किसान की व्यथा: राजेश तिवारी "मक्खन"

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में  उत्तम  चुनी गई रचना


आसमान से ओले आते देख आंख भर आयी ।

बने विधाता वाम कृषक ने कैसी किस्मत पायी ।।

कर परिश्रम्य असीम खेत में बीज कृषक ने बोया ।

चाम हो गया श्याम घाम से रात नींद अति सोया ।।

जमा बीज जब देख देखकर हुआ हृदय हरषायी ।।-.--.--.--.--.--.-१


नीद गुडाई करी कुटुम्ब संग ,सींच सींच श्रम भारी ।

किया कलेऊ बैठ कदम्ब तर ,जल भर लायी नारी।।

किया हास परिहास विगत श्रम , हाथ कुदाल उठायी ।।-.--.--.--.--.--.-२


लगा के बारी कर रखवारी बीत विभावरी जाती ।

रोज रोज और नील गाय के कारन नींद न आती ।।

मेङन मेङन करत रतजगा , गावत फाग दिवायी ।।-.--.--.--.--.--.--.-३


खेत लहलहा देख कृषक तब मन में है हरषाता ।

बरष जाहि में ब्याह बिटू को लगता करत विधाता ।।

कंगन कर्ज में रखे कबैके , अबके लेहु उठायी ।।-.--.--.--.--.--.--.--.--.-४


घटा घिरी घनघोर चहु दिश गया हृदय घबरायी ।

सोचा क्या क्या आज प्रभू जी कैसी विपदा आयी ।।

दौङा दौङा गया खेत पर गिरा भूमि भररायी ।।-.--.--.--.--.--.--५


आसमान से ओले आते देख आंख भर आयी ।

फसल नष्ट सी देख दुर्दशा हारा हिम्मत भायी ।।

चढ़ बबूल पर वाही दिन को फांसी गले लगायी ।।-.--.--.६


प्यारे ऐसा न करते तुम , मेहनत मजदूरी करते ।

पीले हाथ अपनी बिटिया के, सम्मेलन में करते ।।

सोची समझी नहीं सजन ने , आफद दई बङायी ।।

बने विधाता बाम कृषक ने,कैसी किस्मत पायी ।।.......॥॥.७



राजेश तिवारी "मक्खन"

झांसी उ.प्र.


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