मैं किसान हूँ: विवेक मिश्र "अंचल"

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में  उत्तम  चुनी गई रचना



अन्नदाता ,धरतीपुत्र और भी अगणित हैं नाम,

मैं वही हूँ, हाँ वही हूँ देश का गरीब किसान।

कड़ी धूप में जलकर, सन- कर ,

करता रहता हूँ अथक परिश्रम ।

अपने हित जो मिला ठीक है,

पर अर्जित करता सबके हित भोजन।

धरती का सीना फाड़-चीर कर ,

बीज मोती का हूँ धरता।

लहलहाए धरा अपनी ,

यत्न मैं सब कुछ वो करता ।

स्वावलंबी, मेहनती हूँ ,

रखता नही किसी से आस।

पर प्रकृति जब रूठ जाए,

तो मैं जाऊं किसके पास ।

पूँजी लगाकर उम्र भर की,

बंजर धरा में भी दाँव हूँ मैं खेलता।

अतिबृष्टि, अनाबृष्टि, हिमपात

हिंसक जानवरों का दंश भी हूँ झेलता।

मिलती नही फसल की लागत ,

तब मन हो जाता है खिन्न।

हौसला दें प्रभु मुझको,

अविचल, आजीवन उत्पन्न कर सकूँ अन्न ।


विवेक मिश्र "अंचल"

स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश


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