प्रतिध्वनि समूह प्रतियोगिता 12 -- गुरु की सीख (संस्मरण)

संस्मरण


बचपन के वो दिन जब हम मात्र 11 वर्ष के थे और अपने चाचा जी के शहर के एक निजी विद्यालय चाचा जी के यहां रहकर  05वीं कक्षा में पढ़ता था हमारे एक अध्यापक हमें हमारे कक्षा के बच्चों से अधिक विशेष हम पर नजर रखते थे। हमें बात बात पर डांटा करते थे। हम पढ़ते समय जरा भी किसी से पाठ्य सामग्री माँगते, पानी पीने के लिए पूछते, इधर इधर देखते, किसी से कुछ पूछते अथवा पीछे बैठते तो अक्सर वे आगे बुलाकर हमें न सिर्फ डांटते बल्कि विभिन्न तरीकों - छड़ी से पीटते, मुर्गा बनाते, बेंच पर खड़ा करते, मैदान में दौड़ाते, और सजा देते थे। या कभी कभार देर हो जाने के कारण कक्षा से बाहर कर देते थे। उस समय हम अपने आप में उनके बारे में बहुत बुरा भला सोंचते थे। छुट्टी में मेरे दोस्त मुझे न सिर्फ चिढ़ाकर मुझ पर हंसते बल्कि हम से लड़ा भी करते थे।

ये सब झेलते झेलते मैं एकदम अकेला सा हो गया था। मेरी एक दोस्त जो मेरे साथ ही पली बढ़ी थी यह सब दोस्तों लड़ाई झगड़े और हमारे शिक्षक जी के हमारे प्रति क्रियाकलापों को देखकर हमसे घुल मिल गयी थी और वह अक्सर हमें सांत्वना देती थी कि आपको आचार्य जी अवश्य अच्छा बनाना चाहते हैं तभी आप पर वो इतना ध्यान देते हैं।। 

खैर उनकी डाँट फटकार से डरकर हमने और भी मेहनत करनी शुरू कर दी। पर अब मैं अकेला नही था क्योंकि अब मेरा कोई दोस्त भी बन गया था जो मेरी हमेशा न सिर्फ सहायता करता था बल्कि मुझे मेरे अच्छे कार्यों की सराहना कर मेरा प्रोत्साहन भी किया करती। 

हमारी वार्षिक परीक्षाएं होने वाली थीं अच्छी तैयारी के साथ हम दोनों परीक्षाओं हेतु अपना पाठ्यक्रम दोहरा रहा था।

अंत में परीक्षाएं भी हो गयीं और अच्छे से हुईं हम दोनों बहुत खुश थे। परिणाम घोषित होने वाले दिन सभी बच्चों को अपने साथ अपने अभिभावकों को लेकर ही विद्यालय में समय से पहुंचने की सूचना प्रधानाचार्य जी के द्वारा दी गयी थी।

 मेरे माता पिता मेरी नानी की तबियत अत्यधिक खराब होने की वजह से ननिहाल गए हुए थे और  दोनों गांव में रहते थे और हम अकेले अपने चाचा जी के घर पर रहते थे अतः हम चिंतित थे। मेरी दोस्त भी स्कूल नही गयी।। मैं बहुत चिंतित था क्योंकि चाचा जी भी खाली न थे मेरे साथ जाने के लिए और सोंचा आचार्य जी फिर पीटेंगे। चाचा जी अपने ऑफिस चले गए तो हम और हमारी दोस्त दोनों घर पर ही थे और कुछ घर का ही काम कर रहे थे कि अचानक दरवाजे की घण्टी बजी। 

मन में सोंचा चाचा जी आये होंगे छुट्टी लेकर हम दौड़कर  गए दरवाजा खोला तो देखकर सहम सा गया सामने देखा तो वहीं आचार्य जी थे और आज उनके चेहरे पर हमारे लिए गुस्सा नही बल्कि प्यारी सी मुस्कान थी हमने उन्हें अंदर बुलाकर बिठाया और सेवा सत्कार की।

अचानक उन्होंने हमसे हमारी दोस्त से पिताजी के साथ विद्यालय न का कारण पूछा तो हमने डरते हुए सब समस्या और अपने रहन सहन के बारे में बताया। तो उन्होंने हमें प्यार से अपनी गोद में ले लिया और आंखों से आँसू बहाने लगे और मुझे मेरे परीक्षा परिणाम के बारे में बताया और बधाई देते हुए मिठाई खिलाई। दरअसल हम दोनों ने विद्यालय में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया था। 

"वास्तुस्थिति को जानकर वे न सिर्फ भावविभोर हो गए बल्कि हमसे उन्होंने कहा कि हम उनके घर पर स्कूल से चले जाया करें और वही पढ़ाई, लिखाई, खेला कूदा करें। खैर उस दिन से हम उन आचार्य जी के घर पर ही सारे दिन रहने लगे और शाम को जब चाचा और चाची जी  वापस आते तो हम घर पर चले जाते। आचार्य जी के घर पर कोई बच्चा न होने के कारण माता जी और आचार्य जी हमें बहुत प्यार दिया करते थे कुछ दिन बाद तो हमारा खाना पीना भी वही होने लगा क्योंकि माता जी हमें दूध, दही, फल भोजन कुछ न कुछ विशेष बनाकर  खिलाया पिलाया करती थी। और आचार्य जी हमें पढ़ाते थे।। कभी कभार आचार्य जी द्वारा हमें डाँट देने पर वे आपस में ही झगड़ पड़ते थे।। अब हमें उनके लाड़, प्यार में अपने मातापिता की कमी नही खलती थी।।

 ऐसे ही चलते चलते हमने 10वीं, 12वीं तक शिक्षा वहीं से उन्ही आचार्य जी के आंगन में खेलकूद और पढ़कर पूर्ण की।

 आगे की पढ़ाई के लिए मुझे बाहर जाकर करनी पड़ी और उनके शुभ आशीर्वाद से 12वीं के बाद से ही एक निजी विद्यालय में पढ़ाते हुए स्नातक की शिक्षा पूर्ण की और आज मैं अपने यहां के एक महाविद्यालय में स्काउट मास्टर के रूप में निजी रूप से अध्यापक हूँ, साहित्यकार और प्रतिष्ठाप्राप्त व्यक्ति हूँ।।

       आज जब मैं इस स्तर पर पहुँचकर बीते दिन याद करता हूँ तो अनायास ही मन उनको धन्यवाद कह उठता है।। और सोंचता हूँ कि काश मैं अपने पूज्य गुरुदेव से कभी उऋण हो पाता।।

"सही ही कहा गया है - 

 "गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है,

                  गढ़ी गढ़ी मारै चोट"

    अर्थात गुरु एक कुम्भकार स्वरूप है जो शिष्य रूपी मिट्टी के कच्चे घड़े को डांट फटकार रूपी थपकी देकर उसके आकार को सुंदर और श्रेष्ठतम बना देता है।।

   🙏नमन पूज्य गुरुदेव🙏

 आशुकवि प्रशान्त कुमार"पी.के."

     पाली हरदोई






संस्मरण - गुरु की सीख



          आज हम डबल ग्रेजूएट है , यह हमारे माता पिता और गुरु जनों के कारण । 


             यह बात जब हम सातवीं कक्षा में पढ़ते थे । हमे गणित बहुत पसंदीदा विषय था । ऐसे तो कक्षा में हमेशा हर गणित के  प्रश्न को  फलक पर बड़ी सरलता से करके अपनी टीचर से शबासकी पाते पर जब परीक्षा आती तो हमें क्या हो जाता पता नहीं हमें गणित में ही कम अंक आ जाते । घर में सभी को यह चिंता थी कि क्यों इसके साथ ऐसे होता हैं ।


        एकदिन टीचर ने समीप बुलाया (फातिमा टीचर) , आज भी हम उन्हें याद करते हैं, मेरे सीर पर हाथ सलहाते बोला , कि वसुधा देखना आप बहुत पड़ेगी लिखेगी, दो - दो डिग्रीयां होंगी , पर बेटा परीक्षा में कभी घबराना नहीं । गर तुमने पढ़ाई की तो डर किस बात का है आपको । आराम से पेपर लिखना है । ठीक है । उनकी बात मैंने बड़ी गौर से सुनी और बाद में मैं उनके और सभी गुरु वृंद का आशिष  हमारे लिए जीवनामृत हो गया । 🙏🙏🙏 और आज हम, डबल ग्रेजूएट होकर, हिंदी, कंप्यूटर एवं एन सी सी ओफिसर में एक संस्था में कार्यरत हैं ।


गुरु ब्रम्हा, गुरु विष्णु

गुरु देव: , गुरु महेश

गुरु साक्षात, परम ब्रह्म

तस्मै:श्री गुरुवे नमः ।।


डॉ।। वसुधा पु.कामत

, बैलहोंगल, कर्नाटक. 





