प्रतिध्वनि साप्ताहिक प्रतियोगिता# 11: आजादी के असली मायने

  

साप्ताहिक प्रतियोगिता# 11 

दिनांक -16/8/ 2020 

विषय- आजादी के असली मायने 

विधा - लेख




1. ????


बेशक देश आजाद हुआ ।अनेकों जांबाज़ इस आजादी की खातिर शहीद हुए। अनेकों वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता के यज्ञ में अपनी आहुति दी ।लेकिन देश उनके सपनों के भारत को जीवित नहीं रख पाया।


 "आजाद हुए उन फिरंगीयों से ,

मकसद अपना भूल गए ,

गांधी ,नेहरू ,बोस के ,

सपनों का भारत भूल गए।'


 हमने अंग्रेजों से तो आजादी पा ली ,लेकिन हम राम- रहीम के मसलों में उलझ गए ।आज भी रोज अखबारों में किसी बहू- बेटी के साथ घिनौने काम का समाचार आम हैं ।फिर हाथ में मोमबत्ती लेकर निकलती पूरी आवाम है। आज भी हमारे देश के सैनिकों को मरणोपरांत मिलता सम्मान है। तो फिर कैसे कह दूं कि हम आजाद हैं ।हम आजाद तब कहलाएंगे जब देश अपने दुर्विचारों से आजाद होगा। देश की बेटी सुरक्षित होगी। धर्म-जाति का मसला ना होगा व देश के रक्षकों का जीते जी सम्मान होगा।


स्वाति मानधना 'सुहासिनी' बालोतरा






2.  बचपन वाला 15 अगस्त


एक बार फिर 15 अगस्त मनाया वैसे ही हर्ष और उल्लास के साथ जैसे हर साल मनाते हैं पर कोई कसक सी लगी क्योंकि इस बार किसी से हाथ नहीं मिलाया और कहीं आना जाना नहीं हुआ।इस कोरोना काल की वजह से ऐसे ही और भी त्योहार मने पर आज के लिए मुझे खास बुरा लगा।

फिर कुछ ख्याल आये गये बिल्कुल आजाद ख्याल कैसे बचपन मे स्कूल मे हमेशा 15 अगस्त मनाते थे पडोस वाले जैन अंकल के घर पर सब बैठते,उनका बडा घर था तो हम सभी पास पडोस के लोग वहां बैठकर बहुत सी बातें करते,पतंग उडाते, मिठाई खाते बस मजे करते।

जैसे जैसे बडे हुए जिम्मेदारियां आ बैठीं हैं कंधों पर और हम संवेदनहीन होते चले गये। इतने ज़्यादा कि इंसान से ज़्यादा मशीन होते चले गये। सिर्फ अपना घर,अपने बच्चे, अपनी नौकरी हम भूलते जा रहे हैं ये देश भी अपना है, कुछ मुट्ठी भर लोग इस कोशिश मे हैं कि हमें जाति और धर्म के नाम पर बाँट दें सिर्फ अपने फायदे के लिये और मेरा बचपन वाला,बेफिक्री वाला 15 अगस्त  छीन लें।

अगर हम सोचें ऐसा हमें नहीं होने देना है अगला ख्याल आता है,हम कर ही क्या सकते हैं तो जवाब है अफवाहें न फैलायें,बच्चों के मन मे सभी इंसानों के प्रति प्रेम भाव जगायें।हर बात का जवाब का नफरत से न दें।थोड़ी थोड़ी जिम्मेदारी हम सब निभायेंगे तो वो बचपन वाला 15 अगस्त ज़रूर आयेगा।मेरे लिये असली आजादी के मायने एक साथ ईद,दिवाली, बैसाखी और क्रिसमस एक साथ मिलजुलकर मनाने मे है।


सना

...(दिल्ली)







3. आज़ादी 


आज़ादी का सही मायने अभिव्यक्ति की आज़ादी विचारों में एक रूपता, पहनावे में घूरती नज़रों का रूकना, लड़की के बाहर जाने पर सुरक्षित और सहज महसूस होना चाहिए, छेड़छाड़ के कारण आज भी लड़की और माता पिता डरते हैं. उच्च शिक्षा के लिए छोटे शहर की लड़कियां आज भी नहीं जा पाती,समय खराब है यही सुनने को मिलता है, समय बदल रहा है... ये सत्य है लेकिन कितना..???

      हमारा देश आजाद तो हुआ है लेकिन कुछ हद तक अभी भी पिछड़ा हुआ है, आज किसी भी स्कूल या कॉलेज में नौकरी के लिए जाएं ...नौकरी के लिए कितनी माथा पच्ची है, सैलरी देते कम है स्कूल प्रबन्धक और हस्ताक्षर ज्यादा पर कराते हैं,काम भी बहुत लेते हैं, तो बताएं कहा है आज़ादी.

       आज़ादी के असली मायने तब होंगे जितना काम उतना दाम,अभिव्यक्ति का शोषण आज भी हो रहा है, ये हमारे भारत की ऐसी भी झलकियां हैं.


भावना गौड़

 ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश)







4 असली आज़ादी

                 *************


हम भारतवासियों को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिले हुए तिहत्तर वर्ष हो चुके हैं । हम हर साल पूरे हर्षोल्लास से आज़ादी का जश्न मनाते हैं । पर कभी - कभी मैं सोचने पर विवश हो जाती हूँ कि क्या हम अपनी आजादी का वास्तविक अर्थ एवं मूल्य समझते हैं ? 

व्यवहारिक रूप से उत्तर ' नहीं ' में ही होगा।


आज़ादी का अर्थ सिर्फ़ लोकतंत्र , संविधान, हमारे अधिकार ही नहीं हैं बल्कि आज़ादी अपने साथ बहुत सारी जिम्मेदारियाँ भी नागरिकों को देती है । हम

अपने अधिकारों के प्रति तो बहुत सजग रहते हैं पर कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। आज़ादी का असली स्वरूप तभी देख सकेंगे जब हम धर्म, संप्रदाय,भाषा, जाति, वर्ग, लिंग , स्तर , पद आदि का भेद मिटाकर ; समानता, संप्रभुता, सहिष्णुता , सौहार्द और भाईचारे का भाव आत्मसात करेंगे । बहुत सी समस्याएँ जैसे , भ्रष्टाचार, घूसखोरी , स्त्री सुरक्षा, सभी को मूलभूत सुविधाओं जैसे पर्याप्त भोजन, साफ़ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, घर, रोजगार की, सभी को  समान रूप से प्राप्ति ; हमारे आज़ादी के संघर्ष को सही मायने में  सफल सिद्ध करेगी।


एक माँ के तौर पर; मेरे लिए असली आजादी का अर्थ है जब मेरी बेटी बिना किसी डर, झिझक या शंका के आधी रात के समय भी सुरक्षित,अकेली कहीं भी आ-जा सके ।

धन्यवाद!


रितु अग्रवाल

      बेंगलुरु ( कर्नाटक)






5. ?????


15 अगस्त के दिन हम सभी भारतवासी आजादी का उत्सव धूमधाम से मनाते हैं। वीर-शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है तब जाकर हमें आजादी मिली, लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि आजादी का असली मतलब क्या है? आजादी के असली मायने हैं कि हम जिस भारतदेश में रहते हैं, उस भारतमाता के लिए, भारत में रहने वाले देशवासियों के लिए अपना निःस्वार्थ भाव से कर्म करें। ऊँच-नीच की भेदभावना को अपने दिल से पूरी तरह से मिटा दें, क्योंकि केवल देश स्वतन्त्र होने से ही कुछ नहीं हाेता,जब तक हम अपनी सोच-विचार को स्वतन्त्र नहीं रखेंगे तब तक आजादी का कोई मतलब नहीं। केवल स्वार्थ के वशीभूत होकर हम कर्म करेंगे और केवल अपना ही भला चाहेंगे, तब तक हमें सच्ची आजादी नहीं मिल पायेगी। बेटी को भी हमें बेटों की ही तरह शिक्षित करना होगा, क्योंकि बेटियाँ ही हमारे भारत का भविष्य हैं। अपनी सोच को हमें सकारात्मक रखना होगा,सामाजिक बुराईयों का विरोध करना होगा। बैर-द्वेष की भावना को मन से निकाल बाहर करना होगा। क्योंकि जब हम अच्छा सोचेंगे, अच्छा करेंगे तो बिल्कुल ही अच्छा होगा। इसलिए आजादी के सही मायने यही हैं कि निःस्वार्थ भाव से अपने वतन के लिए बहुत कुछ करना जो कि हम तभी कर सकते हैं जब हम सभी एक-दूसरे के साथ एकता की भावना और प्रेम के साथ मिलके रहेंगें और निःस्वार्थ कर्म करके अपने भारतदेश को आगे बढ़ायेंगे।


डॉ० विजय लक्ष्मी

काठगोदाम,उत्तराखण्ड







6. क्या देश आजाद है। 


देश आजाद हुआ है अंग्रेजो से पर मनः स्थिति से देश अभी भी आजाद नहीं हुआ है। लड़के, लड़कियों में भेदभाव होता है। खाली लड़कियों को ही संस्कार सिखाए जाते है। लड़को को पूरी आजादी दी जाती हैं। गलत करे तो उसे भी नज़र अंदाज़ किया जाता है। 

गांवो मे तो आज भी औरतो पे अत्याचार  होता है। वह जो कमा कमा कर लाती है  उसका पती सब ले लेता है और उसकी इज्जत भी नहीं करता।व्यवहार भी गुलामो की तरह करता है। लड़ता है, झगड़ता है यहाँ तक की मारता भी है। कई तो दहेज के लिए लड़कियों को मार भी दिया जाता है। औरतो के लिए देश आजाद कहाँ हुआ है। 


कहते है उसने ऐसे कपड़े पहने तभी दुष्कर्म हुआ है, तो क्या साड़ी, सूट पहनने वालो के साथ कुछ नहीं होता।   बिलकुल असत्य अधिकतर ऐसो के साथ ही दुष्कर्म हुआ है जिन्होंने साड़ी  या सूट पहना हो और तो और 6 माह  कि बच्ची के साथ भी हुआ है, उसने क्या पहना था, कौनसी अदा दिखाई होगी।

ना तो कपड़ो का योगदान है ना अदा का, खाली विकृत मानसिकता ही है यह। 

तो क्या सही मायने में देश आजाद हुआ है। नहीं आजाद होकर भी देश आजाद नहीं है। 

अंदर से अभी खोखला और कमजोर है। 


ममता बारोट 







7. ???


