगी वो जीता
हे किसान की ये व्यथा।
ममता बारोट
गुजरात, गांधीनगर
30 किसान की व्यथा
किसान देश की आन बान और शान है
समस्त विश्व का अन्नदाता मिलता नहीं सम्मान है
राष्ट्र की प्रगति मे अनुपम योगदान है
जय किसान तू भारत मा की लाडली संतान है
खेतों मे कडी मेहनत करता
कड़कती धूप का सामना करता
सूखे और वाढ से यह है उलझता
विपता से यह कभी न डरता
सारे संसार का पालनहार
समाज का है इक मुख्य आधार
हम सब मानते तेरा उपकार
तेरे बिना है जीवन बेकार
आओ करें इस का सम्मान
यह समाज का अंग महान
हर संकट मे डटकर रहता
कष्टों से न कभी घबराता
अशोक शर्मा वशिष्ठ
शहर। जम्मू
31 किसान की व्यथा
मिट्टी से जन्म लेकर,
हम मिट्टी में मिल जाते है।
जीवन के संघर्षो से
दिन रात लड़ते जाते है।
दो जून की रोटी की जुगत में
हम रोजी को भटक जाते है।
घर बार छोड़कर घर बार के
भरण पोषण को जाते है।
मिट्टी से खड़े हुए किसान
और मिट्टी में मिल जाते है।।
देश की नींव का पत्थर
किसान वर्ग ही होते है।
अमीर वर्ग के सुख भोगो को
अपने कंधो पर ढोते है।
दिन रात पसीने की खाद से
हम मेहनत का बीज बोते है।
अधिकार हमे न मिल पाया
न सपने कोई संजोते है।
देश की प्रगति रथ के पहिये
किसान ही तो होते है।।
बच्चे हमारे अभावो में ही
जीवन अपना बिताते है।
माँ-बाप अभागे ऐसे जो
दुःखो के अश्क पिलाते है।
हुनर भरा है भुजबल में
पर सुख कमा न पाते है।
परिश्रम की दौलत से
ऊँचे महल बहुत बनाते है।
पर महलो के सुख को हम
कभी भोग न पाते है।
अभावो से नाता गहरा है
नाता यही निभाते है।
मजबूर नही है पर मजदूरी से ही
जीवन अपना बिताते है।।
गौरव सिंह घाणेराव
(अध्यापक,लेखक,कवि)
सुमेरपुर,राजस्थान
32 थोड़ा सा बदल जा मेरे अन्नदाता
अन्नपत्ते की व्यथा सुनाता,
धरा फाड़ वह अन्न उगाता |
बाढ़ अकाल बेमौसम ओले,
सब प्रकोप जो सह जाता |
माटी से कुछ पाने को वो,
माटी सा हो जाता |
पैदा करके भी वो वंचित,
जमाखोर है मौज उड़ाता |
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,
क्यो तू वंचित ही रह जाता ||१||
रूपया एक सरकार देती थी,
पन्द्रह पैसे तुझ तक आता |
नेता अफसर ठेकेदार भ्रष्ट,
बाकी ईनकी जेब में जाता |
फ़ाइल में तालाब खुदे,
और फ़ाइल में ही बह जाता |
भ्रष्टाचारी कारिन्दों से,
पार नहीं तू पा पाता |
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,
क्यो तू वंचित ही रह जाता ||२||
जितना तू परिवार बढ़ाता,
खेत का छोटा टुकड़ा पाता |
खेती पानी नहीं बचा तब,
मजदूरी करने को जाता |
गोपालन कर दूध पिलाता,
जैविक खाद बनाता |
सहकारिता यदि अपनाता,
मिलकर लाभ कमाता |
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता |
कमियां कुछ तुझमें भी है,
कुछ समाज भी समझ ना पाता |
साथ समय के चला नहीं जो,
पिछे ही वह रह जाता |
शिक्षा से जोड़ा ना नाता,
नवीन ज्ञान कहां से पाता |
देख कृषि दर्शन टी वी पर,
प्रोढ शिक्षा को भी अपनाता |
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता ||४||
स्किल डेवलपमेंट कर अपना,
नये तरीकों को अपनाता |
कृषि क्षेत्र की खोजों का,
लाभ यदि तूं ले पाता |
मृदा स्वास्थ कार्ड बनाता,
जैविक खेती भी अपनाता |
पानी की जहॉ कमी पड़े,
वहॉ बूंद बूंद से फ़सल उगाता|
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता ||५||
जनम मरण और परण के उत्सव,
समझदारी से यदि मनाता |
मृत्यु भोज और बाल विवाह तज,
बच्यों को शिक्षित कर पाता |
सामूहिक सम्मेलन करके,
अन्न धन और समय बचाता |
साहूकार के फंदे से बच,
बिना कर्ज के तू जी पाता |
कह 'रमेश' ओ अन्न के दाता,
फिर तूं वंचित ना रह पाता||६||
इतना सा बदलाव जो लाता,फिर तूं वंचित ना रह पाता||
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,फिर तूं वंचित ना रह पाता||
।--------- - - - - - ----------
रमेश चंद्र भाट
रावभाटा, जिला-चितौड़गढ़, राजस्थान
33 किसान की अरदास (पेरोडी—बता मेरे यार सुदामा रे)
मुझे सही दाम दिला दे रे
सरकार घणा दुर सुं आया,
भर भर ट्रेक्टर ट्रॉली लाया,
गेंहू घणा सुथरा लाया
मुझे सही दाम दिला दे रे,
सरकार घणा दुर से आया।।
साल भर बड़ी आश ले बैठा,
गेंहू दाम अनुता देगा,
कपडा लता टींगार के,
साडी घरआली के लायाँ,
मुझे सही दांम दिला दे रे
सरकार घणा दुर सुं आया।।
धुप ने धुप नही म्हे जाणी,
टपकायो शरीर पसिनों पाणी,
दवाई माँ बाप रे रे,,
छोखो दाम मिले जद लायाँ,
मुझे सही दांम दिला दे रे
सरकार घणा दुर सुं आया।।
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
(कवि,लेखक)
सादडी,पाली,राजस्थान।
34 ????
