भूमिपुत्र की पीड़ा: रितु अग्रवाल
19 जुलाई 2020 को आयोजित प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ चुनी गई रचना
वर्षा की आस में ,गगन को ताक रहा है।
सूखी धरा को जल मिले,ये दुआ माँग रहा है
फिर एक बार सूखे की आहट डरा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
सोचा था;अच्छी फसल से सब उधारी चुकाऊँगा।
बच्चों को दो वक्त भरपेट खाना खिलाऊँगा।
इस बरस बिटिया की शादी भी आ रही है,
पर कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
जेठ की तपती धूप में दिन-रैन पसीना बहाया।
कभी अकाल कभी ओलों ने,फसलों को मिटाया।
सरकार कागजों पर ही,मुआवज़े दिखा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
देश का अन्नदाता आत्महत्या कर रहा है।
कहीं अकेला कहीं सपरिवार सूली चढ़ रहा है।
भूमिपुत्र से उसकी ,माँ भूमि छीनी जा रही ।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।
कुदरत भी किसान का नसीब आजमा रही है।।
रितु अग्रवाल
( बेंगलुरु)
आयोजक : प्रतिध्वनि साहित्य समूह
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