आज़ाद होकर भी आज हम आज़ाद नही हैं । न तो कहीं आ जा सकते हैं , न ही खुलकर साँस ले सकते हैं । हमारी दशा उस पिंजरे मे कैद पक्षी के समान है जो खाता पीता भी है अपनी भाषा भी बोलता है परन्तु उड़ नहीं सकता । हमारा जीवन भी कुछ ऐसे लोगों के हाथ में कैद है जो हमें रात को दिन कहलवाने पर मजबूर करते हैं ।

                       जहाँ हमारी बेटियाँ चाँद छूने की हिम्मत रखती हैं वही बंद कमरे की खिड़की से चाँद को निहार रही हैं । एक रिक्शे वाले का बेटा अगर डाक्टर बनने का सपना देखता है तो उसका उपहास उड़ाया  जाता है , और उसकी क़ाबिलियत को नजरअंदाज कर एक उच्च वर्गीय बेटे को पैसा देकर डाक्टर बनाया जाता है । तो कहाँ है आज़ादी ? 

                आज़ादी हमारा अधिकार है । फिर क्यूँ हमारा जीवन ऐसे लोगों के हाथ में कैद है जो अपने सपनों को साकार करने के लिए हमारे सपनों को तोड़ रहे हैं  ।  हमें भी अधिकार है कि  हम चाँद को छुएं , हमें भी अधिकार है कि हम डाक्टर बने , यही तो है आज़ादी के असली मायने ।

     है अधिकार हमें कि हो पूरी हमारी मुराद

सिर उठाकर हम भी कहें कि हम हैं आज़ाद 


सूफिया ज़ैदी 

 सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)









8. संशोधन


हम हर वर्ष जश्न ए आजादी तो

  मनाते हैं, और देश में अमन और शांति भी

    चाहते हैं। और साथ ही साथ इस आजाद हिंदुस्तान के,कानून में भी,

 एक छोटा सा संशोधन भी

    चाहते है।

हम आजाद भारत की ना जाने कितनी

  ही बातें लिखतें हैं,और सुनाते हैं।

आजादी सबको हो,और उस पर

    हक भी सबका होना चहिये।

पर आज एक आवाज उठानी है,

एक छोटी सी दरख्वास्त अपनी

  बेटीयों के लिए भी लगानी है।

अभी चंद रोज पहले की ही तो

  बात है,

फिर एक बेटी और बलि चढ़ गई

  इस आजाद से हिंदुस्तान में।

जहाँ कानून तो रोज बन जाते हैं

पर देखा आपने,कभी अमल हो

  पाते हैं।

यहाँ हर बार गाज बेटियों पर ही

   गिर जाती है।

कभी तेजाब की छपाक,तो क़भी

   दर्द भरी चीख,कभी तीन तलाक़

का दर्द,तो कभी Honour killing.

और फिर क्यूँ हर बार फैसला पूरा

  होने से पहले,उस कानून की

कलम टूट जाती है।

अब बहुत हुई कलमबाजी,

क्यूँ ना आज मैं और आप मिलकर

हम बन जाते हैं।

और एक मुहिम उठाते हैं।

 बेटी ना मेरी,ना आपकी हो

  बेटी सिर्फ हमारी हो।

और आजादी के इस जश्न  में

आजाद करो उसे भी इन जिंदानो से,

कुछ छोटी बड़ी परवाज़ उसे खुद ही

   भरने दो।

यूँ तो पिंजड़ों में भी रख कर

  महफूज़ ना रख सके उसको,

तो आज खुद ही कुछ फैसले

  लेने दो उसको।

रंग उड़ानों के उसे भी भरने दो।

और कर दो हौसलें बुलंद इस कदर

   उसके,की नज़र उठने से पहले,

हर गुनाहगार अंजाम ये सौ बार ,सोचे,

  और ये याद रखे हमेशा,

की ये आजाद हिंदुस्तान है।


अर्चना पंत (आर्ची)

स्वरचित

लखनऊ,उत्तर प्रदेश









9. आजादी के असली मायने


         अंग्रेजी फिरंगीओं से हम आजाद तो जरूर हो गये है, बड़े हर्ष से मनाते हैं आजादी का यह स्वतंत्रता-दिवस  पर आजादी के असली मायने में हम अभी अधूरे हैं, हम हजारों साल गुलामी की बेड़ियों से आजाद जरूर हुए हैं ,पर असली आजादी के मायने में हम अभी भी अधूरे है , आज भी इस देश में बेरोजगारी , भृष्टाचार, जाने अनेकों समस्या से जूझ रहे हैं,

अन्न पैदा करने वाला किसान खुद भूखा रहा कर खुद आत्महत्या करता है , इसका आजद होना बाकी हैं ,माँ-बहन और बेटियों का रोज-रोज होता बलात्कार-अत्याचार से आजाद होने बाकी है , गर्भ में मरती बेटियां को भी आजादी दिलानी हैं, दहेज में जाति बेटियां को भी आजाद होने बाकी हैं, आजाद हम जरूर हुए है ,पर असली मायने में आजादी हमारी अभी भी अधूरी है, जाती-भाषा-क्षेत्रीयता के बंधन से भी आजादी बाकी हैं ,

       हम मानसिकता से भी आजादी जरूरी है क्योकि जात-पांत की गुलामी में ही जी रहे हैं ,

तभी तो रोज- रोज के दंगा-फसाद हो रहे हैं,

 अभी भी असली मायने में हम आज भी गुलामी की बेड़ियों में आज भी जकड़े हुए हैं।


चेतन दास वैष्णव

 गामड़ी नारायण







10. ?????


हमारे देश के आजाद होने के साथ ही हम आजाद देश के आजाद नागरिक कहलाते हैं । संवैधानिक रूप से हमें हर प्रकार की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।स्वतंत्रता केवल शारीरिक स्वतंत्रता से ही संबंधित नहीं है अपितु  मानसिक स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्रता, शिक्षा की स्वतंत्रता क्रियाकलापों की स्वतंत्रता, नौकरी की स्वतंत्रता अर्थात प्रत्येक क्षेत्र की स्वतंत्रता से संबंधित है। परंतु कई वर्ग तथा समाज ने अभी भी व्यक्तियों को पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ रखा है

समाज में गरीब और पूंजीपति के मध्य जो वर्ग भेद देखने को मिलता है पूंजीपति वर्ग जिस प्रकार गरीबों का शोषण करते हैं, दिन रात उन्हें अपनी इच्छा अनुसार कार्य करवाते हैं। राजनीति के ठेकेदार जिस प्रकार कमजोर व निर्बल व्यक्तियों को अपने अनुसार कार्य करवाते हैं उनका शोषण करते हैं । धर्म के नाम पर निम्न वर्ग के साथ छुआछूत, भेदभाव करते हैं उन पर धर्म के नाम पर बनाए गए नियमों को जबरदस्ती थोपते है क्या यही सब आजादी के मायने हैं ?

