प्रतियोगिता #08: चंचल हरेंद्र वशिष्ट
मेहंदी रचे हाथ, सजन के साथ
'मेंहदी से रचे हाथ उन्हें इस कदर भाते हैं
शायद ये पहले स्पर्श की याद दिलाते हैं'
मेंहदी से रची इन सुर्ख हथेलियों से ही
हाँं!.......इन्हीं से तो शुरू की थी
तुम्हारे साथ एक नई जिंदगी
सबसे पहले शगुन की मेंहदी जो
तुम्हारे ही नाम की रचाई थी मैंने
और उस दिन से मेंहदी की रात तक
एक एक दिन तुम्हारे नाम के सहारे
मन ही मन मुस्कुराते हुए हैं गुज़ारे!
मेंहदी की लाली याद दिलाती रहती
कि तुम अब साथ हो मेरे हर पल
मेरी सांसों में है अब तुम्हारे ही
नाम की खुशबू वो, हर घड़ी,पल-पल!
विवाह सूत्र बंधन में भी तो तुम्हारे
हाथों ने थामे सबसे पहले यही
मेंहदी से रचे सुर्ख लाल हाथ
और हम हो गए हमेशा-हमेशा के लिए
एक-दूसरे के,थामे हाथों में हाथ!
विदाई के वक्त इन्हीं मेंहदी वाले हाथों से मेंहदी की थाप द्वार पर लगा अपनी निशानी के रूप में,...छोड़कर दहलीज मायके की,
अपना पहला कदम रखा मैंने तुम्हारे घर की दहलीज मे........तुम्हारे साथ,
मेंहदी वाले इन्हीं हाथों में लिए तुम्हारा हाथ !
कुलदेवपूजन हो या चरणस्पर्श
या कंगने-अंगूठी की रस्म परंपरा
मेंहदी की रंगत लिए हाथों ने
इस जीवन में इंद्रधनुषी रंग भरा!
सौभाग्य रात्रि में प्रथम मिलन की
मधुर बेला में भी तो साक्षी रही
इन हाथों की सुर्ख मेहंदी यही,
सुहागसेज पर सिंदूरी आभा बिखेरती
मेंहदी से रची ये हथेलियां मेरी!
और फिर बढ़कर जो थामा हाथ तुमने वो
मेंहदी की लाली अचानक गालों पर आ गई
उस प्रणय निशा पर ज्यों सुर्खी सी छा गई
हथेलियों से सीधे उतर आई मेरी जिंदगी में
वो मेंहदी की महक मेरा जीवन महका गई!
बदल गई यूं जिंदगी हो गई सिन्दूरी सुबह जैसे
तुम्हारे नाम की मेंहदी मेरे तन-मन में समा गई...........!!
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