धरती का सुपुत्र हूं, धरती पर निवास करता हूँ।
अन्न उगाने को लेकर दिन-रात पसीना बहाता हूं।
जय जवान को कहते हैं, जय किसान भी कहते हैं।
हमेशा मेहनत करता हूँ, फिर भी सुख चैन नहीं पाता।
अन्न उगाने को लेकर बिज जब खेत में बोता हूँ।
कभी अतिवृष्टि हो जाती हैं, कभी अकाल पड़ जाता है।
आस टूट जाती हैं, जब फसल अच्छी नहीं होती।
थोड़ी फसल पक भी जाती तो, उचित मूल्य मिल नहीं पाता।
ऋण को चुका नहीं पाता, दिवालिया हो जाता हूं।
हौसला जब खो बैठता हूं, तो फांसी की सोच लेता हूँ।
आंखें भीग जाती हैं, परिवार को सुख दे नहीं पाता।
महल को पा नहीं सकता महल में रह नहीं सकता।
रोटी प्याज से खाता, कभी बैठ खा नहीं पाता।
नित्य संघर्ष मैं करता हूँ, गरीब बना ही रहता हूँ।
मेरी व्यथा है इतनी कि, जो मैं किसी को कह नहीं पाता।
मेरी अखियों से निकले अश्रुओं को मैं रोक नहीं पाता।
मोहन लाल मीणा
सेमारी, जिला- उदयपुर, राजस्थान
35 ?????
दिन भर किसान मेहनत करता
फिर भी कभी नहीं वह थकता।
उनकी दुनिया है खेत खलिहान
उसी में बसी हुई है उनकी जान।
कभी समय कु समय की वर्षा
कभी सूखा कभी भंयकर वर्षा।
नहीं होती पूरी उनकी मनसा
कभी बूँद बूँद के लिए तरसा।
परेशान होता देख फसल चौपट
दुखी होता देख सामने बड़ा संकट।
अन्न उगाने वाले ही हाथ फैलाता
अपने सपनो को खुद ही मिटाता।
कोई होकर मजबूर जान गंवाता
उनकी व्यथा कोई समझ ना पाता।
किसान मेहनत से नहीं घबराता
प्रकृति की मार से उन्हें डर लगता।
कभी मेघों कभी खेतों को निहारता
कभी बच्चों कभी खुद को संभालता।
साहूकार व बैंक के कर्जो को आंकता
देख दशा निज की रोना उन्हें आता।
उम्मीदें मिट रही कुछ नहीं सूझ रहा।
मेहनत बेकार हुई हताश होता जा रहा।
किस किस के आगे हाथ फैलाऊँगा
बिटिया की शादी कैसे कर पाऊँगा।
यही है किसानों के जीवन की तस्वीर
भाग्य विधाता की बता रही तकदीर।
रो रहा कलेजा आन पड़ी भारी भीर
नहीं सूझ रहा कैसे रखे मन में धीर।
सरकारी सुविधाओं के बावजूद परेशान
बिचौलिया हक मारते सोचकर हैरान।
कलावती कर्वा "षोडशकला"
कूचबिहार
पश्चिम बंगाल
36 धरतीपुत्र की व्यथा
मैं धरतीपुत्र मैं हूँ भारत का हलधर।
शीत वर्षा गर्मी में भी रहता तत्पर।
जीना सीखा मैंने श्रमसाधना कर।
रबी और खरीफ फसलों पर हूँ निर्भर।
बहुत खुश हूँ मैंअन्नदाता कहलाकर।
बच्चे बड़े हुए गौरी का दूध पीकर।
कभी सरकारी नौकर बने पढ़लिखकर
नहीं रहे खेतों खलिहान तक सिमटकर।
मेरी बिटिया भी अब पढ़ें मन लगाकर।
नाम रोशन करें शिक्षा की अलख जगाकर।
सौभाग्य से बादल खूब बरसे जमकर।
सोचा यह साल निकल जायेगा हँसकर।
अबकी ऋण का बोझ भी जायेगा उतर।
फसलों की कतारें लगी मुझे बेहतर।
त्योहार मनाऊंगा सब मैं बढ़चढक़र।
पर हाय रे मेरी नियति में कुछ हटकर
फसल निष्ट की टिड्डियों ने हमलाकर।
आई टिड्डियाँ प्रलय के बादल बनकर।
किया मुकाबला ढोल थाली बजाकर।
निज व्यथा को अनुभव किया सब खोकर।
मन में सन्तोष फसल बीमा अपनाकर।
सुखद योजना का आभारी जीवनभर।
औरों के लिए जीया अपने को भूलकर।
खेती करता खून पसीने से सिंचकर।।
किशनलाल जांगिड़
जोधपुर (राजस्थान)
37 ?????