जातिवाद ने जिस तरह से जाति के नाम पर समाज को बंधन में जकड़ रखा है व्यक्ति चाह कर  भी इस बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। आज भी ग्रामीण तथा अनेक क्षेत्रों में इस प्रकार की पराधीनता देखने को मिलती है कि व्यक्ति चाह कर भी अपने अनुसार कार्य नहीं कर सकता, किसी दूसरी जाति से संबंध स्थापित नहीं कर सकता अगर कोई व्यक्ति स्वतंत्र होकर कोई निर्णय लेता है तो समाज के ठेकेदार उसे अपने समाज से निष्कासित कर देते हैं या उसे कठोर दंड दिया जाता है।

जिस प्रकार लड़कियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हो रही है, लड़कियां आजाद होकर नहीं घूम सकती हर समय मन में एक डर रहता है कि कहीं कुछ गलत ना हो जाएं। 

जिस दिन अमीर गरीब और जाति,वर्ग का भेद मिट जाएगा सभी एक समान होंगे तथा बेटियां सुरक्षित होगी तभी हम असली मायने में आजाद कहलाएंगे।


प्रेमलता चौधरी

फालना, पाली ( राजस्थान)






11. मेरे लिए आज़ाद देश की छवि


आप सभी को स्वतंत्रता और आज़ाद दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, लेकिन क्या आपको लगता है कि हम वास्तव में आज़ाद हैं? क्योंकि मुझे ऐसा नहीं लगता| मुझे लगता है कि हम अंग्रेज़ों की गिरफ्त से आज़ाद होकर भी आज भी गुलाम हैं|

स्वतंत्रता के मायने आज भी सभी के लिए अलग-अलग हैं|  आज भी इस देश में आज़ादी का फायदा सिर्फ और सिर्फ समर्थ लोगों को ही है| ये वो लोग हैं जो पूंजीपति या फिर कोई प्रतिष्ठित अधिकारी हैं| ये लोग सत्ता और पैसों में चूर होकर आज भी गरीबों का सिर्फ शोषण करते हैं|

आज भी देश की बेटियां आज़ादी से कहीं घूम नहीं सकती क्योंकि वो आज भी आज़ाद नहीं हैं रीती-रिवाजों और इस समाज के नियमों से, पढ़-लिख कर वो चाहे कितने बड़े पद पर कार्यरत हो जाएँ लेकिन आज भी वो सुरक्षित नहीं हैं|

*मेरे लिए आज़ादी के मायने* - जिस दिन गरीब फुटपाथ पर सोने को और किसान सिर पर हाथ रख कर रोने को मजबूर नहीं होगा और इस देश की बेटियां महफूज होंगी, वही असली आज़ादी होगी| 

“आज़ादी के सिर्फ इतने से मायने हैं,

सभी समान हो यही स्वतंत्र आईने हैं|”

जय हिन्द, जय भारत!


मीना सिंह “मीन” नई दिल्ली









12. आजादी के असली मायने


आजादी जिम्मेदारियों के साथ आती है । कर्त्तव्य पथ पर बढ़ना सीखाती है । जब जब आज़ादी के साथ अधिकार माँगें गएं है , मुश्किलें वहीं खड़ी हुई है । सही वक्त पर सही तरीके से अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाएं , सुकुन के साथ हर्ष और आजादी का अहसास करें ! वाकई मुकम्मल खुशी देती है । अपने कर्तव्य और दायित्व निभानें में जो आनंद है , वही मनुष्य और मनुष्यता की पहचान है । फिर अधिकार एक एक कर आपकी झोली में आते  जाते हैं । 


                 फिर खुली हवा में आजादी का जो अहसास होता है , आहा उसके आनंद की सीमा नहीं है । मेरी नज़र में यही असली आज़ादी है । जिम्मेदारियों की आजादी ।


प्रतिभा प्रसाद कुमकुम

      दिनांक  16.8.2020.....









13. आजादी के असली मायने !

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सैकड़ों वर्षो की गुलामी के बाद हमारा देश स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन में असंख्य शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान किया है । देश आजाद हो जाने के बाद यहां के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र हवा में सांस लेने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। हमारे संविधान में मूलभूत अधिकारों के द्वारा स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया गया।

         कुछ लोगों ने आजादी का गलत अर्थ निकाला ।वह हर मामले में स्वच्छंदता चाहते हैं। हमारी आजादी से किसी दूसरे व्यक्ति को कोई परेशानी नहीं होना चाहिए। आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी बातें करने का बौद्धिक चलन हो गया है । आजादी की अपनी सीमा रेखाएं होती हैं ।हमें अपने कर्तव्यों का भी श्रद्धा पूर्वक निर्वहन करना चाहिए । हमारे किसी भी काम या व्यवहार से दूसरे की आजादी का हनन नहीं होना चाहिए । एक आजाद देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना जरूरी है । हमारी आजादी देश के नवनिर्माण में सहायक सिद्ध होना चाहिए । हमें देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाकर स्वदेशी आंदोलन में सहभागी बनना है । आजादी का मतलब यही है कि हम अपने मन वचन और कर्म से आजाद देश के प्रति पूरी तरह समर्पित रहें । आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए ।

                   देश के प्रत्येक नागरिकों को आजादी के असली मायने समझने होंगे और संयमित आचरण करना होगा ।

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रमेश चंद्र शर्मा

16 कृष्णा नगर इंदौर

 स्वरचित मौलिक रचना







क्या हम आजाद हैं?


 स्वतंत्रता क्या है असली ... आजादी के मायने उससे पूछिए जिसने गुलामी की हवा में सांस ली हो,जिसने किसी भी तरह की गुलामी झेली हो ,वह गुलामी चाहे विचारों की ,चाहे सरहदों की |गुलामी शब्द ही अपने आप में एक जहर की तरह है |कितना अच्छा लगता है ,जब पक्षी खुले आकाश में विचरण करते हैं |जब  अच्छी न्याय व्यवस्था में हम जीवन यापन करते हैं , जहाँ हमें बोलने की आजादी हो  ,जहाँ लड़कियों को अपने ढंग से जीने के आजादी हो | हम सौभाग्शाली है की हमने आजाद भारत में जन्म लिया है |हमें इस कीमती आजादी के मायने को समझना होगा |

                लेकिन क्या ये सच है कि ७४ साल बाद भी हम आजादी के मायने को समझ रहे हैं | हम भौतिक रूप से तो आजाद हो गए पर हमें मानसिक रूप से कौन आजाद कराएगा | अज्जादी के मायने तभी  साबित होंगे ,जब एक लड़की को अँधेरा ढलते ही डर नहीं लगेगा ,जब लड़के और लड़की  को दूध का बराबर गिलास मिलेगा , जब वृद्धाश्रम बनाने नहीं पड़ेंगे , जब एक छोटे  गरीब बच्चे के हाथ किसी होटल में जूठे बर्तन धुलने की बजाय हाथों में पुस्तक पकड़ेंगे ,जब सरकारी नौकरी में आरक्षण नही होगा |सभी अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ेंगे |ऐसे ही भारत की कल्पना की थी ,महात्मा गांधी और शास्त्री जी ने |


                                  तो चलिए ऐसे ही भारत का सपना साकार किया जाय |७४ साल का भारत अब थोदा बूढा हो चला है ,जरूरत है अब उसे आज कल के नव चेतना ,नई पीढ़ी और नए विचारों की जो भारत का हाथ पकड़कर फिर उसके अन्दर आजादी  के असली मायने को भर दे |आज के बच्चे ही कल के युवा भारत का भविष्य है |जिन्हें ऐसी शिक्षा की जरूरत है जिसमें नैतिक मूल्य,आचार विचार ,सम्मान और एकरूपता हो |यही आजादी के असली मायने होंगे, जिसे भारत के सपूतों ने अपने खून से सींचा है |तब सिर्फ हम ही  नहीं कहेंगे कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा " बल्कि पूरा विश्व बोलेगा ----:सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान तुम्हारा ||


प्रांजल चित्रवंशी 

Student of 9th std 

Omkar International School 

Mumbai





15. आजादी का वास्तविक अर्थ


     आजादी या स्वतंत्रता का अर्थ स्व के अधीन या स्व के तंत्र अर्थात् आत्मानुशासन में रहना । एक मकड़ी भी स्वनिर्मित जाले में रहकर ही स्वतंत्रता का अनुभव करती है । इस सृष्टि में पूर्ण स्वतंत्र कोई नहीं है सिवाय ईश्वर के । आजादी का अर्थ मुक्ति या मोक्ष भी है जो सनातन धर्म मे जीवन का परम लक्ष्य माना गया है ।

     भारत को राजनैतिक व भौगोलिक आजादी तो मिली है परन्तु देखा जाये तो हम अभी भी भाषा, संस्कृति, शिक्षा आदि की दृष्टि से परतंत्र हैं । अंग्रेजी शिक्षा पद्धति व पाश्चात्य 'कल्चर' की मानसिक गुलामी से ग्रसित हैं ।हम सब जाति, पंथ, मजहब, व पार्टी को ही सर्वोपरि मान लेते हैं । आज महिलायें भी सुरक्षित नहीं हैं । लोकतंत्र और आजादी की परिभाषा विकृत हो गई है ।

     यदि इस आजादी को बचाना है तो हमें देश के संविधान,कानून,न्यायपालिका,संसद और राष्ट्र ध्वज का सम्मान करना ही पड़ेगा। सबसे बड़ी बात स्वदेशी का भाव जागृत करके बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय कार्य करना होगा । अपनी भाषा,संस्कृति, परम्परा व इतिहास को महत्व देना होगा। स्वदेशी से ही राष्ट्र का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित है, तभी आजादी का असली रूप चरितार्थ हो पायेगा । अंत मे कहना चाहूँगा कि -

'' सच्चे अर्थों में आजादी , स्वदेशी से आयेगा ।

आत्मनिर्भर भारत होगा , विश्वगुरु कहलायेगा।। 

 लीलाधर  कुम्हार

 बलौदा बाजार (छ. ग.)