शीर्षक: मेरे गुरु की स्मृति सीख


मेरे गुरु की स्मृति सीख लेकर आई हूं। मैं 12वी में थी मेरे पास पढ़ने के लिये पुस्तक भी नही थी क्यों कि मैं गरीब की बेटी हूं।मैं अपने गुरु के पास गई और कहा की मैं आगे नही पढ  सकती मेरे पास पुस्तक भी नहीं है तब मेरे गुरु ने सीख दी बेटी तू आज अच्छे से पढेगी और 12वी में टॉप करेगी तो तेरा पूरा जिंदगी बदल जायेगाऔर ऐसा ही हुआ मेरे गुरु ने मुझे पुस्तक खरीद कर दी और मैं 12वी में टॉप की ।अच्छा प्रतिशत आने से मुझे शिक्षक का नौकरी भी मिलाऔर सही में मेरे गुरु की सीख से मेरा जिंदगी सँवर गया।आज मैं उस बुलन्दी पर खड़ी हु की न जाने कितने शिष्यों  को शिक्षित कर रही हूं और आज खुद मैं एक प्रेरणा हूं।मेरे शिष्यों के लिए।



उषा साहू 

छत्तीसगढ़






गुरु की सीख

❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

बात उन दिनों की है,जब मैं कक्षा पाँच में पढ़ती थी।

उन दिनों टेलीविजन वैगरह नही होता था।हम बच्चे 

विधालय से घर आते ही सिर्फ बाहर मैदान मेंखेलने

के ही फिराक में रहते थे। आज की तरह महँगे

खिलौनों का कोई मतलब नही सिर्फ मस्ती करने से

मतलब होता था।वो भी कब्बडी या फुटबॉल जैसे

खेल या छुप्पन -छुपाई इत्यादि खेला जाता था।

और घर मे कॉमिक्स चम्पक,नंदन,पराग,चंदामामा,

लोटपोट इत्यादि और बाल पॉकेट बुक्स इत्यादि

बड़े चाव से मैं पढ़ा करती थी। घर के बड़े चाहे

माँ पिताजी चाचा भैया इत्यादि समझाते की तुम

अपना गृहकार्य पूरा कर लो तभी पढ़ना ।पहले

 अपने सिलेबस की सारी पढ़ाई कर लो,लेकिन मुझे

 तो किताबे पढ़ने का अजीब सा नशा सवार था।

अपने सिलेबस की किताबो में छुपा कर कॉमिक्स

और कहानियों की किताबें पढ़ती थी। न गृहकार्य

 पर ध्यान देती थी, और सिलेबस की किताबों को

 छूती नही थी। और तो और सबसे नजर बचाकर

  जासूसी और हॉरर कहानियाँ भी पढ़ने का चस्का

लग चुका था। जो पैसे जेबखर्च के लिए मिलते

50 पैसे या 1 रुपये उससे भी मैं 50 पैसा किराया

 पर किताबे लेती थी और पढ़कर लौटा देती थी।

 कोई देखने पर, कितना भी समझाए मेरे कानों पर

  कभी जू नही रेंगती थी।एक दिन मेरे बड़े भैया

 ने मुझे हॉरर की किताबें पढ़ते देखा तो काफी 

 समझाया और पिटाई भी की। फिर भी सबकुछ

 दो दिनों में भूल कर मैं वही करती थी।

  फलस्वरूप मैं स्कूल भी लेट पहुँचने लगी थी।

  मैं स्कूल की मेधावी छात्रा कही जाती थी। एक

  तो स्कूल लेट पहुँचने के लिए सजा मिलती थी।

   मझे बेंच पर खड़ा होना पड़ता था। कक्षा में जहाँ

  मैं  फर्स्ट आती थी, वहाँ मेरे नंबर सामान्य से 

  भी कम थे। मैं भले ही छठवीं क्लास में पहुँच गई।

  पर हमारे क्लास टीचर मिश्रा जी थे। उन्होंने 

  मेरे पिताजी को स्कूल में बुलाया, और मेरे रिजल्ट

 के बारे में बताया। मेरे पिताजी ने मेरी सारी किताबे

  पढ़ने वाली बातें मिश्रा सर को बता दिया। मैं डर

  से रोने लगी क्योकि वे पिटाई करने को मशहूर

 थे। लेकिन उन्होंने मुझे बड़े प्यार से समझाया

   बेटा! जीवन मे तरक्की करना है तो अपनी

  जिम्मेदारी को पहले  पूरा करना पड़ेगा !

  तभी तुम जीवन मे आगे बढ़ोगी! तुम अगर

   नियमित पढ़ाई करना छोड़ दोगी! तो सब कुछ

   पीछे छूट जाएगा! और वक्त दुबारा लौट के 

   नही आता । बिना पढ़े लिखे लोगो की समाज

   में कोई इज्जत नही रहती।

  तू पहले अपनी कोर्स को पूरा करो ।और बाकी

   किताबे एक नियमित समय पर पढा करो, तभी

 तुम कुछ भी बन सकती हो। और यही शिक्षा

 हर जगह तुम्हे सहारा देगी। अपनी कोई भी

 जिम्मेदारी चाहे किसी भी क्षेत्र में हो उसे समय

  पर पूरा करने की आदत डाल लो। तभी तुम

 जीवन मे कभी नही पिछड़ोगी ना ही लज्जित

 होना पड़ेगा।

 उस सबक को मैनें अपने जीवन में उतार लिया

 और उसके बाद मैं पूरी कक्षा में अव्वल आने

 लगी थी, और आज भी मैं अपना काम हमेशा समय

से करती हूँ और अपने बच्चों को भी सिखाया

 है। क्योंकि जीवन मे अनुशासन देश या समाज

  या व्यक्ति को महान बनाने में मुख्य भूमिका

   निभाता है।

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    स्वरचित और मौलिक

     सर्वधिकार सुरक्षित

शशिलता पाण्डेय 






गुरु की सीख"


वो कहते हैं न गुरु उसी कुम्हार की तरह ही होता है जो चाहे तो ख़ूबसूरत सुराही बनाकर मिट्टी को शीतलता प्रदान करते हुए दूसरों की प्यास बुझा सकता है या फिर गांजा भरकर चिलम बनाकर न सिर्फ़ उस मिट्टी के बदन को जलाकर नशे में मदमस्त कराकर इंसान को ग़लत रास्तों पर चला दे। गुरु तो समाज या इस दुनिया का वो सृजनकर्ता है, जो कच्ची मिट्टी को एक आकार देता है। आज मैं अपना वो संस्मरण आप सभी से साझा कर रहा हूँ, जिसने मुझे आज इस मुकाम तक पहुंचाया जहाँ भी मैं आज हूँ। 


 ये बात है जब मैं छोटा बच्चा था। गाँव में नवोदय विद्यालय में चयनित होना समाज और लोगों की नज़रों में उस बच्चे के मेधावी होने का प्रमाण होती थी। कक्षा-५ में जब मैंने प्रवेश फॉर्म भरा और जुनून के साथ तैयारी शुरू की। मेरे गुरु आदरणीय राजेश जी ने मेरे साथ दिन-रात मेहनत की पर किन्हीं कारणवश मैं सफ़ल नहीं हो सका पर उस उम्र में एक बच्चे को 50 तक पहाड़ा, उंगलियों में गणना करना और भी बहुत सारी चीज़ें जो आज भी मेरे जीवन में अहम स्थान रखती हैं। मेरी असफ़लता से वो भी दुःखी हुए जितना कि मैं पर उन्होंने वो बात कही जो मुझे आज भी याद है जितेन्द्र कभी सफ़लता को अपने जीवन का सबकुछ मत समझना। तुम्हारी मेहनत भी तुम्हारी सफ़लता से कम नहीं है बेटा। मेहनत बस इतनी कर दो कि ये पछतावा न रहे कि हमने अपना 100 फ़ीसदी नहीं दिया। सच में आज आपके ही आदर्शों पर चलकर मैं एक सरकारी नौकरी कर रहा हूँ और आज भी मेहनत कर रहा हूँ बिना किसी फल की इच्छा के साथ क्योंकि वक़्त के साथ मैंने ये भी सीखा है कि हमारे हाथ में फल होता ही नहीं। आपके द्वारा किये गए कर्म ही आपका कर्मफल बनाते हैं।


जितेन्द्र विजयश्री पाण्डेय "जीत"





गुरु 

 


शिक्षक..... 

