प्रतियोगिता #15 गांधी दर्शन की प्रासंगिकता
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार प्रतियोगिता
दिवस :-शनिवार
दिनांक:-3/10/2020
विषय:-वर्तमान गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता।
***********************(
🙏वर्तमान गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता🙏
**************************
देशभक्तों की श्रेणी में सबसे प्रथम स्थान पर
कहे जाने वाले अपने राष्ट्रपिता को कौन नही
जानता है। अपने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास
के पटल पर अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की
एक अलग छवि ही अंकित थी। जो सत्य,अहिंसा
और प्रेम से परिपूर्ण थी।
गाँधीजी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी
था।एक जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के
पोरबंदर में हुआ था।इनके पिता का नाम करमचंद
गांधी और माता का नाम पुतली बाई था।
इनका पूरा जीवन प्रेम, अहिंसा और सत्य का
संगम रहा था। गाँधीजी के विचारों के दर्शनानुसार
अहिंसा के तीन लक्ष्य दिखाई देते है।
गांधीवादी विचारों के अनुसार अहिंसक व्यक्ति ही
सत्य के दर्शन कर सकता है। सत्य और हिंसा में
कभी मिलाप हो ही नही सकता क्योंकि सत्य
हिंसा से कोशों दूर रहता है।
कोई भी प्राणी मात्र बिना अहिंसा के
प्राणी हित के बारे में सोच भी नही सकता है।
अहिंसा के बिना प्रेम की भावना विचारों में समाहित
हो ही नही सकती है।
गाँधीजी ने अपने विचारों और आदर्शो के बारे में
कहा था कि,सत्य और निष्ठा पर अडिग रहने के
लिए आपेक्षित शक्ति उन्हें अपनी नैतिक शुद्धता
तथा काम, क्रोध, आदि भयंकर शत्रुओं को अपने
से दूर रखने से मिली जिसकी वजह से दृष्टि और
निर्णय दूषित नही हो सके।
उनके वचनानुसार:-अगर मैं नितांत अकेला भी होउ
तो सत्य और अहिंसा पर दृढ़ रहूंगा क्योकि यही सबसे
ऊँचा साहस है। जिसके सामने एटमबम भी अप्रभावी
बन जाता है।- महात्मा गांधी
आज के वर्तमान के परिपेक्ष्य में गाँधीजी के दर्शन
बहुत ही प्रभावी हो सकते है और दैनिक जीवन मे
तो उनके दर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है।
और चारित्र निर्माण के लिए आवश्यक है।
*******************************
जयहिंद
स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
शशिलता पाण्डेय
बलिया उत्तर प्रदेश
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार
दिनांक - 3/10/2020
विषय - वर्तमान में गांधी दर्शन की प्रासंगिकता
*************************************
?????
गाँधी की प्रासंगिकता पर विचार करने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि गाँधी के व्यक्तित्व एवं विचार दर्शन का मूल आधार क्या है?
व्यक्तित्व की दृष्टि से विचार करें तो गाँधीजी राजनीतिज्ञ हैं, दार्शनिक हैं, सुधारक हैं, आचारशास्त्री हैं, अर्थशास्त्री हैं, क्रान्तिकारी हैं। समग्र दृष्टि से गाँधी के व्यक्तित्व में इन सबका सम्मिश्रण है। मगर इस व्यक्तित्व का मूल आधार धार्मिकता है।
धर्म मनुष्य की पाश्विक प्रकृति को बदलने का उपक्रम है। धर्म मनुष्य की वृत्तियों के उन्नयन की प्रक्रिया है। धर्म एक समग्र सत्य साधना है। धर्म अन्तःकरण के सत्य से चेतना का सम्बन्ध स्थापित करना है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चित्त का, मन का, चेतना का परिष्कार होता है। धर्म वह तत्व है, जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। धर्म मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, धर्म सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है।
गाँधी के पूर्व भारतीय आध्यात्मिक साधना परम्परा में प्राप्ति का लक्ष्य था- मोक्ष प्राप्त करना/निर्वाण प्राप्त करना/बैकुंठ प्राप्त करना/भगवान की समीपता प्राप्त करना। गाँधी की प्राप्ति का लक्ष्य है- मनुष्य मात्र की निरन्तर सेवा करते रहना। गाँधीजी का भारत के संदर्भ में तात्कालिक उद्देश्य था- भारत की स्वाधीनता। भारत की सामान्य जनता में स्वाभिमान को जगाने, स्वाधीनता प्राप्ति के लिए सामूहिक चेतना का निर्माण करने, भारतीय राष्ट्रीयता के नवउत्थान का शंखनाद करने तथा दासता की श्रृंखलाओं को चूर-चूर करने का काम जिन लोगों ने किया उनको प्रेरणा देने का सबसे अधिक काम राष्ट्रपिता ने किया।
(गीता चौहान)
जशपुर छत्तीसगढ़
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार प्रतियोगिता
दिनांक - 04/10 2020
विषय - वर्तमान में गांधी दर्शन की प्रासंगिकता।
???????