सर्दी-गर्मी या हो बरसात,
हरदम काम वो करता रहता,
परिश्रम से पीछे नहीं हटता,
धरती का सीना चीरकर अन्न उगाता,
खून की तरह पसीना वो बहाता,
अपने लिए कुछ भी नहीं रखता,
औरों को वह दे देता,
टूटी झोपड़ी फटे कपड़े बदहाल,
बस अन्नपुत्र का यहीं हाल,
कर्ज में सदा डूबा रहेगा वो,
गरीब है-गरीब ही रहेगा वो,
सियासत भी अपनी रोटियां सेकता रहेंगा,
नहीं कोई उत्थान का प्रयास उसका करेगा,
सपनें इसके भी होते हैं अपने,
बच्चें पढ़-लिखकर कुछ बन जाय अपने,
कर्ज-तले दबा धरतीपुत्र,
सोच के सपनों तले दब जाता वो धरतीपुत्र,
कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि,
कुदरत भी साथ नहीं देती बढ़ने में साथ उसकी सृष्टि,
अंततः वह कर लेता अपनी जीवन लीला समाप्त,
कभी जहर पीकर या कुएं में कूदकर,
या फिर.......,
किसी पेड़ पर फंदा डालकर कर लेता है आत्महत्या,
बस उसकी यही कहानी,
ना किसी को उसके जीने का दर्द का एहसास,
नहीं उसके मरने पर किसी को दर्द,
यूं तो बनते हैं....,
उसके हक में संगठन कई,
लगते हैं उसके हक में नारे बहुत,
बस होती रही उस पर ,
झूठी राजनीति,
आज तक....!!
चेतन दास वैष्णव
गामड़ी नारायण
बाँसवाड़ा
38 ??????
आषाढ़ बित गया, सावन आया।
अम्बर में बादल भी छाया।
पर अभी तक नही बरसा।
जल को किसान मन तरसा।
अब बरसो रे काले मेघा बरसो।
इतना सा हम पर उपकार कर दो।
सुर्ख धरती अंगारे उगलती।
कृषक और हीरा मोती की जोड़ी।
पाँव न टिकते धरती है तपती।
तपती धरती व्याकुल होती।
अब बरसो रे काले मेघा बरसो।
इतना सा हम पर उपकार कर दो।
उमड़ घुमड़ कर मेघा आए।
कृषक उस ओर करके निगाहें।
अंतर्मन से उसको पुकारे।
हमारी व्यथा बादल सुनले।
बरसो रे काले मेघा बरसो।
इतना सा हम पर उपकार कर दो।
इन्द्र राजा करो मेहरबानी।
प्यासे के हो तुम जल दानी।
तपती गर्मी लगती कंटीली।
बरखा न आती, होती बैचनी।
अब बरसो रे काले मेघा बरसों।
इतना सा हम पर उपकार कर दो।
प्रभु गरासिया "आर्या"
बाली, पाली, राजस्थान
39 ????
कोई नहीं जानता व्यथा किसान की
ऋण ले कर वो खेत जोतता
खून पसीने से फसल सींचता
कर्ज का फंदा सदा रहता गर्दन में किसान की
सिंचाई के समय बारिश को तरसें
खड़ी फसल पर बादल बरसें
ये बारिश भी है बैरी किसान की
सूखे व कीड़ों से यदि फसल बच जाए
उस पर टिड्डी दल का हमला हो जाए
साहूकार,सरकार सब देखें लाचारी किसान की
कड़ी मेहनत से फसल उपजाता
जब मेहनत का सही मूल्य नहीं पाता
आत्महत्या,मजबूरी बन जाती किसान की
मीना कुमारी
शालीमार बाग, दिल्ली
40 ?????