जीवन की राहों में कुछ लोग हमेशा के लिये अंकित हो जाते हैं. 

समय तो रफ़्तार से भागता ही रहता है लेकिन दशकों बाद भी उनकी स्मृति मन को उतना ही आनंद और स्फूर्ती देती है  मानो कोई कल सी ही बात हो, स्कूल में सदा ही हर कार्यक्रम में आगे रहना आदत में ही था खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम में सदा से ही अव्वल रहती थी. रजनी मैडम मुझे प्रोत्साहित किया करतीं और मेरे हौसले को सातवें असमान पर पहुँचा दिया करती. मेरा उनसे लगाव  उनके स्नेहसिक्त स्वभाव के कारण रहा.स्पोर्ट्स डे पर रेस में भाग लिया और बस इतनी जोर से  गिरी की घुटने बुरी तरह छिल गये. तीन दिन बाद स्कूल में एनुअल डे में मुख्य भूमिका में मेरा 

नृत्य व नाटक था जिसकी मैंने जी तोड़ मेहनत की थी. मैं फूट फूट कर रोने लगी तभी रजनी मैडम ने मेरे कंधे पर प्यार से हाथ रखा और हिम्मत देते हुए कहा की इतनी छोटी सी बात पर हारोगी तो जीवन की जंग में कैसे जीतोगी. तीन दिन बहुत होते हैं तुम्हारी मेहनत बेकार नहीं जायेगी.. बस भरोसा खुद पर रखना सीखो और जितना तुमने सीखा वो तो सदा के लिये तुम्हारे अंदर समाहित हो गया है. हारने की जरुरत नहीं है मैं तुम्हारे साथ हूँ. तुम नृत्य भी कर सकोगी और 

नाटक भी. उनकी जादू सी बातें मानो हमेशा के लिये मेरे जेहन में उतर गई.. मैंने सोच लिया की मैं जरूर अपना किरदार निभाऊँगी. 

मरहम पट्टी के साथ दूसरे दिन मैं जैसे ही कक्षा में गई उन्होंने एक 

छोटा सा सुन्दर कार्ड मुझे दिया जिस पर लिखा था.... 

"मन के हारे हार है 

मन के जीते जीत "

और वो जिद थी बचपन की पूरी 

तन्मय होकर नृत्य भी किया और नाटक भी. और मंच पर जब ताली की गड़गड़हट गूँज रही थी और पुरुस्कार की घोषणा में मेरा नाम पुकारा गया तब जेहन में रजनी मैडम का यही वाक्य गूँज रहा था मन के हारे हार है, मन के जीते जीत. और रजनी मैडम मेरे जीवन में भोर का प्रकाश देने वाली किरण बन गईं. स्कूल तो पीछे छूटा कब  बडे हुए और जिंदगी की रेस में शामिल हो गई कितनी ही बार उताब चढ़ाव के दौर जब कभी मन निराश हुआ रजनी मैडम का दिया मूलमंत्र दोहरा लेती मन के हारे..... बस 

फिर से कोई ऊर्जा और शक्ति संचरित हो जाती है. न ही उनका पता और न ही कोई चित्र है पर मन पर अंकित है वो स्नेहिल छबि जो आज भी मेरे हौसलों को पंख देकर कहती है.... 

मन के हारे,  हार है 

मन के जीते जीत 

और जीतती रही जिंदगी की सारी जंग. दिल से आज उन्हें  प्रणाम. 


पूजा नबीरा 

काटोल 

नागपुर

पूजा नबीरा काटोल 





गुरु की सीख



सभी को शिक्षक दिवस की अनन्त शुभकामनाएं।

आदर्शवाद में गुरु को ईश्वर तुल्य कहा गया है। कभी-कभी हम जीवन में ऐसे दुर्लभ अद्भुत, ईश्वर के वरदान स्वरूप व्यक्तित्व को पाते हैं जिनका सहयोग व मार्गदर्शन हमारी खुशियों का निर्णायक, सृजक, उत्प्रेरक, सम्पोषक या कहेंकि सम्पूर्ण अस्मिता का ही सूत्रधार होता है।

मेरे जीवन के 45वें वर्ष में मेरी प्रेरणापुंज बनकर आईं, बहुमुखी प्रतिभा की धनी "डा दीप्ति मेम" जो एक शिक्षिका होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी भी हैं। एक प्रतियोगिता के पुरस्कार समारोह में उनसे प्रथम बार साक्षात्कार हुआ। सुंदर व्यक्तित्व, साहित्य के प्रति अति निष्ठा आकाशगंगा से स्वभाव ने मुझे अतिप्रभावित किया। साहित्य के क्षेत्र में कुछ अविरल करने की इच्छा रहते हुए भी परिवार और विद्यालय की जिम्मेदारी के कारण स्वयं को असमर्थ पा रही थी। फिर भी साहित्य के प्रति मेरी बलवती इच्छा ने मुझे उनसे मिलने के लिए मजबूर कर दिया। मै अपनी कुछ कविताएं लेकर मेरी गुरु से मिली उन्हें पढकर वह प्रसन्न हुई और कहने लगी कि तुम्हें एक मार्गदर्शक की आवश्यकता है क्योंकि साहित्य का पथ बहुत विशाल व गंभीर हैऔर इस पथ पर चलने के लिए धैर्य की आवश्यकता है जब मेने उनसे कहा कि परिवार व विद्यालय की जिम्मेदारी के बीच में लेखन के लिए समय कैसे निकालूं। तो उन्होंने एक बात कही जो मेरे जीवन के लिए प्रेरणा बन गई। उन्होंने कहा - - - "" जहां चाह है वहां राह है। जीवन में अनुशासन रखो। समय का प्रबन्धन करो। हर कार्य में सफलता मिलेगी। "" उसके बाद उन्होंने जो भी सिखाया मेरी प्रगति बनता गया। मेरे लेखन को मेरी गुरु ने एक नई दिशा दी साहित्य की बारीकियों पर भी उन्होंने मुझे ध्यान देना सिखाया। जब भी मैं अति व्यस्तता के कारण लेखन नहीं कर पाती तो उनके कहे वे शब्द मेरे कानों में गूंजने लगते हैं और अचानक मै स्वयं को ऊर्जावान महसूस करती हूँ। कहते हैं गुरू के आशीर्वाद से ही साधना सफल होती हैं। उन्होंने मेरे अन्दर साहित्य में करने की चाह को पहचाना और दीये की तरह प्रकाश दिया जो अखण्ड है। आज अपने गुरु की सीख से ही बहुत कम समय में अनेक उपलब्धियां प्राप्त की है। मेरी पुस्तक भी प्रकाशन में हैं। अनेक साहित्यिक मंचों से जुड़ी हूँ। मेरी साहित्यिक जीवन की यात्रा मेरी गुरु की ही देन है।

आज भी उनकी स्नेहिल वाणी धूप - दीप बनकर सुवासित और प्रभासित है।

वे मेरी शैक्षिक, साहित्यिक, सामाजिक, आध्यात्मिक जीवन की आदर्श बन गई हैं।

मेरी गुरु के रुप में सचमुच ईश्वर स्वयं मेरी साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं को संप्रेषित करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं।