16. आजादी के सही मायने


          15 अगस्त सन्1947 से पहले हम भारतीय दो सौ वर्षों तक ब्रिटिश शासन के गुलाम रहे और आजादी के लिए तड़प रहे थे।धीरे धीरे आजादी की लड़ाई में बहुत सी कुर्बानियों, बलिदानों,क्रान्तियों, संग्रामों औरअत्याचारों को सहन करने के बाद  हम भारत वासियों  ने अंततः अंग्रेजों को देश से खदेड़ दिया।और 15 अगस्त सन् 1947 को भारत को एक स्वत॔त्र देश घोषित कर दिया।परंतु विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या हम पहले गुलाम थे? तो मैं ये कहूंगी किअंग्रेजों ने हमारे देश की धरती,हमारे तन और शासन को बनाया न कि हमारे मन को। हमारा मन हमारे नियंत्रण में था इसीलिए शायद हम अंग्रेजों को भगा ने में सफल हो पाए। अब दूसरा प्रश्न--- कि क्या वास्तव में हम आजाद हैं? तो मैं कहना चाहूंगी कि हम आजादी  आजादी का गीत गाते गातेइतने आजाद  और स्वच्छ॔द हो गए कि अपने मन को,इंद्रियों , मानसिक सोच और जीवनशैली पर से नियंत्रण खो बैठे और इन्हें भी आजाद कर दिया। यही कारण है कि आज देश मेंबहुत सी बुराइयाँ --रेप,भ्रष्टाचार,धार्मिक षड्यंत्र,और राजनैतिक घोटाले  आदिद्रौपदी के चीर की भाँति बढ़ती जारही हैं।किसी का भी न आत्मनियंत्रण है और न व्यवस्था का।

तो  सरल शब्दों में कहें तो सही मायने में आजादी के मायने हैं आत्मनियंत्रण रखते हुए देश और समाज के हितों को  ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रतापूर्वक जीना। तभी प्रजातंत्र भी वास्तव में सफल होगा और शहीदों की आत्मा को भी शांति मिलेगी।


  सुधा बसोर

 गाजियाबाद








17. आर्टिकल 19 केअन्तर्गत


आजा़दी यानि की आजाद होना

अब प्रश्न यह है कि किससे आजा़द होना है...?

आजा़दी का मतलब क्या है.?

इसको समझने के लिए दूसरा शब्द है स्वतन्त्रता। 

स्व+तन्त्र+ता और इसका शाब्दिक अर्थ हुआ अपने तन्त्र से बन्धन मुक्त होना।लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो इस तरह की स्वतन्त्रता तो स्वच्छन्दता में बदल जायेगी।

इसीलिए आजा़दी के बाद हमारे संविधान ने अपने नागरिकों को अनुच्छेद 14 से 35 तक कुछ अधिकार दिए हैं जिनमें समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, संस्कृति और शिक्षा का अधिकार और संवैधानिक उपचार के अधिकार प्रदान किए हैं।

इनमें से मुख्य है आर्टिकल19 जिसमें विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में बताया गया है विचारों का प्रकटीकरण, प्रेस की स्वतंत्रता,विज्ञापन की,मतदाता सूचना अधिकार,चुप रहना,सूचना समाचार जानना,विदेश गमन और प्रदर्शन धरना आदि लेकिन ये स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबन्धों के साथ दी गई है।

       लेकिन वर्तमान में हमें और भी बहुत चीजों से आजाद होना है।ज़हनी गुलामी से और आत्महीनता की स्थिति से।

 हमें आजादी चाहिए समाज में फैले भ्रष्टाचार से,प्रशासन में जड़ जमाते रिश्वतखोरी से,गरीबी से,साम्प्रदायिकता और उग्रता से,महिलाओं को खौफ से,युवाओं को बेरोजगारी से,बच्चों को बस्ते के बोझ से।


निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपने सर्वांगीण विकास के लिए  मिलने वाले अधिकार और उनका प्रयोग बिना किसी बाधा के लेकिन साथ ही उसे भी यह ध्यान रखना होगा कि वह किसी और की आजादी में अवरोध तो पैदा नहीं कर रहा। धन्यवाद।।,🙏🙏


प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"

16/08/2020







18. आज़ाद 


यूँ तो भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद हुए 74 वर्ष हो गए।

इस आज़ादी का मूल मंत्र था अंग्रेजों के बेबुनियाद नियम, कायदों से छुटकारा, उनके द्वारा किए गए ज़ुर्म से छुटकारा और सबसे महत्वपूर्ण थी एकता। कितना विद्रोह हुआ, कितनी जानें गयीं इस आजादी के लिए। कितने वीरों ने अपने देश के लिए अपनी जान की क़ुर्बानी दी, लेकिन क्या इस दिन के लिए कि हम सब अपने कर्तव्यों से, अपनी इंसानियत से आज़ाद हो जाएँ?

हम सब आधुनिकता के दौर में इतने खो गए हैं कि ना तो हमें अपनों की चिंता है और ना इंसानियत बाकी है। बहुत अच्छा है कि हम ज़माने के साथ बदलें और निरंतर आगे बढ़ें लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति यहाँ तक कि इंसानियत से भी मुँह मोड़ लें।

एक ज़माना वह भी था, जब अगर एक घर में आग लगी है तो पूरे गाँव में मातम छाया रहता था और एक ज़माना यह है कि कोई मरता है तो मर जाए हमारा क्या जा रहा है।

कहते हैं विचार में स्वतंत्रता लाइए लेकिन हम खुद सोचें कि कितनी स्वतंत्रता आ पाई। एक नज़र से देखा जाए तो बिल्कुल नहीं। हम दिखावे में इतने चूर हो चुके हैं कि कुछ नज़र नहीं आता।

एक तरह से देखा जाए तो हम सब आज भी अंग्रेज़ों के ग़ुलाम हैं। जिस चीज़ का चलन उनके देश में है वही हम अपनाने की सोचते हैं, उनके विचारों को श्रेष्ठ मानते हैं। यहाँ तक कि अब तो अपनी राष्ट्रभाषा बोलने में भी हिचकिचाते हैं।अंग्रेजी इतनी महत्वपूर्ण हो चुकी है, जितनी हिंदी नहीं है। आजकल के बच्चे हिंदी की गिनती तक नहीं जानते। मैं पूछती हूँ क्यों? ऐसी क्या कमी है हमारे देश में? अरे! हमारा देश तो सभ्यता संस्कृति का प्रतीक है। ऐसा देश पूरी दुनिया में नहीं है जहाँ कई रंग-रूप, वेशभूषा, बोली, त्यौहार अलग-अलग हैं पर फिर भी एकता का प्रतीक है। 

फिर क्यों हम स्वतंत्रता के मायने बदल रहे हैं? क्यों अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाईचारे से स्वतंत्र होते जा हैं?

सब के प्रति दयाभाव, उदारता, प्रेम, स्नेह रखें जिसकी पहचान है यह मातृभूमि।

विचारों में स्वतंत्रता लायें, अपने कर्तव्य से विमुख ना हो। धन्यवाद।


शिल्पी शहडोली

शहडोल,मध्यप्रदेश।


19. आजादी के असली मायनों  से भटकाव


लाखों लोगों की शहादत एवं लगभग सौ वर्षों के विरोध के बाद देश को आजादी मिली है, देश की आजादी के लिए कई लोगों ने 18 वर्ष की उम्र में तो कई 21वर्ष की आयु में हंसते हंसते अपने प्राणों की आहुति दी है , उस काल खण्ड मे प्रत्येक नागरिक ने देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी सहभागिता दी । क्या ये स्वतंत्र वीरों ने वर्तमान में जो भारत है एक ऐसे ही देश की कल्पना में अपने प्राणों की आहुति दी है , नही,  मुझे ऐसा नही लगता उन लोगों के सपनों के भारत में राम राज्य की परिकल्पना रही होगी जहाँ पर लोगों के बीच न जातिवाद हो न कोई लिंग भेद हो न अमीरी गरीबी का कोई फर्क हो और न ही किसी के प्रति अन्याय हो, और न ही किसी के जीवन में कोई दुख दर्द हो, सब एक दुसरे से मिलकर बड़े प्यार से इस जीवन को रोज एक उत्सव जैसा उत्साह एवं उल्लास के साथ जी सकें तथा एक राजा को राज्य की प्रत्येक जनता के प्रति अपने कर्तव्य का भाव हो और वो अपना पूरा जीवन राज्य और अपनी जनता की भलाई के लिए समर्पित कर दे और जनता को भी अपने कर्तव्यों का सदा बोध हो और सारी मेहनत अपने राज्य की बेहतरी में लगाए ।

पर क्या यह देश उन अमर शहीदों के सपनों का देश बन सका है, जिसके सपने उन्होंने देखे थे और आगे आने वाली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने जान की परवाह किए बिना एक आजाद देश की कल्पना में हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये थे, विचार करिये कि ऐसे महान पूर्वजों की सन्तान है हम जिन्होंने अपने जीवन के बदले में देश की स्वाधीनता को चुना ।