कैसे बयां करूं मैं,
किसान की व्यथा,
इस मिट्टी से,
बंधा जीवन उसका,
बस कांटों से भरा,
फिर भी रहता हैं,
किसान सदैव हंसता ।
आंसूओं से प्यास बुझाता,
आसमान की ओर देखता,
कब अंबर बादल बरसेगा,
कब खिल उठेगी धरा,
कब बच्चे पहनेंगे परिधान नया,
सोचकर धरा पर बैठा रहता।।
हरबार वह नयी आस में जिता,
कड़ी धूप में हल चलाता,
उसके पसीने से भीग जाती वसुधा,
दूर से ही देख अपने बच्चों को,
पूरी शक्ति से वह काम करता,
सुखी परिवार का सपना देखता ।।
उसका सपना , सपना ही रह जाता,
कभी बाढ तो ,कभी सूख से,
जिंदगी भर जुझता रहता,
हार कभी नही मानता,
परिवार की खुशी के लिए,
खून-पसीना एक करता ।।
कैसे बयां करुं
किसान की व्यथा .....
डॉ।। वसुधा पु. कामत
41 किसान की व्यथा
इस सूखी धरती को देख आसमां को निहारता किसान
बारिश की दो बूंदों के लिए रब से दुआ करता किसान
दो वक्त की रोटी के लिए जमीन गिरवी रखता किसान
जाने कितने कर्ज और लगान के नीचे दबता किसान।
अपने बच्चों को भूख से तड़पते देख ना सका किसान
अपने हालातों को हराकर जान देने निकल पड़ा किसान
इतनी मेहनत करके भी खुशी से ना रह पाया किसान
अपने परिवार के लिए खेतों में भटक रहा है किसान
रहा न कुछ अब उनके पास सोच कर हुआ वो परेशान
अब क्या करें उन बच्चों के लिए जो अभी है नादान
रोता रहा वो फूट-फूट कर अपनी फूटी किस्मत मान
जिसकी मेहनत का फल खाता है यह पूरा हिंदुस्तान
दर्द ना कोई उसका देख सका स्वार्थी है सब इंसान
अंत में कर ली उसने खुदकुशी हो गया था बहुत हैरान
समझ ना पाए तुम उसे पत्थर को पूजने वाले इंसान
अब तो समझ जाओ तुम सब वो है धरती पुत्र किसान।
प्रकाश कुमार खोवाल
(अध्यापक शिक्षा विभाग राजस्थान)
पुरोहित का बास, पिपराली
जिला सीकर (राजस्थान
42 अन्नदाता
धूप है छाव है,
जलते तेरे पाँव हैं।
धारा के ही विपरीत,
बहती तुम्हारी नाव है।
जिसने भूख मिटाई,
उसको कहते भगवान हैं।
जिसने हमको अन्न दिया,
वो अन्नदाता किसान है।।
कभी बाढ़ ने भरमाया है,
कभी सूखे ने सताया है।
खुद को भूखा रख कर,
तुने हम सबको खिलाया है।।
हर पल तुम परिश्रम
करते हो ,
लाखों लोगो की भूख
तुम अपने पसीने से हरते हो।
कर्ज के बोझ तले डूबकर,
किसान फिर क्यों तुम
भूखे मरते हो?
तुम्हारी मेहनत को
चूहे और नेता खा जाते हैं,
भूखों को कुछ मिलता नहीं
और ये अनाज खुले में सड़ा जाते हैं।
दर्द पूरे देश का खुद ही संभाल कर,
मेरे देश के किसान
भूखे ही मर जाते हैं।।
मेरे देश के किसान
भूखे ही मर जाते हैं।।
मोहन चन्द्र जोशी
देवभूमि हरिद्वार, उत्तराखंड
43 अन्नदाता का सम्मान
तपती धूप में भी
रहता खेत में अटल है।
पसीने से सींचता
वह अपनी फसल है।
ना देखता आज
ना देखता कल है।
करता बीसों घंटे काम
जीता मरता वह पल पल है।
सूखे अति बरसात से
मौसम की मार से ।
राजनीति की तलवार से
होता खामोश रहता विकल है।
जज्बा जमीन को चीरने का
बीज को उसमें भींचने का।
बूंद-बूंद से सींचने का
मेहनत कर भी होता विफल है।
माथे में होती शिकन है
सपनों में होती चुभन है।
झझकोर उसका अंतर्मन है
फिर भी नहीं हारता होता सफल है।
सीख ले हम किसान से
नवाजे अन्नदाता को सम्मान से।
जो खुद भूखा रहकर करता
भूखे की समस्या का हर हल है।
मोनिका रावत मगरूर
घमंडपुर, कोटद्वार
पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखण्ड।
44 ???
भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है
सबका अन्नदाता किसान बेबस लाचार बदहाल है
सूरज से पहले उठ जाता
खून पसीना खूब बहाता
घोर परिश्रम से अन्न उगाये
धरती पर हरियाली लाता
लोगों को भोजन देने वाला भूखा सोये कमाल है
भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है
देख कर मुस्काती सूरत को
क्या समझेगा परेशानी कोई
पल पल ठगा गया है उसको
सक्षम की नीयत हुई हैवानी
कर्ज़ में दबता ही जाता दुःखी कृषक प्रतिसाल है
भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है.