शत शत नमन मेरे ईश्वर स्वरूप गुरु को। 🙏



लेखिका

अर्चना बामनगया ग्वालियर 






गुरु की सीख 

विधा    संस्मरण

   बात बात उस समय की है जब मैं कक्षा नवमी में पढ़ता था। 1 दिन कक्षा में गणित विषय की पढ़ाई हो रही थी जिसमें हमारे शिक्षक द्वारा गणित का  एक सवाल हल करने के लिए दिया गया था । मैंने उस सवाल को हल किया को उत्तर गलत हो गया। शिक्षक ने पुनः बनाने को कहा। मैंने सर से यह कहा की यह मेरे से नहीं हो पाएगा । उन्होंने कहा की गणित का सवाल लगातार हल करने से और अभ्यास करने से सही होता है । समझ में बैठता है,  और गणित आसान होता है।  तुम एक अच्छे विद्यार्थी हो तुम्हें ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए । तुम सवाल को हल करो ,बार-बार अभ्यास करो जरूर सवाल का उत्तर सही आएगा । मैंने उनकी बात मानी । उनकी सीख को अपनाया और गणित के सवालों को बार-बार अभ्यास करने लगा। गणित का विषय जो मेरे लिए कठिन होता था वह गुरु के उस सीख से सरल हो गया । दसवीं के बाद मैंने गणित विषय को चुना और आगे चलकर गणित विषय में ही बी एस सी एवं एमएससी करके आज एक गणित का शिक्षक बन पाया मैं उस गुरु को एवं उनके सीख को सादर नमन करता हूं । 


             महेत्तर लाल देवांगन

             बिलाईगढ़ छत्तीसगढ़ 







बदल गयी करण की जिंदगी


कल का दिन मेरे लिए बहुत अच्छा व आत्मसंतुष्टि वाला रहा।

एक अध्यापक होने के नाते कल के दिन मुझे BLO के कर्तव्य के निर्वहन के लिए बूथ पर बैठना था।

इस दरम्यान कुछ परिचित लोगो से मेल मिलाप व ग्रामीणों से बातचीत हुई।

लेकिन जो सबसे अच्छी बात रही वो यह थी कि जब मैं खाली समय में बैठकर पढ़ रहा था तब मेरे पास नाथ परिवार का एक बालक आया जो भैस चराता था।

अक्सर वो आते जाते नमस्ते करता था.......लेकिन कल मुझे अकेला बैठा देखकर मेरे पास आकर बैठ गया।

उसका नाम था करण........कुछ समय की बातचीत के बाद जब वो मुझ से घुलमिल गया तो मुझे पता चला की वो साक्षर नही है और कभी विद्यालय नही गया है।

शायद परिवार की कोई स्थिति ऐसी हो या घुमन्तु परिवार होने के कारण कभी विद्यालय नही जा पाया......

फिर मैंने उस से पूछा अपना नाम लिखना सीखोगे......तो उसने बड़े कौतुहल से हामी भरी........मैने बेग से एक कोरा कागज निकाला व पेन से उसे उसका नाम लिख कर दिया..........मुझे देखकर बड़ा अचरज हुआ की उसने अप्रत्याशित तरीके से उसे मुश्किल से 10-15 मिनट में लिखना सीख लिया........और उसके बाद उसके चेहरे की जो ख़ुशी थी.......उसने मेरा दिन बना दिया..........

उसके बाद एक प्रण लिया है की ऐसे बालक जहा भी होंगे कम से कम उन्हें साक्षर बनाने में अपनी भूमिका जरूर निभाउंगा...चाहे उसके लिए विद्यालय समय के बाद समय देना पड़े....और मेरे अन्य शिक्षक साथियो से भी यह आग्रह करना चाहूँगा की आप भी इसे एक मुहीम की तरह लेवे.........यही एक शिक्षक की सच्ची आत्मसंतुष्टि यही है कि वो उस कारीगर की भांति कार्य करे जो एक आलिशान भवन की मजबूत नींव भरने का काम करता है।

मुझे इस बात की ख़ुशी है की मेरी हर छुट्टियों की तरह यह छुट्टी भी सार्थक रही।


*गौरव सिंह घाणेराव*

🙏🏼🙏🏼अध्यापक🙏🏼🙏🏼

सुमेरपुर,राजस्थान 







सामंजस्य 

सच पूछा जाये तो स्कूली शिक्षकों ने मुझे ज्यादा प्रभावित नहीं किया या कहो कि हमारे समय में शिक्षक छात्रों से ज्यादा घुलते-मिलते नहीं थे।इसका एक और कारण हो सकता है कि जिस स्कूल में हम पढते थे,वहां हमारी मम्मी स्वयं अंग्रेजी विषय की अध्यापिका थीं।मम्मी स्वभाव की बहुत सख्त थीं। कहीं किसी शरारत की उनके पास शिकायत ना चली जाए तो म तो वैसे भी एक सीमा में ही रहते थे।पढ़ाई में ठीक ठाक थे।.  

  फिर दूसरे शहर में 12वीं तक पढ़ाई हमने रेगुलर की पर ये कोएड इण्टरकालेज था जहां पुरुष शिक्षक ही थे। किसी भी अध्यापक ने हमें कोई ज्यादा प्रभावित नहीं किया।उसके बाद B.Ed मैं एक प्राध्यापिका थीं शारदा जी नाम था शायद जो हमें साइकोलॉजी और इंग्लिश सब्जेक्ट पढ़ाती थीं। वह भी बस अपने स्टाइल की वजह से हमें अट्रैक्ट करती थीं।अर्चना जी कम उम्र की बजह से। बस ये सब कक्षा में आतीं,पढातीं और चली जातीं। 

    इस तरह विद्यालयी शिक्षक ने तो नहीं लेकिन एक शिक्षक के रूप में सबसे ज्यादा जो प्रभावित किया है वह हमारी मां ही थीं।बेशक उनसे बहुत डरते थे हम,उनकी बहुत सी रोक-टोक हमें पसंद नहीं थी।कई बार हम भाई-बहन आपस में उनकी आलोचना भी करते थे।लेकिन सच्चे अर्थों में कहीं ना कहीं हम दिल से जानते थे कि वह अपनी जगह सही हैं और हमें सही मार्गदर्शन दे रही हैं। 

            उनकी सबसे बड़ी  सीख थी वह थी लड़कियों को हर माहौल में एडजस्ट करना आना चाहिए क्योंकि शादी के बाद अलग माहौल,अलग परिवार,अलग खानपान,अलग रीति- रिवाज बहुत कुछ अलग अलग हो जाता है और जीवन में बिना त्याग के कुछ नहीं मिलता।सीख तो और भी बहुत थीं उनकी लेकिन संस्मरण में एक सीख विशेष के बारे में पूछा गया है तो यही वह चीज थी जिसे हमसब बहिनों ने गांठ बांध लिया।जिसने मुझे शादी के बाद बिल्कुल अलग माहौल अलग संस्कृति में ढलने में काफी मदद की। 

    मैं यूपी की और पति हरियाणा के यानि कि बहुत सी चीजें बिल्कुल अलग, बोलना-चालना, खाना-पीना पहनना और रीति रिवाज भी।एक तो ससुराल में वैसे ही निभाना कोई आसान बात नहीं है ऊपर से सब कुछ अलग अलग हो तो..  

  लेकिन मां की जो सीख थी सामंजस्य स्थापित करने की उसने बहुत ज्यादा मदद की उनकी डांट डपट की बजह से सास की डांट का बुरा नहीं माना,उनकी चुप रहने की सीखने सासु को शांत रखने में मदद की और उनकी एडजस्ट करने की सीख ने ससुराल में सभी के साथ सामंजस्य बिठाने में अत्यधिक मदद की। 

    और आज मैं कह सकती हूं कि मैंने ससुराल में अपना एक स्थान बनाया और आज मैं एक सुखी जीवन जी रही हूं वह उसी सीख का नतीजा है। 

  सामंजस्य बिठाना परिवार से,समाज से,अपनी और दूसरों की इच्छाओं से।आज मां नहीं हैं पर उनकी सीख हमेशा मेरे साथ है।

प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"







