किसान की व्यथा: बिप्लव कुमार सिंह

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में  उत्तम  चुनी गई रचना



किसान हैं देश के अन्न प्रदाता,

इनके कारण ही हमें भोजन है मिलता,

तपती धूप में परिश्रम करते हैं ये सदा,

तब जाकर अन्न का भंडार भरा रहता है सदा।

करते हैं ये माँ वशुन्धरा की सेवा मनोभाव से,

अपने पूर्वजों के कार्य को बढ़ाते हैं आगे बड़े ही गर्व से,

मगर क्या इनको उचित सम्मान है मिल पाता,

क्यों इन्हें ही भर पेट भोजन नहीं है मिल पाता।

आये दिन अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं,

किसानों की समस्याओं के समाचारों से,

कभी किसी किसान के आत्महत्या कर लेने से,

तो कभी किसी के परदेश पलायन कर जाने से।

कभी झेलते हैं ये मार सूखे की,

तो कभी आती है आफत बाढ़ की,

प्रकृति भी देती है इन्हें अक्सर ही धोखा,

रोते-रोते ही गुजर जाता है जीवन इनका।

कर्ज में डूबे रहते हैं हमारे अन्न प्रदाता सदा,

इन्ही के घर अक्सर बुझ जाता है चूल्हा,

भर तन कपड़े को भी ललक जाते हैं इनके बच्चे,

त्योहारों में भी उदासी छायी होती है घर पर इनके।

सरकारें बनती गयीं और बिगड़ती गयीं,

किसानों की समस्याएँ ज्यों की त्यों रह गयी,

आज भी तांता लगा रहता है महाजनों का द्वार पर इनके,

कर्ज वसूली को अक्सर बंधुआ मजदूर बन जाते हैं बच्चे इनके।

कोई तो इनके समस्याओं का करो समाधान,

इनकी दयनीय स्तिथि का अब तो करो निदान,

कहीं वो दिन न देखना पड़े हमसभी को,

जब देश में बाकी न रह जाये कोई किसान।



बिप्लव कुमार सिंह

फ़रीदाबाद, हरियाणा।


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