ये सरकारें भी न सुने गुहार
गरीबी में शोषण दे उपहार
यूँ ही न आत्मघाती होते ये
निराश हो मृत्यु करें स्वीकार
कृषक-व्यथा-दशा से किसी को न कोई मलाल है
भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है..
भूख से तड़पे है परिवार
बेटी कुँवारी बैठी है द्वार
लाखों सिलवटें माथ पर
कैसे होगी चिंता निराधार
जरुरतों कैसे पूर्ण करें सबकी तैरता मन नैन यही सवाल है
भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है
अनामिका वैश्य आईना
लखनऊ
45 किसान के अरमान
लहलहा रही फसल है,
लहराते हैं मन में अरमान,
पिछले बरस की हालत से,
था वो किसान परेशान|
इस बार बहुत खुश है,
करता है नमन प्रणाम,
इस बार फसल अच्छी है,
कृपा तेरी है भगवान|
इस बार मैं लाऊंगा,
बच्चों के नए कपडे,
इस बार ले आऊँगा,
जो गिरवी रखे थे कड़े|
मुन्ना को खिलौने दिलाऊँगा,
अपनी मुन्नी का ब्याह रचाऊँगा,
कजरी के लिए सारी नयी लाऊँगा,
उसे इस बार अपना प्यार जताऊँगा|
देखे ख्वाब सुनहरे अपने खेतों में,
तभी घर बुलाया उसके चहेतों ने,
खुश देखकर उसे घर में थी खुशहाली,
अब न रहेगी अन्न की कोठरी वो खाली|
सोया था वो सुकून से, दिल में उमंग थी,
लेकिन सुबह हर दिल में इक नयी जंग थी,
कसूर था बारिश का या किस्मत की मार थी,
फसल जो लहलहा रही थी वो अब बेकार थी|
आँखों में आँसू तैर गए, संग सपने भी बह गए,
बस किसान के साथ अरमां उसके रह गए,
तकलीफ न सह पाया था वो पिछली बार की तरह,
खुद को लटकाया फंदे से किसी कसूरवार की तरह|
मीना सिंह “मीन”
स्वरचित, नई दिल्ली
46 ????
कृषक और किसानी है
भारत की पहचान
बंजर धरती से स्वर्ण उगाए
वो है एक किसान
सबको दाल रोटी खिलाता
खुद भूखा रह जाता है
अपने हक की लड़ाई वो
कभी नहीं लड़ पाता है।
सुखी हुई फसल देखकर
रुआंसा कृषक होता परेशान
कर्ज़ में डूबा वो बेचारा
इक दिन दे देता है अपनी जान।
बिचौलियों का मोहरा बनता
सूदखोरों के गलत फरमान
मखौल बनाते सरकारी दस्ते
सस्ते में बिकता अन्न औ धान।
बरस भर कड़ी मेहनत करके
उगाता है वो इक इक दाना
बदले में उस निरीह को
मिलता है रुपया पर चार आना।
उसकी कड़ी मेहनत का तो
कुछ तो उचित मिले इनाम
अन्नदाता है कृषक हमारा
किसानी है भारत का स्वाभिमान।
वीर जवान सा महानायक
हमारे देश का किसान भी है
जिसमें परिश्रम और ईमानदारी
और खुद्दारी का ईमान भी है
इन सूदखोरों को मसीहा का दर्जा
चालाकी से दे दिया जाता है
जो असली हकदार हैं यहाँ
उन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है ।
गाँव के भोले भाले कृषक को
मिले जब उचित मान सम्मान
ग्राम्य भारत से ही होती है
गौरवशाली भारत की पहचान।।
वंदना सोलंकी
47 किसान
क्या सुनाऊँ किसान की व्यथा,
तकलीफो से भरी है इनकी कथा।
सुबह हल बैल लेकर खेतो में जाता है,
खेतो में फ़सल उगाने के लिए खूब पसीना बहाते है।
********************
फसल लगाने के बाद आसमान में ध्यान लगता है,
फसल होने के बाद मंडी को जाता है।
सभी का पेट भरने वाला भूखा पेट रह जाता है।
सरकार की योजनाओं को ताकता रह जाता है।
***************
किसान अन्नदाता है वह भाग्य विधाता है
कड़ी धूप में मेहनत करके अपना फर्ज निभाता है ।
किसान की सब की भूख मिटाता है,
किसान ही भारत की शान बढ़ाता है।
उषा साहू
48 किसान
मेहनत से सिच धरा को जो अन्न उपजाये।
ख़ुद के पसीने से जो देश के भूख को मिटाये।।
जिसके भावना से प्रसन्न होता है भगवान।
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
क्या आंधी क्या बारिश वो तो सब झेल जाता।