 गुरु की सीख 

          सबसे पहली गुरु मां होती है। मां की सीख जो मान ले वह कभी ठोकर नहीं खाता है । सीख हमेशा कड़वी ही लगती है। अगर सीख सच्ची है तो वह कभी मीठी नहीं हो सकती है । ऐसी ही एक कड़वी सीख मुझे याद आती है । बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा चार में पढ़ता था। मेरे  बड़े भाई के मित्रों  के साथ कुछ दोस्तों ने पार्टी करने का विचार बनाया और गांव में पास ही बने सोमदेव आश्रम तालाब पर दाल बाटी बनाने का कार्यक्रम रखा । सभी दोस्तों ने अपने घर पर बताया नहीं होगा शायद या बताया भी होगा पर हमने और बड़े भाई ने घर पर नहीं बताया था  और हम भी पार्टी करने उनके साथ चले गए । विद्यालय छूट गया। हम दोनों भाई घर नहीं पहुंचे । मां को कुछ अन्य दोस्तों ने बताया ही होगा । तब मां को बहुत गुस्सा आया । बिना पूछे, घर पर बिना बताए चले गए ? मां ने एक लकड़ी हाथ में ली और तालाब पर पहुंची । सभी साथियों को भी बहुत डांटा और हमारे को तुरंत बोला घर चलो। मुझे याद नहीं है शायद एक बार डंडा भी हमारे सबके सामने लगाया भी था। लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि मां ने बहुत कड़क और तीखे स्वर में हमें तुरंत घर चलने को कहा और दाल बाटी हमारे दोस्तों के साथ ही रह गई । माँ ने दोस्तों को भी बहुत भला बुरा कहा। वह कोई द्वेष-विद्वेष  नहीं था । वह केवल एक मां की सीख थी जो दूसरे बच्चों के लिए भी सीख ही थी।उसी को हम ने ग्रहण किया। उस दिन तो हमें बहुत अनमना लगा । लेकिन धीरे-धीरे मां की उस सीख को गांठ बांध ली कि बिना बताए कहीं नहीं जाना व ऐसे पार्टी भी नहीं करना। इस घटना के बाद मुझे याद नहीं आता है कि उसके बाद कभी मैं अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने गया हूँ । मैं आज उस मां की उस  सीख को प्रणाम करता हूं। मां को प्रणाम करता हूं । मां के रूप में उस गुरु को प्रणाम करता हूं  जिसको हम शिक्षक कहते हैं।



रचयिता :

मंगल कुमार जैन

उदयपुर राजस्थान

  मोबाइल 

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छोटे-छोटे प्रयासों से मिलती है बड़ी सफलता"


समय कब पंख लगा के उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता । जब भी शिक्षक दिवस आता है मेरे आदर्श शिक्षक जिन्होंने मुझे जीवन का पाठ पढ़ाया उनके आदर्शों को, उनकी सीख को याद कर आंखें नम हो जाती हैं । बात उन दिनों की है जब मैंने  शासकीय कन्या विद्यालय में कक्षा 9 में प्रवेश लिया था । मैं अपनी उम्र से बहुत छोटी दिखाई देती थी । प्रवेश के समय भी जब मैंने आवेदन जमा किया तो शिक्षक शिक्षिकाओं को लगा कि मैं किसी छात्रा के साथ आई उसकी छोटी बहन हूं । जब उनको पता लगा कि मेरा खुद का आवेदन है तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट भी आई थी । यूं तो बचपन से ही कहानी, लेख लिखने का शौक था । परंतु कविता कभी नहीं लिखी थी । एक दिन विद्यालय में आदेश आया कि बाल दिवस पर 'चाचा नेहरू' पर स्वरचित काव्य पाठ की प्रतियोगिता है ।  मेरा हस्तलेख और लेखन शैली अच्छी थी जिसे मेरे शिक्षक- शिक्षिकाओं द्वारा सराहा जाता था । परंतु कविता का सुन के मैं थोड़ी रुआंसी हो गई ,क्योंकि मैंने कविता कभी नहीं लिखी थी और यह भी सोचती थी कि यदि लिखा और अच्छी नहीं हुई तो लोग क्या कहेंगे शायद हसेंगे भी । तब मेरी हिंदी की शिक्षिका स्व. श्रीमती रजनी मिश्रा मैम ने मुझसे कहा कि तू तो कितना अच्छा लिखती है , इसमें भाग ले, कविता लिख । मैंने सकुचाते हुए उन्हें अपने मन का डर बताया, तब उन्होंने कहा कि प्रयास बहुत जरूरी है। पहला कदम उठाओगी, तभी आगे बढ़ सकोगी । छोटे-छोटे प्रयासों से ही बड़ी सफलता मिलती है । और मैंने कविता लिखी जिसकी चंद पंक्तियां मुझे याद हैं-


"जो बच्चों को करते थे दिलो जान से प्यार,

दिया जिन्होंने बच्चों को बाल दिवस उपहार ।

बच्चे जिनको करते हैं याद सौ सौ बार ।

नाम था उनका नेहरू लाल जवाहर ।" 

और जब मैंने मंच से यह कविता बोली तो मुझे प्रथम स्थान मिला। इससे मुझे बड़ा हौसला मिला और मैंने अपनी कविताओं का सफर शुरू किया । साथ ही श्रीमती जया कौल मैम जो काक्षाध्यापक थीं उन्होंने भी बहुत हौसला दिया । विद्यालय पत्रिका "प्रयास" में मेरी रचना छपने लगी । तब से काव्य लेखन का जो दौर चला अनवरत जारी है । दो वर्ष पूर्व ही मेरी सम्माननीय मैम श्रीमती रजनी मिश्रा का असामयिक निधन हो गया ।  शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं ।


डॉ. दीप्ति गौड़ "दीप"

कवयित्री

ग्वालियर मध्यप्रदेश





शिक्षक (mam )


मैं छोटी सी थी 5क्लास में याद है आज भी, मेरा गर्ल्स स्कूल था मेरे सहेलियों की छोटी बहिन थी और मेरा छोटा भाई, जुलाई का महीना सब अपने में मस्त कुछ सहेलियां अपनी बहिनों को स्कूल लाती |

मुझे बहुत अच्छा लगता देख़ उनका प्यार और वो इतराती मेरी बहिन मेरी बहिन, मैं भी ना समझ अपने छोटे भाई को स्कूल ले पहुंची दूसरे दिन |

फिर क्या था स्कूल में जयंती mam के आते ही मुझे गाल पर एक झापड़  बहुत तेज से मारा गया |आज तक मैंने किसी भी टीचर के हाथ या किसी के भी हाथ इतनी तेज मार नहीं खाई थी |मुझे बहुत तेज ग़ुस्सा आया क्योकि मुझे मेरी गलती नहीं पता थी|मैं mam से बोली भी mam आपने क्यों मारा मेरी गलती क्या है? वो गुस्से में थी मेरे सवाल का जबाब नहीं दी और मुझे beg लेकर मेरे छोटे भाई साथ वापिस घर भेज दी |मैं रोते रोते घर आई पापा मेरा गाल देखें और पूछे किसने और क्यों मारा इतना जोर से और स्कूल से वापिस क्यों? मैं बोली पता नहीं mam ने क्यों मारा मेरी कोई गलती भी नहीं थी और mam घर भेज दी |पापा की लाड़ली स्कूल से वापिस वो भी रोते हुए और गलती भी नहीं पता पापा बोले स्कूल चलो वापिस देखते है क्या बात है|स्कूल गई पापा को बोला गया आपकी बेटी girls school में लड़के को लेकर आई इसलिए मारा अब तो ग़ुस्सा पापा को भी आया क्योकि मैं ही 5th में थी और भाई तो school जाता भी नहीं था मेरे से साढ़े चार साल छोटा था |तो पापा बोले mam ये क्या बात हुई इतनी सी बच्ची को इतना जोर से चांटा मारा गया और तो ठीक स्कूल से घर अकेले भेज दिया गया |अब mam को तो अपनी बात रखनी थी तो वो मेरी बुराई करना शुरू हो गई |हम्म पढ़ने में अब्बल तो नहीं थी पर क्लास में कभी भी कोई भी टीचर सवाल करता उत्तर मेरा सबसे पहले तैयार रहता किन्तु एग्जाम में बस मिडिल में रहती |

फिर mam बोली आपकी बेटी ऐसी है की नकल भी दो तो नकल नहीं करती जितना ख़ुद से आता उतना लिखना और फिर कम no. एग्जाम में लाना पता नहीं क्यों ये लिखाई में आलसी है |फिर पापा की ग़ुस्सा शांत हुई और बोले अच्छा हेना नकल नहीं करती ये बचपन से स्वाभिमानी type है ईमानदारी से करती है जितना करती खुदका बाकी oral में सब जानती है पर लिखने में हमेशा आलस करती है ||

तब से आज तक मैं अपने छोटे भाई को अपने किसी भी स्कूल कॉलेज नहीं ले गई भले कॉलेज स्कूल co-add रहा |


--------//वर्षा सोनी( नाम नही लिखा था) 