पन्द्रह अगस्त सन् 1947 को हमें अंग्रेजों से आजादी मिली पर जैसे ही देश को आजादी मिली, देश से अंग्रेज तो चले गये पर उस वक्त के उच्च वर्ग में अंग्रेजी सभ्यता हावी हो गई, और जो नेता अंग्रेजी सभ्यता में घुले मिले थे उन्हें देश की बागडोर सम्हालने के लिए  अधिक उपयुक्त समझा गया उसके बाद इस देश में अंग्रेज़ी सभ्यता का अंधानुकरण आरम्भ हो गया जो आज तक जारी है , इसके कारण हमारी मातृभाषा हिन्दी एवं हमारी संस्कृति का विकास नहीं हो पाया। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि स्वतंत्रता मिलने के बाद देश की बागडोर पं नेहरू के हाथ में  सौंप दी गई और आजाद भारत में उनका पहला भाषण अंग्रेज़ी में था । उसके बाद हम क्षेत्रवाद, भाषावाद, संप्रदायवाद जातिवाद, में बंटते चले गये , जिससे इस देश का विकास  उतना नहीं हो पाया जितना अपेक्षित था , उसके बाद हमारे नेताओं में सत्ता लोलुपता हावी हो गयी जिसके कारण हमारे देश में जो भी योजनाएं लाई गई उनमें वोट बैंक  की राजनीति  हावी हो गई और एक विशेष वर्ग, तो कभी विशेष क्षेत्र तो कभी विशेष जाति के वोट हथियाने के लिए योजनाएं बनती चली गई , जो आज भी जारी है । वर्तमान में देश की राजनीतिक हालात और भी चिंता जनक है जैसे हमारे देश के नेता भ्रष्ट हैं वैसी देश की जनता हो गई है, चारों ओर भ्रष्टाचार छाया हुआ है किसी को देश की चिन्ता नही है आज देश में जो भी योजनाएं बनती है उसके पीछे अपने वोट के नफा नुकसान को देखकर बनाई जाती है ताकि सालों तक वो सत्ता में बने रहें । आज जैसा राजा वैसी प्रजा हो गई है, देश की जनता को भी अपने वोट बेचने की आदत हो गई है और बगैर मेहनत के फोकट में सब कुछ हासिल करने की मानसिकता हावी है , देश के ज्यादातर लोग सिद्धान्तहीन और असंस्कारिक हो गये हैं, इसलिए मेरे विचार में तो हम अपनी आजादी के असली उद्देश्य से भटक गये हैं ।

अनिल कुमार मिश्रा








20. ?????


सर्वप्रथम सभी को स्वतंत्रता दिवस की कोटिशः शुभकामनाएं।

हम सभी ने कल ही आजादी की 74 वीं वर्षगांठ मनाई है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। भारत को लोकतांत्रिक बनाने और अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए हमारे देश के वीर सपूतों ने मातृभूमि को अपने लहू से सींचा है तब जाकर हम आजाद हवा में सांस ले पाये हैं। लेकिन आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम मानसिक रूप से गुलाम रह गए हैं। आज भी देश में असमानता, जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग, वर्ग, भाषा आदि की विसंगतियां व्यापक रूप से विस्तार पा रही है। इन बुराईयों को दूर करने के लिए हमें भारतीयता का संकल्प लेकर "वसुधैव - कुटुम्बकम" का मंत्र अपनाना होगा। जैसे परिवार में भिन्न-भिन्न प्रकृति के व्यक्ति होने पर भी हम उनसे प्रेम व सौहार्द रखते हैं ठीक उसी तरह पूरी पृथ्वी को हम अपना परिवार समझेंगे तो निश्चित ही बहुत सारी बुराईयों पर विजय प्राप्त कर सकेंगे। दूसरी बात है कि हमारा देश बहुत सम्पन्न नहीं है क्योंकि भारत में निम्न श्रेणी का बहुत शोषण होता है अतः गरीब और गरीब हो रहा है। देश के पिछड़े शोषित वर्गों की मदद करके उनको मुस्कान देकर ही असली आजादी का अह्सास करा सकते हैं। भारत का प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य समझ कर देश हित के लिए योगदान करे। आज हम भाषा, वस्तु सभ्यता सभी विदेशियों का अपनाकर शनैः-शनैः गुलाम हो रहे हैं। मोदी जी के स्वदेशी संकल्प को अपनाकर पुनः स्वयं को व देश को आर्थिक रूप से सशक्त कर सकते हैं इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा सभी को रोजगार मिलेगा व लोगों में उद्यमिता की लहर दौड़ेगी और भारत में फिर से खुशहाली आयेगी। असली मायने में आजादी सार्थक होगी। 🙏

धन्यवाद।

लेखिका

अर्चना बामनगया

ग्वालियर मध्य प्रदेश







21. विचित्र आजादी


  सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा, बहुत सुंदर वाक्य, सुनकर मन, खुशी से झूम जाता है। पूरा विश्व भी इस बात का समर्थन करता है कि भारत जैसा देश, दूसरा कोई नहीं। कितनी विविधताओं के होते हुए भी एकजुटता के भाव में संगठित रहना, सबसे बड़ी विशेषता है। भाषाएं अनेक, पहनावा अनेक,  प्रथा अनेक लेकिन सबके मन में भाव एक, अति सुंदर,अद्वितीय प्रेम।

   मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, सही फ़रमाया,  यही कारण था, जिससे विदेशियों ने भारत से बहुत कुछ लूटा, प्यार में,  जिससे हमने परतंत्रता के दिन देखे। कितने वीरों ने आजादी के लिए प्राण न्योछावर किए और अभी भी प्राण न्योछावर करते रहते हैं। उन वीरों को हमेशा याद रखना चाहिए।

 नमन देश के वीरों को, आजादी दिला,

 देश की सुरक्षा में,      अमर हो गए ।

  आजादी के बाद भी, देश में अपार धन, संपदा है। अब बाहर से ज्यादा, देश की आंतरिक व्यवस्था से खतरा है। लगभग अधिकांश क्षेत्रों में भ्रष्टाचार बहुत पहले से व्याप्त हो चुका है, कहा जा रहा है, भ्रष्टाचार ख़त्म हो रहा है, कंप्यूटर पर ऑनलाइन जमाना आ रहा है। एक मानव अकेला पूरे तंत्र को सही दिशा दिखाने की कोशिश करे, और उसको साथ ना मिले तो तंत्र कैसे सही होगा।

  7 मई को अवकाश प्राप्त हो रहे, उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपक गुप्ता ने स्वीकारा कि 'देश का कानून और न्याय तंत्र, चंद अमीरों और ताकतवर लोगों की मुट्ठी में कैद है। 

   भारत देश, किसानो और मजदूरों, का देश है। हम देख सकते है कि दोनों की स्थिति दयनीय है। जो दूसरों का पेट भरते है, खुद खाली पेट सोते है। बहुत सारे दावे किए जाते है कि हम इनके लिए योजनाएं ला रहे है।  जो योजना आती है, उस पर ताकतवर लोग अपने मनमाने तरीक़े से भ्रष्टाचार कर, लाभ लेने नहीं देते। महामारी काल में देखा जा चुका है, फसे लोगो को सुविधा उपलब्ध कराने हेतु आए धन को सही तरीके से खर्च नहीं किया गया। इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है। प्रवासी मजदूरों की  दयनीय स्थिति को देख, भारत पूछता है कि चूक कहां हुई। आजादी के असली मायने क्या हैं।

चिकित्सक, आज के भगवान कहे जाने वाले, लालच में पडकर न जाने क्या क्या गलत कार्य कर रहे हैं, शरीर के अंगो का व्यापार करते हैं।  देश का सबसे अहम हिस्सा, रक्षा क्षेत्र ,जब सुना जाता है कि जवान शिक़ायत करता है कि उसको भरपेट भोजन सही मात्रा के साथ नहीं मिल पाता। शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति और भ्रष्टाचार की सीमा परेय है। अध्यापकों को अनगिनत कार्यों में लगाकर,  मुख्य कार्य करने नहीं दिया जाता। 

   जब तक देश में सबसे बड़े भिखारी (रिश्वतखोर), सुविधा शुल्क लेना बंद नहीं कर देते, तब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो सकता। पाप को अंत करने के लिए पापी का अंत भी जरूरी है आजकल। देश कितना खुश था, जब बलात्कारियों का एनकाऊंटर हुआ। ऐसे नमूनो से सबक मिलता है, गलत कार्य करने की हिम्मत नहीं होती। ऐसे उदाहरण मिलते रहे, तो काफ़ी सुधार हो सकता है। सभी जन को अपने विचार प्रकट करने की आजादी है, बशर्ते देश हित में हो।

जय भारत, जय जवान, जय किसान।


ऋषि कुमार दीक्षित

एटा, उत्तर प्रदेश






22. क्या है आजादी


   आजादी का मतलब ये कदापि नहीं कि हम जो करें चाहे सही हो या गलत,हमें करने का हक है,न ही आजादी का मतलब कुछ भी बोलना किसी का भी अपमान करना है।

      आजादी के असली मायने तब है जब हम अनुशासन में रहकर किसी की भावनाओं या किसी के सम्मान को ठेस पहुँचाये वगैर अपनी इच्छा से कार्य सम्पन्न करें या अपने विचारों का आदान प्रदान करें।"बचपन में लेखक प्रताप नारायण मिश्र का लेख पढ़ा था ,उसमें एक व्यक्ति डंडा घुमाता सड़क पर जा रहा था,लेखक के वह डंडा बालबाल लगने से बचातो लेखक ने उस व्यक्ति को टोका तो वह व्यक्ति आजादी का नाम लेकर लड़ने पर उतारू हो गया,तो लेखक ने कहा,आपकी आजादी वहीं तक है जहाँ तक आआपकी नाक की सीध है,अर्थात हम वही काम करें जो दूसरे को आहत करें बिना अपना कार्य सिद्ध करे।"