ना तो है नेता अफसर फिर भी देश चलाता।।
गरीब होकर भी जो है दिल से सदा धनवान।
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
जिसके ऊपर राजनीति कर चमकते है पॉलिटिशियन।
जिसके साथ एक नही अनेकों प्रकार के रहता है टेंशन।।
ये देश का दुर्भाग्य है ऐसे विरो को नही मिलता सम्मान।
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
तन पे ना सूट बूट है ना कहे इसे कोई बाबु भैया।
आकाल से देश को बचाये,है मझधार में खिवैया।।
जिसके दमपर मुश्कुराता है मेरा पूरा हिंदुस्तान।
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
इतना कुछ करके भी जो महगाई का झेल रहे है मार,
है अन्नदाता फिर भी नही मिलता जिसका अधिकार।।
ब्याज के बोझ तले दम तोड़,निकल रहा जिसके प्राण
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
अब भी समय है मानों क्या है इनके हम पे उपकार।
नही तो धरा धराशायी होगी,नष्ट हो जाएगा ये संसार।।
समय रहते बचा लो उनको जो है तुम्हारे लिए वरदान।
आन बान शान है मेरे देश के किसान।।
प्रकाश कुमार
मधुबनी, बिहार
49 दोहे
दिन उगते ही चल पडा ,
घर से खेत किसान ।
दिन भर माटी खोदता ,
फिर बोता है धान ।।
जलती काया धूप में ,
तन से बहता स्वेद ।
श्रम करता है खेत में ,
मन में रहता खेद ।।
उचित मूल्य मिलता नहीं ,
भूखा रहता पेट ।।
मर- मर के जीता रहे ,
अपनी व्यथा समेट ।।
बंजर धरती जोतता ,
चलता बैलों साथ ।
पैरों में कांटे चुभें ,
छाले पड़ते हाथ ।।
श्रम बोता है खेत में ,
करता कर्म महान ।
सिंचन करता स्वेद से ,
धरती पुत्र किसान ।।
अन्न उगाता खेत में ,
खाये सारा देश ।
तन से चिपका पेट है ,
फटा पुराना वेश ।।
कभी बाढ़ सूखा कभी ,
प्रकृति छले किसान ।
कर्ज गरीबी डूबता ,
कैसा कर्म विधान ।।
पत्नी बच्चे झेलते ,
सदा गरीबी दंश ।
भाग्य भरोसे कर्म कर ,
बाट जोहते अंश ।।
बच्चों से वादा करे ,
कृषक पिता हर वर्ष ।
खुश हो जाते झूठ ही ,
मुख पर होता हर्ष ।।
अच्छे दिन की आस में ,
झेलें सदा अभाव ।
मन ही मन में सोचते ,
चलती जीवन नाव ।।
बेटी की शादी करी ,
गिरवी रख कर खेत ।
फिसल गया सब हाथ से ,
जैसे मुठ्ठी रेत ।।
आँखों में निदिया नहीं ,
जागे सारी रैन ।
चिंता घर की खा रही ,
मौन हुए हैं बैन ।।
लड़े गरीबी रात दिन ,
जीवन लगता भार ।
निर्णय उसने कर लिया ,
मानी जीवन हार ।।
घर के बाहर पेड़ पर ,
लटकी थी इक लाश ।
लोग तमाशा देखते ,
खड़े हुए थे पास ।।
चिंतन मिलकर कीजिये ,
इसमें किसका दोष ।
सोच- सोच कर हो रहा ,
मन में भारी रोष ।।
मीरा भार्गव सुदर्शना
कटनी मध्यप्रदेश
50 किसान की व्यथा
नहीं चाहता बनूँ किसान ।
नहीं सुनूँ मैं कोई फरमान ।।
रात औ दिन ख़तरों से खेलूँ ।
गाली औ कड़वी बातें झेलूँ ।
फिर भी नहीं मिले सम्मान ।
नहीं चाहता बनूँ -------
करता मेहनत बहुत ही कडी़ ।
तपता सूरज बारिश की झडी़ ।
अपने जीवन का नहीं विहान ।
नहीं चाहता बनूँ -------
हफ्तों बच्चे का मुँह न देखें ।
जब उठें भोर सरपट ही भागें ।
फिर भी पत्थर बना जहान ।
नहीं चाहता बनूँ -------
जब पानी सर से है गुज़रता ।
तब सारा ही परिवार बिखरता ।
पेड़ से लटके तब ये नादान ।
नहीं चाहता बनूँ -------
नहीं किसी की गाली सहना ।
स्वाभिमान जीवन का है गहना।
बंद करो अब मेरा अपमान ।
नहीं चाहता बनूँ ------
जि़दा रह कर भी क्या करता ।
सब कुछ यूँ ही सहता रहता ।
मुझसे ही है ये देश महान ।
नहीं चाहता बनूँ -------
डाः नेहा इलाहाबादी ( दिल्ली )
51 किसान है कौन?