नासमझ भी होते हैं  गुरु।


"गुरू" शब्द दो वर्णों से मिलकर बना है। "गु" का अर्थ है तिमिर। "रु" का अर्थ है दूर करनेवाला। अर्थात् संसार में हर वो व्यक्ति हमारा गुरु है जो हमारी बुराई,अज्ञान और गलतियों रूपी अंधकार को दूरकर अच्छाई और ज्ञान की रोशनी देता है। जिससे हम कुछ न कुछ सीखते हैं न कि केवल  विषयों का ही ज्ञान देनेवला। शिक्षक तक ही सीमित करके हम 'गुरु"   शब्द की व्यापकता को सीमित कर देते हैं। व्यापक अर्थ को ही मध्यनजर रखते हुए मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि अन्य गुरुओं के साथ साथ  वो लोग भी मेरे गुरु रहे जिन्हें समाज कामचोर, मूर्खऔर नकारात्मक सोच वाला कहकर उनकी और उनके कार्यों की अवहेलना करता रहता है। बात बस दृष्टिकोणकी है। इसी संदर्भ में आज मैं एक संस्मरण आपके साथ साझा कर रही हूँ। बात उस समय की है जब  हम दिल्ली में सरकारी मकान में  रहतेथे। पड़ौस के दोनों घर भी अच्छे संस्कारी,सम्मानित और शिक्षित परिवार थे। हम लोग एक परिवार की तरह ही रहते थे। पाण्डेय अंकल जी जो बराबर में ही रहते थे। एक महीने पहले ही उनके बड़े बेटे का विवाह बैंक में मैनेजर के पद पर कार्यरत  बेहद खूबसूरत रेनू से हुआ।  घर में खुशहाल माहौल रहता था।  मैंभी नई नवेली भाभी से अक्सर मिलने चली जाती थी। उस समय  मैं कक्षा बारहवीं की छात्रा थी सो मैं अक्सर देर रात तक पढ़ती रहती थी।एक दिन रात के सन्नाटे में उनके घर से चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं। मैंनें डर के मारे मम्मी को जगाया ।मम्मी समझ गईं। बाद में अक्सर कभी दिन में कभी रात में रेनू की चिल्लाने की आवाजें आती।अक्सर रेनू चिल्लाती,  "मैं बहुत बड़े घर की हूँ, तुम्हारा बेटा है क्या मेरे सामने।मैं जेल करवा दूंगी सबको।" अंकल,आंटी और उनका बेटा धीरे से उसे शांत होने के लिए कहते । सब रोज यही तमाशा देखते। मैं मन में इस परिवार के लिए  बहुत ही दुखी होती थी। हद तो तब हो गई जब घर के बाहर पुलिस अंकल,आंटी और उनके बेटे को पकड़ कर जीप में धक्के मार मार कर  बिठा रही थी और वह नजरें झुकाऐ हुए थे। रेनू की माँ झुठे आरोप लगा रही थी ये हमारी बेटी को मारते पीटते हैं।मम्मी तो जाती रहती उनके झगड़े में ऐसा कुछ भी तो नहीं था। रेनू पति के साथ अपनी माँ के ही घर रहना चाहती थीइसलिए सारा फसाद था ऐसा मम्मी अक्सर बताती। मैंने अपनी आँखों से एक घमंडी और जिद्दी लड़की की मूर्खता के कारण  एक सम्मानित आबाद परिवार को बर्बाद और शर्मिंदा  होते देखा था। मन ही मन एक टीस सी उठती उस परिवार के लिए। इस  घटना ने मेरे अंतर्मन को छलनी कर दिया। और तभी मैंने यह सबक लिया कि मैं अपनी जिद या घमंड के कारण  कोई ऐसा काम नहीं करूंगी जिससे  मायका या ससुराल  कहीं भी  एक सम्मानित और  खुशहाल परिवार  बर्बाद हो जाए। और आज मैं कह सकती हूँ कि मैंने दोनों परिवारो का सम्मान में कोई कमी नहीं होने दी। 

आज मुझे दोनों ही घरों में एक अच्छी बेटी और अच्छी बहू का दर्जा मिलता है। जिसका श्रेय रेनू को ही जाता है। 

जिससे मैंने सीखा कि ऐसा नहीं करना।  

            सुधा बसोर

         वैशाली (गाजियाबाद)

              




निंदा से दूरी



आज मैं विगत कई दशकों में पहुँच गई ।  पल -पल मेरे गुरु मुझे बचा लेते हैं और उनकी सीख मेरे कानों में गुंजित होती है। मेरे गुरु सदैव कहते थे किसी का अच्छा नहीं कर सकते हो तो मत करो पर बुरा कभी किसी का बुरा  मत करो। कभी किसी की निंदा में भागीदारी मत निभाओ। निंदा से व्यर्थ में आप स्वयं के दिमाग में कचरा भरते हो ।उस दिन कक्षा में यह बात  मैंने गांठ बांध ली कि मुझसे यदि किसी का अच्छा नहीं होता है तो कोई बात नहीं पर मैं किसी का बुरा नहीं करूँगी और न ही किसी की निंदा करूँगी। पर मन तो चंचल होता है ,स्वभाविक है  मेरे इस मन को भी निंदा रस में बड़ा आनंद आता है ।गुरु की सीख स्मरण होती है और मैं निंदा प्रकरण से स्वयं को दूर कर लेती हूँ। एक बार मेरी जेठानी मेरी ननद के बारे में झूठी -सच्ची बातें कर रही थीं मेरी देवरानी और मुझसे।ये बात छिपकर चुपचाप मेरी ननद भी सुन रही थी।मैं भी मेरी जेठानी -देवरानी की बातों में रस तो ले रही थी पर बोल कुछ नहीं रही थी।मुझे मेरे गुरु की सीख याद आ गई और मैं वहाँ से चली गई।फिर ननद के द्वारा सब सुन लिया जाने से मेरी जेठानी -देवरानी तथा ननद के बीच वो हंगामा हुआ कि मैं कांप गई पर भला हो मेरे गुरु का कि मैं उनकी दी सीख के कारण बच गई।तब से तो कान पकड़ लिया ।


मीना जैन दुष्यंत 

भोपाल।



गुरु की सिख



      गुरु और माता-पिता में सबसे श्रेष्ठ कौन है? मेरे ख्याल से माता पिता ही श्रेष्ठ है। क्योंकि हम बचपन से माता-पिता के सानिध्य में रहते हैं। हमारे जिंदगी की पहली शिक्षा माता-पिता से ही प्राप्त होता है। सबसे पहले एक बच्चा अपने माता-पिता से ही बोलने को सीखता है, वह सबसे पहले मां पापा ही बोलता है। जिसके बाद ही वह गुरु के पास जाता है।एक बच्चे का सर्वप्रथम गुरु माता पिता को ही माना जाता है, माता पिता ही बच्चे को दुनिया में लाते हैं। एक मां अपने बच्चे को 9 महीने अपने कोख में रखती है,सब दुख दर्द सहती है और एक पिता अपने बच्चों की हर जरूरत को पूरी करने में लगा रहता है।माता-पिता की दी हुई शिक्षा हम जिंदगी भर के लिए ग्रहण कर ले तो हम अपने जिंदगी के राहों से कभी नहीं भटकेंगे।

           हमारे जीवन में सभी रिश्ते अनमोल होते हैं, लेकिन माता पिता और गुरु का स्थान सबसे ऊंचा होता है।जिसमें मां हमारी प्रथम गुरु होती है, वह हमारी दुनिया से साक्षात्कार करवाती है।मां ईश्वर का रूप होती है जो हमेशा हमें सबसे ज्यादा प्रेम निस्वार्थ भाव से करती है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जीना सिखाती है।माता-पिता के डांट में भी हमारे लिए आशीर्वाद छिपा होता है। माता पिता हमारे जीवन का आधार होते हैं। इस आधार को गुरु एक मार्ग देते है,एक सही रास्ता दिखाते हैं हमें सही गलत की पहचान कराते हैं। इस दुनिया में रहने के तरीके सिखाते हैं। इसलिए गुरु का भी हमारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि हमारे माता-पिता की है। लेकिन माता-पिता का स्थान सर्वश्रेष्ठ है उनका स्थान इस दुनिया में कोई नहीं ले सकता। माता-पिता हमें जिंदगी देते हैं और गुरु हमें जीना सिखाते हैं।

