किसान : अनामिका वैश्य आईना

19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में श्रेष्ठ  चुनी गई रचना।

किसान बेबस लाचार बदहाल है

सूरज से पहले उठ जाता

खून पसीना खूब बहाता

घोर परिश्रम से अन्न उगाये

धरती पर हरियाली लाता

लोगों को भोजन देने वाला भूखा सोये कमाल है

भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है

देख कर मुस्काती सूरत को

क्या समझेगा परेशानी कोई

पल पल ठगा गया है उसको

सक्षम की नीयत हुई हैवानी

कर्ज़ में दबता ही जाता दुःखी कृषक प्रतिसाल है

भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है.

ये सरकारें भी न सुने गुहार

गरीबी में शोषण दे उपहार

यूँ ही न आत्मघाती होते ये

निराश हो मृत्यु करें स्वीकार

कृषक-व्यथा-दशा से किसी को न कोई मलाल है

भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है..

भूख से तड़पे है परिवार

बेटी कुँवारी बैठी है द्वार

लाखों सिलवटें माथ पर

कैसे होगी चिंता निराधार

जरुरतों कैसे पूर्ण करें सबकी तैरता मन नैन यही सवाल है

भूख गरीबी धूप से व्याकुल देखो कितना बेहाल है


अनामिका वैश्य आईना

लखनऊ


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