मिट्टी के आलिंगन से वो तृप्त होता है,
दिखावे के बंधन से वो मुक्त होता है।
अन्नदाता की ख़ूबी में कहूँ भी क्या
मेहनत के चंदन से वो अभिषिक्त होता है।।
दर्द के चुभन से वो त्रस्त होता है,
राजनीति के तपन से वो तप्त होता है।
निवाले के जन्मदाता की बानगी कहूँ भी क्या
लालच के सपन से वो अवमुक्त होता है।।
जितेन्द्र विजयश्री पाण्डेय "जीत"
मिर्ज़ापुर-प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
आयोजक: प्रतिध्वनि साहित्य समूह
52 किसान कि मजबूरी
जिसके कांधे पर जिम्मेदारीयो का
पगड़ी है फसलो पे जिसके विपदा
आन पड़ी है जिसने अपने खून -पसीने से अपने घर को सीचा है
हर कठिनाई मे परिवार के रथ
को खीचा है
जो अपने जिंदगी के ऑसूओ को
पी -पी कर हंस देता है वो किसान ही होता है
कडी धूप मे जो काधे पर हल लेकर चलता है हर कठिनाई से
जो लडता है वो देश का किसान
ही होता है
कवि सूरज तिवारी
53 ????
सरकारी योजना के
बीच में आ गई जिसकी जमीन..
उस किसान का
हाल देखा उस दिन
गुलाब के पौधे फूलों से लदे
लहलहा रहे थे
उसके खेत में
मानो खुशी से उन्हें देखते किसान की खुद की ही नजर लग गई ज्यूँ.....
और उसी दिन रेलवे की लाइन उस जगह से निकलने के
फरमान जारी हो गए
मैंने देखा जेसीबी से
उखड़ते,कुचलते उन फूल
पौधों का
वो लाल हरा रंग
मानो किसान की आंखों से
बहते
खून के आंसुओं का
प्रतिनिधित्व कर रहा हो
किसान का मौन रुदन
मेरी छाती को फाड़कर
बाहर आ जाना चाहता था
किन्तु मेरी छाती.....और
किसान के आंसू दोनों ही
बेबस थे
भीतर ही भीतर आक्रोश की
भट्टी में सूख गए थे
उस क्षण ईश्वर से सिर्फ इतना ही कह पाई
अगर ये विकास है तो
हमें नहीं चाहिए
या फिर...कुछ चमत्कार कर दो
अपना देवत्व दिखा दो
कि
खेत को ऊपर उठा दो भगवान.... कि
रेल की पटरी
नीचे से निकल जाए
अन्नदाता का स्थान तो
सदैव ऊंचा ही होता है ना ईश्वर
सुन लो ना ईश्वर
काजल
54 किसान की व्यथा...
*******************
स्वेद बहाता~
कड़ी धूप में भी
हल चलाता
•
कष्ट सहता~
कभी किसी से कुछ
नही कहता
•
मन हर्षाता~
खेतों में फसलों को
है लहराता
•
है अन्नदाता~
फिर भी अभावों में
जीवन जीता
•
सब हैं मौन~
किसान की व्यथा को
सुनता कौन
•
*******************
निर्मल जैन 'नीर'
ऋषभदेव/उदयपुर
55 किसान की व्यथा
गर्मी जाड़ा धूप है सहता
कभी नही है थकता।
सबका पेट भरने को
धरती से अन्न उजता ।।
भारत का किसान भले
गरीबी का जीवन जीता।
हर अमीर आदमी को
धरती से अन्न उपजता।
खाद पानी से पोषित कर
धरती मां की सेवा करता।
पसीने की बूंद-बूँद से
धरती से अन्न उपजता।
मिट्टी का जन्म हुआ
मिट्टी में ही पलता बढता।
मिट्टी में खेलकूद कर
धरती से अन्न उपजता ।।
ना ऐशो आराम की वस्तु
नाआलीशान बंगला बनाता।।
कर्जे में ही डूब -डूब कर
धरती से अन्न उपजता।
बेटा सीमा पर डटकर
देश की सेवा करता।
पिता मिट्टी खोदकर
धरती से अन्न उपजता।
दोनों का समर्पण देखो।
हम सब इनके कर्ज दाता।
एक राष्ट्र की करता, दूजा
धरती से अन्न उपजाता।
सच्चा भारत का लाल है तू
देश का किसान कहलाता।
सुख दुख सहता फिर भी
धरती से अन्न उपजाता ।
कभी आखों में आंसू
रख पुत्र की अर्थी कांधे।
मिट्टी को मिट्टी में मिला
डॉति से अन्न उपजाता।
सन्नू नेगी
गौचर (चमोली,)
उत्तराखंड
56 किसान की व्यथा
मैं किसान हूँ
अब आपने अनुमान लगा ही लिया होगा
कि मेरे पिता एवं पितामह भी
अवश्य ही किसान रहे होंगे
आपका अनुमान सही है श्रीमान
मेरे पूर्वज भी थे किसान
किसान का पुत्र किसान हो या ना हो
किसान का पिता अवश्य किसान होता है
किसान होना तो अभिशाप समझा जाता है
अगर विश्वास ना हो तो आप कभी किसी को
किसान बनने का आशीर्वाद देकर देख लीजिए
आपका भ्रम अवश्य दूर हो जाएगा