माता-पिता और गुरु को मेरा प्रणाम।🙏🙏

******"*******************************

गीता चौहान

जशपुर छत्तीसगढ़





गुरु की सीख 

विधा_ संस्मरण 


विवाह पूर्व मैंने भी शिक्षक का कार्य किया था  । बच्चे शरारती तो थे ही लेकिन कुछ पढ़ने में भी होशियार थे । कभी-कभी जब बच्चे शिक्षा के महत्व को न समझते हुए कुछ ज्यादा ही शरारत करते थे तो गुस्सा तो बहुत आता था मगर मैं बच्चो पर जाहिर नहीं होने देती थी और बहुत प्यार से उन्हे शिक्षा का महत्व बताती थी । उनको मेरे समझाने का कितना असर हुआ ये तो मैं नहीं देख पाई क्यूँ कि मेरा विवाह हो गया था। 

                                  अभी दो तीन साल पहले जब मैं अपने मायके गई तो एक दिन बाजार में मुझे एक नवयुवक ने रोका और अपना परिचय अमित के रूप में करवाया।  फिर उसने अपने सहपाठियो के बारे मे बताया कि कोई बैंक मे जॉब कर रहा है कोई वकील है कोई अध्यापन कार्य करता है मैनें उसको बीच में ही चुप करके पूछा कि तुम क्या कर रहे हो तो आँखो में आँसू भर कर बोला मै पिता के साथ परचून की दुकान पर ही बैठता हूँ। मुझे बहुत हैरानी हुई कि जो बच्चा कक्षा में प्रथम आता था आज दुकान पर बैठा है जबकि जिन बच्चों के लिए वो बता रहा था वो सब पढ़ाई मे पिछड़े हुए थे। 

               मैने अमित से कारण पूछा तो उसने कहा कि काश उन सब की तरह मैने भी आपके द्वारा बताए हुए शिक्षा के महत्व को गुरु की सीख समझ कर पालन किया होता तो पिता जी के सपने को साकार करता। 


स्वरचित 

सूफिया ज़ैदी 

सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) 





माँ और शिक्षिका


मेरी माँ का जन्मदिन 05 सितंबर शिक्षक दिवस पर आता है। मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी गुरु है परन्तु माँ और अध्यापिका में बहुत अधिक समानता है, जिसे आप सबसे सांझा कर रही हूँ...मैंने जाना है, मेरी यादों में है और सीखा है कि माँ और अध्यापिका में समानता है और महसूस करती हूं  उनकी सीख और बड़प्पन को....👍


व्यक्ति एक नाम अनेक - अध्यापिका, शिक्षिका, टीचर


माँ और शिक्षिका दोनों एक समान है....दोनों ही युग प्रर्वतक है समाज और राष्ट्र के सम्मान है, स्वाभिमान है, गौरव है, अभिमान है 


माँ जीवन देती है, टीचर जीना सिखाती है।


माँ आत्म-विश्वास जगाती है, टीचर अनुशासन सिखाती है।


माँ  रोज सुबह जल्दी उठकर टिफ़िन बनाती है,स्कूल भेजती है, टीचर रोज सुबह जल्दी उठ कर स्कूल पहुँचती है आपको पढ़ाती है, एक्टिविटीज करवाती है।


माँ जब आप बीमार होते हो तो रात रात भर जाग कर आपकी सेवा करती है, टीचर आपके परीक्षा की कठिन घड़ी में आपके अच्छे मार्क्स के लिए जी जान लगा देती है।


माँ आपको डांटती है, मारती है पर प्यार भी बहुत करती है और टीचर भी आपको डांटती है, फटकारती है,प्यार करती है क्योंकि वो आपका अच्छा भविष्य बनाना चाहती हैं, आपको जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहती हैं आपके सपनों को साकार करना चाहती है। 


माँ आपके साथ रैम्प वॉक पर साथ चल कर उत्साह बढ़ाती है, टीचर उस रैम्प वॉक पर चलने का साहस दिलाती है।


माँ सुंदर परिवार और समाज की संरचना करती है तो टीचर आपको शिक्षित कर सशक्त राष्ट्र का निर्माण करती है 


माँ है तो जीवन है, जीवन है तो सपना है, सपना है तो अपना है, साथ में अच्छी टीचर आपके जीवन में हो तो क्या कहना है!


ये ही है मेरे जीवन का संस्मरण🙏 


शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!


मधु भूतड़ा

गुलाबी नगरी जयपुर से





गुरू की सीख


मेरी प्रथम गुरू मेरी प्यारी माँ है,उन्हीं ने मुझे पग पग सम्भाला और जीवन जीने की सीख दी है, बात तब की जब मेरे पापा हमें छोड़कर चले गए, अचानक ऐसा लगा कि हमसे हमारी दुनिया छिन गई हैं,कुछ समय परेशानी के आते हैं लेकिन सम्भलने की सीख गुरू यानि मेरी माँ ने दी ,जब भी जीवन में पैर लड़खड़ाए तब स्वयं पर भरोसा कर आगे बढ़ना,अपनी ताकत स्वयं बनों...किसी के सहारे से नहीं, तुम किसी की लाठी बनना ये कभी मत सोचना कि तुम बेचारी लड़की हो कमजोर नहीं तुम मेरा अभिमान हो,डटकर आगे बढ़ते रहना।

          द्वितीय गुरू मेरे पिता रहे जिन्होंने समाज में सिर उठा चलना सिखाया, समाज के व्यक्तियों की सोच,व्यवहार से मेरा परिचय कराया... पिता ने एक महत्वपूर्ण सीख दी समाज तुमसे बना है इसकी किसी बात को अपने को हावी ना होने देना,समाज में प्रत्येक तरह के लोग हैं अच्छे बुरे बस उनकी परवाह ना करना, वही पिता की सीख उनके जाने के बाद भी आशीर्वाद के रूप में आज भी साथ है।

            तृतीय सीख मेरे शिक्षकों ने मुझे दी जो हर मुश्किल के पड़ाव में चुनोती बनकर मेरा मार्गदर्शन किया करती है, आज उन्हीं की शिक्षा में मैंने अपने को शिक्षित पाया है जिसकी वजह से नौकरी व्यवसाय, सभी के साथ सामंजस्य स्थापित करके सफलता प्राप्त करते हैं, मैं अपने तीनों गुरूजनों को बारम्बार प्रणाम करती और अंतिम समय तक उनका स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा।


भावना गौड़

      ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश) 



गुरु मेरी प्रेरणा 


बात उन दिनों की है जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ती थी| मैं अपने विद्यालय और अपनी कक्षा में एक होनहार विद्यार्थी के रूप में पहचानी जाती थी| एक दिन की बात है मैंने लापरवाही के कारण अपना गृहकार्य पूरा नहीं किया था| इत्तेफाक से उसी दिन हमारी कक्षा अध्यापिका ने हम सबकी कॉपियाँ जांचने के लिए मांग ली थी| चूँकि मैं कक्षा की मॉनिटर थी तो मैंने ही सबकी कॉपियाँ एकत्र करके मैडम की मेज पर रख दी थी| जिन बच्चों का काम पूरा नहीं था मैडम उन्हें कक्षा के बाहर भेजती जा रही थी और वो सभी बच्चे अपने कान पकड़ कर कक्षा के बाहर खड़े थे|


मुझे अब बहुत ज्यादा डर लगने लगा था क्योंकि मैडम बहुत गुस्से में थी| मेरा भी नंबर आया जब मैडम ने मेरी कॉपी चेक की तो उन्होंने मुझे कक्षा के बाहर नहीं भेजा| मैं बहुत हैरान थी क्योंकि कक्षा के सभी बच्चे बाहर खड़े थे सिवाय मेरे| मैडम ने एक नज़र मेरी तरफ देखा और कहा अपनी कॉपी ले जाओ| मैंने डरते हुए वो कॉपी ली और अपनी सीट पर आकर खड़े-खड़े ही देखने लगी| मैंने देखा उसमे मैडम ने पेन से लिखा था “तुमसे बहुत उम्मीदें हैं मुझे भी और तुम्हारे माँ-पापा को भी कोशिश करना ऐसा कभी दोबारा न हो|”


मेरी आँखों में आँसू आ गए थे और मैंने कहा मैडम मुझे माफ़ कर दो| मैडम उठकर मेरे पास आई और कहने लगी बेटा हमारी जरा सी लापरवाही से हमारी शक्सियत बदल सकती है| तुम एक होनहार छात्रा हो और कोशिश करना हमेशा इसी पहचान को बनाए रखने की| मैंने उनकी इस सीख को अपनी ज़िन्दगी में उतार लिया था और मैं आज भी एक होनहार शक्सियत के रूप में पहचानी जाती हूँ|


आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष में मैं अपनी उस शिक्षिका के लिए दो पंक्तियाँ लिखना चाहूँगी:-


“आप की उस एक सीख ने मुझे सिखाया ज़िन्दगी जीने का हुनर,

ये चुनौतियाँ हरा नहीं सकती मुझे हो ज़िन्दगी में चाहे कोई भी समर!


