मन की व्यथा: शहनाज़ बानो

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में श्रेष्ठ  चुनी गई रचना।


वो भूमि से अन्न उगाता ,

अन्नदाता कहलाता है।

कड़ी धूप या आंधी पानी,

मेहनत से न घबराता है।।

इस बार फिर सोचा था,

अच्छी फसल उगाना है।

मेहनत करके रात दिन ,

उपज खूब बढ़ाना है।।

बिटिया हुई बीस की अबकी,

उसका ब्याह रचाना है।

अपनी पत्नी को भी अबकी,

नई साड़ी दिलवाना है।।

सपने आंखों में पाले थे,

मेहनत भी भरपूर करी।

बारिश, आँधी कड़ी धूप,

उसकी न परवाह करी।।

अंकुर फूटा फसल उपजी,

मन में हरियाली छाई।

लेकिन प्रकृति के आगे,

कब किसकी है चलने पाई।।

ओले बारिश ने देखो,

फसलों को बर्बाद किया।

कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ ने,

किसानों को एक दर्द दिया।।

अपनी व्यथा किससे कहूँ,

आँखों में सिर्फ पानी है।

हर वर्ष ऐसी ही किसानों की,

कोई न कोई कहानी है।।


शहनाज़ बानो

चित्रकूट, उ०प्र०


Comments

Popular posts from this blog

प्रतियोगिता #08: गजेंद्र कुमार घोगरे

प्रतियोगिता #08- गीतांजली वार्ष्णेय “सूर्यान्जली’

प्रतिध्वनि समूह प्रतियोगिता #9: अनमोल पाती भाई/ बहन के नाम