किसान की व्यथा: गौरव सिंह घाणेराव

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में  सर्वश्रेष्ठ  चुनी गई रचना


मिट्टी से जन्म लेकर,

हम मिट्टी में मिल जाते है।

जीवन के संघर्षो से

दिन रात लड़ते जाते है।

दो जून की रोटी की जुगत में

हम रोजी को भटक जाते है।

घर बार छोड़कर घर बार के

भरण पोषण को जाते है।

मिट्टी से खड़े हुए किसान

और मिट्टी में मिल जाते है।।

देश की नींव का पत्थर

किसान वर्ग ही होते है।

अमीर वर्ग के सुख भोगो को

अपने कंधो पर ढोते है।

दिन रात पसीने की खाद से

हम मेहनत का बीज बोते है।

अधिकार हमे न मिल पाया

न सपने कोई संजोते है।

देश की प्रगति रथ के पहिये

किसान ही तो होते है।।

बच्चे हमारे अभावो में ही

जीवन अपना बिताते है।

माँ-बाप अभागे ऐसे जो

दुःखो के अश्क पिलाते है।

हुनर भरा है भुजबल में

पर सुख कमा न पाते है।

परिश्रम की दौलत से

ऊँचे महल बहुत बनाते है।

पर महलो के सुख को हम

कभी भोग न पाते है।

अभावो से नाता गहरा है

नाता यही निभाते है।

मजबूर नही है पर मजदूरी से ही

जीवन अपना बिताते है।।


गौरव सिंह घाणेराव

(अध्यापक,लेखक,कवि)

सुमेरपुर,राजस्थान


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