      असली आजादी के मायने अपने हित की रक्षा करना है,न की दूसरे के हितों का हनन,आजादी अनुशासन में रहते हुए अपनी इच्छा पूर्ति करना है न की अपनी इच्छाओं को जबरन दूसरे पर थोपना,आजादी ससम्मान अपने विचारों की अभिव्यक्ति है न कि दूसरे के सम्मान को ठेस पहुँचाना,आजादी अपने हक़ के लिए लड़ना है न कि सामने वाले के हक को छीनना,आजादी कर्तव्य  पूर्ति करना है न कि अपने पद का फायदा उठाकर दूसरे की कमजोरी का फायदा उठाकर अपने कर्तव्य दूसरों पर थोपना।

      आजादी सही मायने में अपने हितों की रक्षा करते हुए अपनी नैतिक,सामाजिक,राष्ट्रीय और पारिवारिक कर्तव्यों का पूर्ण निर्वहन ही है।         

जय हिन्द

गीतांजली वार्ष्णेय

            बरेली,उ.प्रदेश








23. आओ आजादी अनुभव करें।



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             15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजी दासता से मुक्त हुआ और 1000 वर्षों से अधिक लंबे गुलामी के कालखंड के बाद आधुनिक युग में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ।

‘स्वतंत्रता’ या ‘आजादी’ हमारे लिए पवित्र शब्द हैं; हम भारत के नागरिक खुद को आजाद कह सकते हैं तो यह हमारे देश के ज्ञात और अज्ञात लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के त्याग और बलिदान का परिणाम है।

आज 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए हम उन सभी वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद कर उन्हें नमन करें और इस आजादी को बरकरार रखने में और देश के विकास में योगदान करने की अपनी जिम्मेदारी को समझें।

स्वतंत्रता दिवस उत्सव है लोकतंत्र को मनाने का, इस आजादी को और हमें प्राप्त अधिकारों को मनाने का, लेकिन हम अधिकारों के साथ-साथ संविधान में उल्लेखित कर्तव्यों को भी याद रखें यह हमारी जिम्मेदारी है।


"युवाओं की भागीदारी से बनेगी बात"


भारत के आजादी के इस 74 वर्षों के इस कालखंड में झांकें, तो लगता है कि हम कई क्षेत्रों में आगे तो बढ़े हैं लेकिन अभी भी कई मूलभूत विषयों पर ध्यान बहुत कम दिया गया है। आज भी हम गरीबी, अशिक्षा, महिला हिंसा, जातिगत वैमनस्य जैसी कई सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं।

देश की स्वतंत्रता को उत्सव रूप में मनाते हुए हमें व्यापक परिवर्तन के लिए समाज का मन तैयार करना चाहिए। इसमें सरकारों की बड़ी भूमिका है लेकिन व्यापक और स्थाई परिवर्तन अकेले सरकारों से संभव नहीं होते, उसमें संपूर्ण समाज की भागीदारी जरूरी है खासकर युवाओं की।

हम 1947 में आजाद हो गए थे, किन्तु मानसिक रूप से आज भी हम कई मायनों में गुलाम रह गए हैं। हम ऐसे गुलाम बने हुए हैं जो अपने प्रति हीन-भावना से ग्रसित हैं; जिन्हें इस देश की प्रत्येक वस्तु कमतर लगती है और विदेशी वस्तुएं श्रेष्ठ; जिनमें अपने देश और समाज के प्रति गौरव का भाव नगण्य है।

मोहन चन्द्र जोशी




24. आजादी के असली मायने: जियो और जीने दो"



कितना अच्छा लगता है एक हिरण को स्वच्छंद कुलांचे भरने में !


एक पंछी को आकाश में उन्मुक्त विचरण करने में ! 


उसके परों का अस्तित्व तो उत्तुंग उड़ान में ही है । भारतवर्ष की आजादी भारतवासियों के लिए एक स्वप्न के पूर्ण होने जैसा था । आज यदि हम आजादी की सच्ची परिभाषा को अभिव्यक्त करने का प्रयास करें तो हम देखते हैं कि भारत ने इतने वर्षों में साक्षरता, विज्ञान और तकनीकी और अन्य विभिन्न क्षेत्रों में भी विश्व में अपना परचम लहराया है इसमें दो राय नहीं ।  परंतु जब तक हमारा समाज पूर्ण रूप से कुरीतियों, अंधविश्वासों,जातिवाद संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णता में जीता रहेगा तब तक यह आजादी वास्तविक आजादी नहीं कही जा सकती । साथ ही आज हमारे देश की आबादी की बहुत बड़ी संख्या भूखे पेट सोने को भी विवश है । गरीबी और कुपोषण को दूर करना अत्यंत आवश्यक है । समाजवादी समाज की स्थापना तभी हो सकती है जब अमीर और गरीब के बीच की बहुत बड़ी खाई को पाटा जाए।  जिस देश की जनता के पास रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद हो उसे अपने आजादी का असली स्वरूप प्राप्त करने के लिए इन समस्याओं को समूल निराकृत करना होगा । स्त्री-पुरुष के भेदभाव को भी समूल समाप्त करना होगा । यह अत्यंत  दुर्भाग्य का विषय है कि आजादी के 73 साल बाद भी हम अपनी मानसिकता के ही गुलाम बने हुए हैं । सच्ची आजादी आंतरिक स्वतंत्रता में भी है "जियो और जीने दो" के सिद्धांत का पालन करके  ईर्ष्या द्वेष, वैमनस्यता, किसी के बनते कार्य में विघ्न डालना जैसी वैयक्तिक बुराइयों को अपने अंतर्मन से निकाल कर एक दूसरे के विकास में सच्चे सहायक बनने से ही देश का प्रत्येक नागरिक अपना और अपने देश का विकास और नव निर्माण कर सकता है। 

 

डॉ. दीप्ति गौड़ "दीप"

ग्वालियर, मध्यप्रदेश






25. आज़ादी की मायने




नमस्कार

अंग्रेजों से आजादी तो हमे मिल गई पैर क्या हम सच में आज़ाद हुए है?

मै कहूं कि हम अभी भी गुलाम है अंग्रेजी के,जातियों के,रूढ़ियों के,सड़ी मानसिकता के

अंग्रेजों से तो आज़ादी मिल गई परन्तु हमारे भीतर बैठा ये दुर्गुण हमें कभी आज़ादी नहीं देगा।हमें इतने उम्दा साहित्यकार मिले इतने उच्च कोटि के विचारक मिले है क्या किया हमने उनके विचारों का अनुसरण?

अगर हम उनके विचारों पर अमल करे तो समाज में ये बुराइयां फैली हुई है ये शायद ना हो l

आजादी के असली मायने ये नहीं है कि अपनी सोच को आज़ाद दिखाने का नाटक करते हुए अपने संस्कारों को भुला दिया जाए ।

आजादी का मतलब ये बिलकुल नहीं की अपने माता पिता के प्यार का फायदा उठाया जाए ।आज़ादी जितनी सुन्दर है उसे उतना ही सुन्दर बनाया जा सकता है अपने संस्कारों को संजोए रखिए ये संस्कार ही है जो हमें दूसरों से अलग बनाते है , राम एक ऐसा नाम जिससे शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा वो आज आदर्श माने जाते है लोग रामायण और रामचरित मानस पढ़ने की सलाह देते है यहां तक कि राम कथा सीबीएसई के पाठ्यक्रम में लागू भी है क्यूं ?

क्योंकि राम के आदर्शों को अगर हम अनुकरण करते है तो देश दुनिया में ये रोष जो दिखाई देता है नहीं है होगा ये मेरा मानना है आज़ादी के असली मायने विचारों को आज़ाद करना है अपने संस्कारों से आजादी पाना नहीं ।

धन्यवाद 

सीता तिवारी 

१६/८/२०२०






26. आजादी 


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हम इस साल आजादी का 74 वाँ उत्सव मना रहे हैं। इस आजादी को पाने में जाने  कितने वीर  लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दी। 

जाने कितने लोगों ने फांसी को हंसते-हंसते गले लगा लिया, जाने कितने वीर आजादी की लड़ाई में शहीद हो गए। 

लेकिन क्या हम वास्तव में आजाद हैं। 

क्या है आजादी के सही मायने।

अंग्रेज तो चले गए लेकिन हम आज भी  अंग्रेजी भाषा के गुलाम हैं। हम गुलाम हैं पश्चिमी सभ्यता के। आजादी का सही मतलब है कि हम हर दिशा में आजाद हो। 

लेकिन ऐसा नहीं है भारत देश आज अपनी मातृभाषा को भूल चुका है।हमारा देश अमेरिका के बाद अंग्रेजी बोलने में दूसरे स्थान पर है।  आज पूरे भारत में अंग्रेजी भाषा का बोलबाला है। अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी भाषा नहीं जानता तो उसे बेवकूफ, अनपढ़ बताया जाता है। क्या अपनी मातृभाषा को बोलना गलत बात है। यही गुलामी है हम अंग्रेजी भाषा के गुलाम हैं। 

हम सभी को यह जानना चाहिए कि चीन,  जर्मनी, जापान जैसी विश्व की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देश अब भी अपनी मातृभाषा ही बोलते हैं। वहाँ  के 98% लोग अब भी अपनी ही मात्र भाषा बोलते हैं। उन देशों में सारे राजकीय कार्य अपनी ही मातृभाषा में किए जाते हैं। 