किसान पर लिखना और बोलना आसान है
कठिन तो है किसान बनना
किसान बनकर जीवन व्यतीत करना आसान नहीं होता
धैर्य, साहस और समर्पण चाहिए
किसान को संतान सी प्रिय होती है
लहलहाती हुई फ़सल
और परम प्रिय को खोने की पीड़ा के समान ही होता है
फ़सलों के नष्ट होने का कष्ट
किसान की व्यथा को
इस भूतल पर
केवल किसान ही समझ सकता है
और कोई नहीं
आलोक कौशिक
(साहित्यकार एवं पत्रकार)
मनीषा मैन्शन, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार
चलभाष संख्या-
57 भूमिपुत्र की पीड़ा "
****************
वर्षा की आस में ,गगन को ताक रहा है।
सूखी धरा को जल मिले,ये दुआ माँग रहा है
फिर एक बार सूखे की आहट डरा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
सोचा था;अच्छी फसल से सब उधारी चुकाऊँगा।
बच्चों को दो वक्त भरपेट खाना खिलाऊँगा।
इस बरस बिटिया की शादी भी आ रही है,
पर कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
जेठ की तपती धूप में दिन-रैन पसीना बहाया।
कभी अकाल कभी ओलों ने,फसलों को मिटाया।
सरकार कागजों पर ही,मुआवज़े दिखा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
देश का अन्नदाता आत्महत्या कर रहा है।
कहीं अकेला कहीं सपरिवार सूली चढ़ रहा है।
भूमिपुत्र से उसकी ,माँ भूमि छीनी जा रही ।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।।
रितु अग्रवाल
( बेंगलुरु)
आयोजक : प्रतिध्वनि साहित्य समूह
58 किसान की व्यथा
मैं राष्ट्र भक्त किसान हूँ
मैं भूखों का भगवान हूँ !!
मेहनत की सफलता पर आस लगाये रहता हू
ये भारत का किसान कहलाता हूँ !!
परेशान है भूख से , आंखे आसमान को निहार रही ।
चिलचिलाती धूप ,किसान की क़िस्मत की परीक्षा ले रही।।
क़र्ज़ के बोझ से कृषक हमेशा दबा रहता !
क़र्ज़ से कैसे मिले छुटकारा सोच में रहता !!
कोई सुनता नहीं अन्नदाता की सरकार भी मौन है !
आत्महत्या कर किसान सब तकलीफ़ों से खामोश है !!
किसान की व्यथा पर सरकारें सभी चुप है ।
देती नहीं मददत सुनती नहीं गुहार है !!
किसान सबका पेट भरता वहीं भूख से बेहाल है
कष्टों की है ज़िंदगी ,अच्छे दिन की आशा मे जी रहा!!
चित्कार कर रही है आत्मा अन्नदाता अन्न के लिए परेशान है !
बिलख रहे है मासूम बच्चे , मानवता भी परेशान है ! !
लाकडाऊन ने कैसा दिया धोका
फसल कटाई हुई नही , सुख गये सब खेत !!
राष्ट्रभक्त किसान हू , देश की सेवा करता हूँ
बंजर खेतों को भी फसलों से लहराया करता हूँ !!
मैं हूँ राष्ट्रभक्त किसान सुन लो मेरी व्यथा !
कोई तो जागो मेरी पीड़ा पहचाने सुनकर मेरी कथा !!
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई
59 किसान की व्यथा
किसान देश का अन्न दाता कहलाता है
पर अनाज न वो कभी भरपेट पाता है
वो अपनी मेहनत से अनाज उगाता है
पर मेहनत का फल कोई और खा जाता है
वो तो सिर्फ दो जून की रोटी ही जुटा पाता है
किसान के फसल का नही है कोई मोल
बाजार मे पहुंचते ही वो हो जाता अनमोल
फसलों को खरीद कर धन्ना सेठ बन जाते है
हाड़ तोड़ मेहनत कर वो गरीब ही रह जाता है
वो भूखे पेट रहकर सबका पेट पालता है
किसान देश का अन्न दाता..........
गरीबी देश के किसान की पहचान है
कभी फसलों की दवाई के लिए
तो कभी खाद एवं बीज के लिए
कभी प्राकृतिक आपदा की मार से
तो कभी कीट पंतगों के वार से
कभी नदियों में आई बाढ़ से
तो कभी पानी के अभाव से
कभी अनाज के भरपूर पैदावार से
कभी बिचौलियों से कभी साहूकार से
किसान हमेशा होता हलाकान है
फिर भी नही छोड़ता खेत खलीहान है
तकलीफ सहकर भी वो अन्न उपजाता है
किसान देश का अन्न दाता..........
अनिल कुमार मिश्रा
कोरबा छत्तीसगढ़
बहुत सुन्दर सभी कि रचना
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