मीना सिंह “मीन”

नई दिल्ली 



संस्मरण विद्यालय की

बात वर्ष 1983 की है जब मैं कक्षा 11वीं में पढ़ता था उस समय राज्य में 11+3 पद्धति लागू थी, तब 11वीं की परीक्षा पूरे राज्य में एक साथ राज्य के बोर्ड द्वारा ली जाती थी और 11वीं का वर्ष विद्यालय की पढ़ाई का अन्तिम वर्ष हुआ करता था इसके प्राप्तांक के आधार पर कुछ व्यवसायिक महाविद्यालयों को छोड़कर प्रायः सभी महाविद्यालयों में प्रवेश मिलता था इसका मतलब 11वीं की परीक्षा बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी इसी से भविष्य का निर्धारण होता था कि हम डाक्टर ,इंजीनियर या कुछ और बनकर अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत करेंगे। 11वीं कक्षा में उस वक्त पांच विषय हुआ करते थे, हिन्दी अंग्रेज़ी, भौतिकी, रसायन और गणित। मुझे आज भी याद है उस समय रसायन विषय को एक शिक्षिका रन्जना गद्रे नाम की पढ़ाया करतीं थी, इसी वर्ष वो हमारे विद्यालय में पढ़ाने के लिए आई थी उस समय उनकी उम्र लगभग 23- 24 वर्ष रही होगी, उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था, वो बहुत कठोर स्वभाव की अनुशासन प्रिय शिक्षिका थी, शुरुआत में उनकी कक्षा में हम सब थोड़े डरे सहमें रहते थे परन्तु कुछ दिनों में मैं उनके प्रिय शिष्यों में से एक हुआ करता था, मुझे उनकी पढ़ाने की शैली और उनकी सकारात्मक उर्जा एवं उनकी प्रेरक बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थी, मैं आज भी उनकी इन खूबियों का कायल हूँ । 11 वीं की परीक्षा कुछ ही दिनों में होनी वाली थी परीक्षा की समय सारिणी आ चुकी थी उस दिन हमारी अन्तिम कक्षा थी, रसायन विषय की कक्षा में वो आईं और बोर्ड परीक्षा के सम्बंध में समझाने लगी कि परीक्षा में कैसे उत्तर लिखना है कैसे कैसे प्रश्न परीक्षा में आ सकते हैं, ये परीक्षा हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हैं, और वो हममें इस परीक्षा की तैयारी के लिए हर प्रकार से जोश भर रही थी, हमें इस परीक्षा में पूरी लगन और मेहनत से बैठने के लिए प्रेरित कर रही थीं, अन्तिम में उन्होंने एक बात कही जो मुझे बहुत ही अच्छी लगी और आज भी मैं उस बात को नहीं भुला पाया, उस दिन उन्होने कहा जब इस परीक्षा का परिणाम आएगा तब कुछ लोगों के अंक अच्छे आएंगे और कुछ लोगों को उनके आशा के अनुरूप अच्छे अंक नहीं मिलेंगे तब भी उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस जीवन का अन्तिम लक्ष्य पैसा कमाना है, कोई जरूरी नहीं कि आप अच्छे अंक नहीं लाओगे तो पैसा नहीं कमा सकते या अमीर नहीं बन सकते, इस दुनियां में इंजीनियर, डाक्टर के अलावा भी बहुत सारे पेशे हैं जिन्हें आप कम अंक पाकर भी हासिल कर सकते हो, जैसे वकील बनकर , उद्योगपती बनकर एक इंजीनियर व डाक्टर से अधिक कमा सकते हो और पूरी दुनियां में प्रसिद्धि पा सकते हो, उन्होंने आगे कहा कि जीवन में कैसी भी परिस्थितियां हो निराश कभी मत होना, हार मत मानना उनकी यह बातें मुझे आज भी प्रासंगिक लगती हैं और इस देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण है इस बात के कि एक कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी ख्याति प्राप्त कर सकता है, ऊंचे शिखर पर पहुँच सकता है जैसे उद्योगपति आदरणीय धीरु भाई अम्बानी, भारतरत्न श्री सचिन तेंडुलकर आदि ये ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी शिक्षा बहुत नहीं है, फिर भी अपने अपने क्षेत्रों में शिखर पर पहुंचे और पूरी दुनियां में देश का नाम रोशन किया।

अनिल कुमार मिश्रा 

कोरबा छत्तीसगढ़ 



प्रतिभा को निखारते गुरु


आज भी मेरे स्मृति पटल पर मेरी गुरु आदरणीया सुषमा वैष्णव की वह सीख अंकित है, जिन्होंने ना केवल मेरी प्रतिभा की पहचाना अपितु उसे ज्ञान की अग्नि में तपाकर निखारा और मेरे भाग्य को संवार दिया। मैं बचपन से ही पढ़ने में होशियार लेकिन संकोची स्वभाव की छात्रा थी ।कक्षा में शिक्षक द्वारा पढ़ाया गया कोई पाठ अगर समझ में नहीं भी आता था तो भी मैं पुनः पूछने का साहस नहीं कर पाती थी। एक दिन हमारी विज्ञान की शिक्षिका आ.सुषमा वैष्णव ने कक्षा में एक प्रयोग करके समझाया और अंत में सब बच्चों से पूछा कि उन्हें समझ आ गया तो मैंने भी दूसरे बच्चों को देखकर हां की स्वीकृति में गरदन हिला दी, उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और वो प्रयोग दोहराने को कहा । मैं डर के मारे रोने लगी तब उन्होंने बहुत स्नेह से मुझे अपने पास बिठाया और फिर प्यार से मुझे समझाया कि अगर कोई प्रश्न समझ में नहीं आता है तो पूछ लेना चाहिए। वे मेरे संकोची स्वभाव को समझ गई थी । कुछ दिन बाद विद्यालय में विज्ञान प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता थी। उन्होंने उस प्रतियोगिता के लिए मेरा नाम लिख दिया जब मैंने उन्हें मेरा नाम काट देने को कहा तब उन्होंने मुझे समझाया कि अगर तुम अपनी प्रतिभा को बाहर ही नहीं आने दोगी तो दूसरे उसके बारे में कैसे जानेंगे और उसने निखार कैसे आएगा? उनके कहने पर मैंने उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया और मेरा चयन अंतरजिला प्रतियोगिता में हो गया उसमे भी मैंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। उसके बाद जब भी कोई आयोजन होता तो उसमें मेरा नाम शामिल होता ।कई बार वो खुद मुझे भाषण लिखकर देती और मंच पर मुझे बोलने को कहती ऐसे धीरे धीरे मेरी झिझक दूर होती गई और मैं आगे बढ़ती गई।अब ना केवल पढ़ाई में बल्कि वाद विवाद,भाषण ,लेखन या गीत हर प्रतियोगिता में अव्वल आने लगी।स्कूल के पश्चात कॉलेज में भी अनेक प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया और अनेक बार मंच संचालन किया।आज मैं स्वयं एक शिक्षिका हूं और अनेकों आयोजन पर मंच संचालन करती हूं और जब भी मेरी प्रशंसा होती है तब मेरी आंखों में गुरु आ. सुषमा वैष्णव जी की छवि दिखाई देने लगती है, उनकी दी हुई सीख कानों में गूंजने लगती है और अनायास ही मैं उनके सम्मान में झुक जाती हूं। इसलिए कहा जाता है कि शिक्षक जौहरी के समान होता है जिस प्रकार जौहरी हीरे को तराशता है उसी प्रकार शिक्षक छात्र की प्रतिभा को निखारता है।अंत में गुरु के चरणों में दो पंक्तियां अर्पित करूंगी_

गुरु बिन यह जीवन है जैसे सृष्टि अधूरी

गुरु का सानिध्य ही पीड़ा हर ले पूरी

गुरु के चरणों में वंदन करती बारंबार

अर्पित करू श्रद्धा सुमन गुरु महिमा अपरंपार।।

🙏🙏


स्वरचित मौलिक

प्रेमलता चौधरी 

फालना, पाली राजस्थान


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