इसीलिए मैं समझती हूं कि हम अब भी अंग्रेजी भाषा की गुलाम हैं। और रही सभ्यता की बात तो हम ही अपनी भारतीय सभ्यता को पीछे छोड़ते चले जा रहे हैं।  हमने अपने पहनावे को बदल लिया, हमने अपने संस्कारों को बदल लिया और पश्चिमी संस्कार और सभ्यता को अपनाते हुए हम उनके गुलाम बनते जा रहे हैं।          आजकल लोग विदेशी सामानो  के गुलाम हो गए हैं। अपने देश में बने हुए कोई भी सामान प्रयोग करना नहीं चाहते। जिससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था और नीचे गिरती जा रही है। अपने ही देश में बने हुए सामानों का प्रयोग करने में उन्हें शर्म आती है। वह समझते हैं कि दूसरे देश में जो सामान बन रहे हैं वह बहुत अच्छे हैं।  हम आजादी का उत्सव  तो मना रहे हैं। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि हम अब भी संपूर्ण रूप से आजाद नहीं हैं।  भारत के कई हिस्सों में नारियों को अब भी पूरी तरह से आजादी प्राप्त नहीं है। इसीलिए हमें इस क्षेत्र में भी कुछ प्रयास करना चाहिए।  हमें चाहिए कि हम अपनी ही मात्र भाषा का प्रयोग हर हिस्से में करें।   देश के किसी भी राज्य में कोई सी भी भाषा बोली जाए लेकिन हमें अपनी मातृभाषा को शिक्षा प्रणाली में एक विशेष स्थान देना चाहिए। हम सभी को चाहिए कि हम अपने देश में बने हुए  सामानों का ही इस्तेमाल करें। उनका प्रचार करें और विदेशी सामानों को त्याग दें  और आत्मनिर्भर बने। हमें चाहिए कि हम अपनी संस्कृति को बढ़ावा दें बच्चों में अपनी भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम उत्पन्न करें। उन्हें समझाएं कि हमारी संस्कृति ही सर्वोच्च है।  इस प्रकार आजादी का सही मायने हमारी सांस्कृति की आजादी, हमारी भाषा की आजादी है। 

  जिस दिन हमारी मातृभाषा,  हमारी संस्कृति पश्च्मि भाषा और संस्कृति से आजाद होगी।  सही मायने में उस दिन ही असली स्वतंत्रता दिवस होगा। 

जय हिंद जय भारत


कामिनी वार्ष्णेय 

अलीगढ़







27 असली आज़ादी 


              अंग्रेजों से गुलामी के बाद देश को आजादी मिली या यों कहें सत्ता का हस्तांतरण हुआ। शासन करने वाले बदल गए। पहले विदेशी शासक थे अब देशी शासक हो गए।

देश अंग्रेजों के कब्जे में था अब भारतीयों के कब्जे में है। नियम कानून सब वही है। भले उसमें कुछ अच्छे भी हैं कुछ बुरे भी। जनता तो आज भी गुलाम है। 

                 कहने को तो हम स्वतंत्र है।लेकिन कैसे ? स्व के अधीन तो कुछ भी नहीं है फिर भी हम स्वतंत्र है। आजादी का मतलब पूर्ण रूप से आजादी। हम जो चाहे कर सकें। हमें बोलने वाला कोई न हो। आजादी के असली मायने हम उसी को कहेंगे जो हम अपनी इच्छानुसार कर सकें।लेकिन हम अपनी इच्छानुसार कुछ नहीं कर सकते हैं। तो हम आजाद हुए कहाँ।जब देश आजाद हुआ तो हमारी मर्जी के बगैर धर्म के नाम पर देश को दो टुकड़ों हिंदुस्तान और पाकिस्तान में भाग कर दिया गया। जनता का तो कुछ नहीं हुआ जनता पहले भी तकलीफ में थी आज भी है।

                    जो सत्ता में रहते हैं अपनी सुख सुविधा का ख्याल रखते हैं। पैसे वाले लोग आज भी पैसे वाले हैं।गरीब आज भी गरीब ही है। वो अपनी मर्जी से एक भी काम नहीं कर पाता है।उसे दूसरे के भरोसे रहना है। कोई काम दे तो करना है नहीं तो भूखे मरना है। उसके पास जमीन नहीं जो वह खेती कर सके। अपने बच्चों को अपनी मर्जी के स्कूल में पढ़ा नहीं सकता।बीवी बच्चों को अच्छे कपड़े दिलवा नहीं सकता।बीमार होने पर अच्छे डॉ को दिखा नहीं सकता। क्योंकि उसके पास पैसा नहीं। किसी के या शासन के मदद के भरोसे है। ऐसे लोगों के लिए आज़ादी के क्या मायने हैं।शासन चाहे किसी का हो। 

                        जो किसान हैं अपनी मर्जी से खेती न कर पाते हो।फसल का उचित दाम न मिल पाता है।अपनी सुविधानुसार बीज पानी खाद न पा सके।रातदिन धूप बारिश ठंठ सहकर खेती करें और वातानुकूलित कमरे में बैठने वाले उनके लिए खाद बीज महंगा करते हैं। तो किसान आज़ाद रहा कहाँ। उसके लिए आजादी गुलामी बराबर ही है।

             अगर देश की बात छोड़ हम परिवार की बात सोचे तो भी हम आजाद नहीं है, परिवार के बंधन में हैं। पति पत्नी के बंधन में है तो पत्नी पति के बंधन में है। दोनों में कोई आज़ाद नहीं है। बच्चे माँ-बाप के बंधन में हैं। परिवार घर के मुखिया के बंधन में है। स्त्रियाँ तो आज भी बंधन में ही हैं। अकेले वो कहीं जा नहीं सकती।अपनी मर्जी के खा नहीं सकती ,पहन नहीं सकती। हर पल डर के साये में रहना पड़ता हो। 

             ऐसे लोगों के लिए आज़ादी कोई मायने नहीं रखती हैं।


दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश"



28. भारतीय आजादी  ? 


        हजारों सपूतों की शहादत के बाद 1947 में हमें अंग्रेजों से, आजादी मिली  ! उस समय देश का माहौल कैसा था,,बाल कवि वैरागी की दो पंक्तियों से पता चल जायेगा-

" जबकि नगाड़ा बज ही गया है, सरहद पर शैतान का  ! 

तो नक्शे पर से नाम मिटा दो, पापी पकिस्तान का  ! "

खैर, भारतीय संविधान बना, लागू हुआ  ! संविधान के अनुसार हमें जो आजादी मिलनी चाहिए थी, वो नहीं मिली  ! 

हमारा संविधान प्रभुत्व सम्पन्न है, भारत की जनता के लिए है  ! हमारा राज्य ( राष्ट्र) समाजवादी पंथनिरपेक्ष है  ! समाजवाद का अर्थ- आर्थिक समानता है  ! राज्य द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जाय, लेकिन आज बेगारी, बेरोजगारी, भुखमरी आदि चरम पर हैं  ! धर्म के आधार पर राज्य तटस्थ है, लेकिन अब भी जबरन धर्मांतरण हो रहे हैं  ! समानता के अधिकार की खुलकर धज्जियां उड रही हैं  ! धर्म और जाति के आधार पर आपको अनेक संघर्ष देखने को मिल जायेंगे  ! प्रथम संविधान संशोधन  (1951) में एस सी, एस टी को सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े होने के कारण राज्य विशेष प्रावधान करे, लेकिन इसका भी पूरा लाभ उनको नहीं मिल रहा  ! 103 वे सं. संशोधन (2019) में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए राज्य विशेष प्रावधान करे लेकिन प्रोफेसर पद पर ओबीसी को मिलने वाला लाभ खत्म कर दिया गया है   ! 

हम कहाँ आजाद हैं  ? हम भी शासन की जंजीरों में जकडे  हुए हैं  ! रोज हत्या, लूट पाट भ्रष्टाचार की खबरें पढने को मिल जाती हैं  ! 

कहना चाहुंगा:- 

बलात्कार भ्रष्टाचार, हत्या और लूटपाट, हरकत जब तक रुक नहीं पायेगी  ! 

खा के भगवान की कसम, आज साफ कह दूँ, बेजान की कलम अब झूक नहीं पायेगी  !! 

           स्वतंत्रता हमारा अधिकार है लेकिन आज कहाँ शान्ति पूर्ण सम्मेलन हो रहे हैं  ! अपराधियों को 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायालय में प्रस्तुत किया जाये! क्या ऐसा हो रहा है  ? पुलिस अपराधी के साथ कैसा बर्बर व्यवहार करतीहै  ! कई बार तो अपराधी की मौत भी हो जाती है  ! क्या यही आजादी है  ? 

आज भी आपने लखीमपुर खीरी का समाचार सुना होगा- नाबालिग से गेंगरेप कर उसकी आंखें निकाल ली गई  ! क्या यही आजादी है  ? अनुच्छेद ५8 में गौ रक्षा का प्रावधान है, लेकिन आज गौमाता की स्थिति क्या है  ? 

आज राधा जी होतीं तो क्या कहती - 

भेड़ बकरिया भैंस ऊंटनी, सबको नजर मैं पाऊँ  ! 

ढूंढे से भी गाय मिले ना, कैसे धरम बचाऊँ  ? 

जहाँ जहाँ डालूं नजर मैं दीखें, वहाँ हरामी रे  ! 

अब तो आ जाओ घनश्याम, देश में आई गुलामी रे  ! 

             आज भी कुछ क्षेत्रों में बेगारी व बंधुआ मजदूर की प्रथा देखी जा सकती है  ! बाल मजदूर दूकानों/ होटलों में काम करते मिल जाऐंगे  ? क्या यही शोषण के विरुद्ध अधिकार है  ? कोरोना काल में भी आज दिनांक तक मेरे कार्यों के कार्मिकों का कोरोना टैस्ट नहीं हो पाया है क्या यही अनुच्छेद ३9( ई) है  ? अनुच्छेद ४३ जीवन निर्वाह मजदूरी आदि का उल्लेख करता है  ! कोरोना काल में बेरोजगार हुए लाखों मजदूरों को मजदूरी मिली  ? इसी को आजादी कहते हैं  ? 

समान नागरिक संहिता केवल गोवा में लागू है, अन्यत्र क्यों नहीं  ? अनुच्छेद ४7 के अनुसार राज्य शराब मुक्त हो, क्या ऐसा है ? 

अंत में यही कहना चाहता हूं कि अभी तक हमें पूरी आजादी नहीं मिल सकी  ! 


जगदीश बेजान व्याख्याता

भरतपुर, राज.








29. असली आजादी के मायने


आजादी का मतलब है स्वछंदता, जहाँ सभी को राष्ट्र के 

बनाएँ नीति नियमन के अनुसार एक समान अधिकार एवं

कर्तव्यों का निर्वहन करना है।पर ज्ञातव्य है कि आज का

 समाज विभिन्न दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है।हम पिंजरे में बंद

पक्षी की तरह हीं फरफराते रहते हैं।जो दिए गए भोजन को

खा लेता है और जो सिखाया जाता है वैसी हीं वाणी बोलने

 पर मजबूर होता है। आजादी का मतलब स्वछंद वातावरण 

में विचरण,चिंतन मनन एवं विविध अनुष्ठान एवं कर्तव्यों का 

निस्पादन करना है।पर हम ऐसे शोषित, दमित, कुत्सित, कुंठित

मानसिकता वाले माहौल मे जी रहे हैं जो विषधर की भाँति 

विशाक्त हो चुका है।पाशविक मानसिकता, वैचारिक मतभेदों 

की प्रवृत्ति से समाज व्यथित है।

      हमारी मातृभूमि पर विविध सल्तनत, अंग्रेजों की हुकूमत

की तनाशाही रही।पर वतन की रक्षा के लिए कितने हीं वीर

शहीद हो गए।महात्मा गांधी, भगतसिंह, सुभाष,आजाद, लक्ष्मी

बाई आदि ने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।स्वाधीनता

संग्राम में आजादी की चिंगारी का अलख जगाने वाले वीरों की 

भूमि आज चीख चीखकर पुकारती है कि क्या हम गुलामी की 

दासता से मुक्त हो चुके हैं? हमारा समाज कुत्सित मानसिकता

व्याभिचार,सम्प्रदायिकता, जातियता के भेदभाव, छुआछूत, अस्पृश्यता

आदि का शिकार नहीं है? क्या गुलाम बनाने वाले सरकारी चोंचले

नहीं है?प्रजातांत्रिक राष्ट्र में क्या शोषण नहीं है? नौकरी में नियोजन

विद्या के मंदिर म़ें अंडे का वितरण,गाय के माँस खाने का प्रचलन

लडकियों के साथ दुष्कर्म एवं व्यक्ततयो की हत्या करनेवाले संगठन

इतने सक्रिय रहते हैं जिसे सत्ता का संरक्षण प्राप्त होता है।क्या यही

आजादी है? गांधी जी ने दलित शोषित को हरिजन की संज्ञा दी।फिर

विद्यालय की सूची में डोम,दुसाध, मोची, चमार की व्याख्या क्यों की 

जाती है? हमारे वीर बलिदानी ने ऐसे समाज की कल्पना की थी?

हमारा लोकतंत्र आस्तीन में छुपे सापों अथवा देश के गद्दारों से

अक्षुण्य है? 

          जब देश के पिछड़े वर्ग सामान्य जीवन यापन करने लगे।

कृषि प्रधान देश की आबादी भूखे जीने पर मजबूर न हो।जब गाय

हाथी अन्य जीव या व्यक्ति की जघन्य हत्या जैसे दुस्कृत्य पर

 कानून कि शिकंजा हो,मातृ पितृदेवों भव,वृक्षमित्र जैसी दिव्य वाणी

का प्रचलन हो।देश में कहीं भी रहने में भय कि माहौल न हो तभी

असल आजादी के मायने सफलीभूत होंगे।आजादी की अभिलाषा लिए

सोने की चिडिय़ा कहलाने वाला यह देश चहक पाएगा।शहीदों की 

परिकल्पना का भारत आजाद और सौहार्दपूर्ण होगा।


 अश्मजा प्रियदर्शिनी 

                  पटना, बिहार






30. आख़िर हम कितने स्वतन्त्र हैं इस स्वतंत्र भारत में...


इतिहास के पन्नों पर बेशक लिखित है कि 15 अगस्त 1945 को हमे अंग्रेजों की दासता से स्वतन्त्रता मिली थी। कहने को तो हम आज भी स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं परंतु पूर्णतया ये सत्य नहीं है। हम लोगों के सामने प्रत्यक्ष रूप से खुले हृदय के स्वच्छंद विचारधारा और स्वतन्त्र मानसिकता वाले व्यक्ति हैं लेकिन अगर सूक्ष्म अवलोकन किया जाये तो स्पष्ट हो जाएगा कि हम कुटिल रूढ़ीवादिता और घृणित तुच्छ मानसिकता की क़ैद में हैं जो हमारी परतंत्रता का प्रतीक है। 

आज़ हम भारत की स्वतंत्रता की 73वीं वर्षगांठ मनाने जा रहें हैं लेकिन आत्म और सामाजिक परतंत्रता से घिरे हुए...

बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हमने अंग्रेजों की अधीनता से तो स्वतंत्रता हासिल कर ली लेकिन अपने अन्दर हृदय की स्वतन्त्रता को न पा सके। अपने अंदर के तुच्छ और कुटिल शत्रु से न लड़ सके जिसने समाज और देश को दूषित कर रखा है। वरना देशभर में बालिका बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, बाल शोषण, छेड़छाड़, दहेज के लिए नारी दहन-प्रताड़न-बलि आदि जैसे इतने अपराध न हो रहे होते, सामाजिक कुटिल धारणाओं से हारकर युवक/युवती आत्महत्या न कर रहे होते और न ही आतंकवाद, दंगे फसाद और के कारण कई घर, परिवार शहर गाँव क़स्बे आदि न तबाह हो रहे होते।

इन सभी घटनाओं को देखते हुए लगता है कि स्वतंत्रता आज भी हमारे लिए एक भ्रम ही है जिससे हमने स्वयं को ही भ्रमित करके मूर्ख बना रखा है। वास्तव में अगर भारत स्वतंत्र है तो स्वतंत्रता को सही मायने में कैसे परिभाषित किया जाए यह विचार एक आम आदमी की सोच से काफ़ी परे ही है।


स्वतन्त्रता का अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि स्वच्छंद रूप से लोग अपनी मनमानी करें या मर्यादाहीन होकर अनैतिक कृत्य करें। मेरे विचार से वास्तविक स्वतंत्रता तब मानी जायगी जब नेता और आम जनता सीमाएं अपनी स्वयं तय करे, बेटी-बेटे को समान समझा जाए फ़िर चाहे वो अपना ही या पराया, बच्चों को बचपन से ही उच्चतम संस्कार देकर मानसिक स्वतंत्रता का भाव जागृत किया जाये, नैतिकता और अनैतिकता की जानकारी दी जाए, सत्कर्म और कुकर्म का भेद समझाया जाए, जब नारियों के मन से पुरुष वर्ग के प्रति भय दूर होगा, जब दहेज प्रथा समाप्त होगी, जब बहु बेटे बुढ़ापे पर माँ पिता का सहारा बनेंगे, उनका मान-सम्मान करेंगे, जब सर्वाधिकार सुरक्षित होंगे, जब भ्रष्टाचार खत्म होगा, जब ईमानदारी से लोग अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे, जब हम किसी को ग़लत कहने से पहले उसकी स्थिति और पारिस्थिति को समझेंगे, जब प्रेम और सौहार्द भाव व्याप्त होगा, जब हम स्वयं कुटिल रूढ़ीवादिता, तुच्छ मानसिकता नामक बीमारी से स्वस्थ हो पाएंगे वास्तव में तभी हम पूर्णतया स्वतंत्र हो पायेंगे और स्वतंत्रता का आनंद उठा पायेंगे।


फ़िलहाल अब विराम देती हूँ अपनी भावनाओं की इस धारा को...


स्वतंत्र भारत के सभी स्वतंत्र भारतीयों को मेरा कोटि कोटि प्रमाण.....सादर अभिनन्दन


जय हिन्द जय भारत

वन्देमातरम्

स्वरचित.. 

अनामिका वैश्य आईना

लखनऊ




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