गांधी जी ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे जिन्होंने आजादी के दौर में समग्र भारत वासियों को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया। उनका यह योगदान स्मरणीय है। गांधी जी जब भारत के हर एक क्षेत्र की यात्रा किया तो यह देखकर उन्हें ग्लानि महसूस होने लगा कि यहां के लोगों के पास तन ढंकने तक को वस्त्र नहीं है। यह दृश्य देखकर उन्होंने भी आम जनमानस की तरह धोती धारण कर लिए। गांधी का यह विचार था कि देशी वस्तुओं का उपयोग करें और विदेशी वस्तुओं का निष्कासन। विदेशी वस्तुओं के खरीदने से देश का पैसा विदेश चला जाता है यदि स्वदेशी वास्तु खरीदते हैं तो देश का पैसा देश में ही रहेगा और उससे यहा के रहने वाले लोगों को भी रोजगार की सुविधा उपलब्ध हो पाएगी जिससे देश में बेरोजगारी व गरीबी की समस्या कुछ कम होगी। आज के दौर में देश और विदेश सभी जगह अशांति व हिंसा फैला हुआ है। आज के दौर में गांधी के अहिंसा की राह पर चले तो समग्र देश में शांति कायम की जा सकती है। आज के दौर में गांधी दर्शन को साहित्य में भी शामिल कर लिया गया है जिससे युवाओं को देश के प्रति उनका दायित्वों को बताया जा सके।गांधी जी जब भारत का भ्रमण किया तो उनके सामने भाषा संबंधी समस्या सामने आई क्योंकि यहां के लोगों की भाषा भौगोलिक आधार पर एक दूसरे भिन्न हैं। तब गांधी जी ने हिंदी भाषा को आजादी के संपर्क भाषा के रूम में प्रयोग करने के लिए कहां। गांधी जी ने स्त्री शिक्षा के लिए जोर दिया क्योंकि जब स्त्री शिक्षित रहेगी तो वह परिवार वालों को भी शिक्षित कर सकेगी जिससे वह अपने हक की लड़ाई इस स्वयं लड़ सके। इस आधार पर वर्तमान समय में गांधी दर्शन की आवश्यकता पूरे विश्व को है।
राजकुमार
मुंगेली छत्तीसगढ़
प्रतिध्वनी साहित्यिक परिवार
प्रतियोगिता नंबर -15
दिनांक 04 अक्टूबर 2020
विधा - लेख
वर्तमान में गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता
लेखक - मोहन चन्द्र जोशी
******************************
????
वैश्विक स्तर पर व्याप्त हिंसा, मतभेद, बेरोजगारी, महँगाई तथा तनावपूर्ण वातावरण में आज बार-बार यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि गाँधी के सत्य व अहिंसा पर आधारित दर्शन और विचारों की आज कितनी प्रासंगिकता महसूस की जा रही है। यूं तो गाँधीवाद का विरोध करने वालों ने जिनमें दुर्भाग्यवश और किसी देश के लोग नहीं बल्कि अधिकांशतय: केवल भारतवासी ही शामिल हैं, ने गांधी के विचारों की प्रासंगिकता को तब भी महसूस नहीं किया था जब वे जीवित थे। गाँधी से असहमति के इसी उन्माद ने उनकी हत्या तो कर दी परन्तु आज गाँधी के विचारों से मतभेद रखने वाली उन्हीं शक्तियों को भली-भाँति यह महसूस होने लगा है कि गाँधी अपने विरोधियों के लिए दरअसल जीते जी उतने हानिकारक नहीं थे, जितना कि हत्या के बाद साबित हो रहे हैं। और इसकी वजह केवल यही है कि जैसे-जैसे विश्व हिंसा, आर्थिक मंदी, भूख, बेरोजगारी और नफरत जैसे तमाम हालातों में उलझता जा रहा है, वैसे-वैसे दुनिया को न केवल गाँधी के दर्शन याद आ रहे हैं बल्कि गाँधीदर्शन को आत्मसात करने की आवश्यकता भी बड़ी शिद्दत से महसूस की जाने लगी है।
दरअसल सर्वधर्म सम्भाव की जीती-जागती तस्वीर समझे जाने वाले गाँधी जी मानते थे कि हिंसा की बात चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न की जाए, परन्तु वास्तविकता यही है कि हिंसा किसी भी समस्या का सम्पूर्ण एवं स्थायी समाधान कतई नहीं है। जिस प्रकार आज के दौर में आतंकवाद व हिंसा विश्व स्तर पर अपने चरम पर दिखाई दे रही है तथा चारों ओर गाँधी के आदर्शों की प्रासंगिकता की चर्चा छिड़ी हुई है, ठीक उसी प्रकार गाँधीजी भी अहिंसा की बात उस समय करते थे जबकि हिंसा अपने चरम पर होती थी।
अहिंसा से हिंसा को पराजित करने की सारी दुनिया को सीख देने वाले गाँधीजी स्वयं गीता से प्रेरणा लेते थे। हालांकि वे गीता को एक अध्यात्मिक ग्रन्थ स्वीकार करते थे। परन्तु श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए संदेश में कर्म के सिद्घान्त का जो उल्लेख किया गया है, उससे वे अत्यधिक प्रभावित थे। गाँधीजी जिस ढंग से गीता के इस अति प्रचलित वाक्य -'कर्म किये जा, फल की चिंता मत कर' की व्याख्या करते थे, वास्तव में आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसी व्याख्या की प्रासंगिकता महसूस की जा रही है।
- मोहन चन्द्र जोशी
हरिद्वार उत्तराखंड
#प्रतिध्वनि साहित्यिक प्रतियोगिता
#गांधी जी के विचारों की वर्तमान मे प्रासंगिकता
विधा - लेख
दिनांक-04/10/2020
????
गाँधीजी का नाम ज़ेहन मे याद आते ही, बहुत सी बातें याद आ जाती हैं।उनका स्वतंत्रता संग्राम मे संघर्ष, उनका सादा जीवन उच्च विचार दर्शन, उनके तीन बंदर, उनकी लाठी और सबसे ज़्यादा जो शब्द उनसे जुड़ा है वो है अहिंसा।
अहिंसा - मतलब बिना हिंसा।चाहे कोई भी परिस्थिति आये परेशानी आये आप किसी भी हिंसा का न तो साथ दोगे न ही अपनाओगे।पर बदलते समय के साथ हमारे समाज मे हमारे जीवन मे हर जगह हिंसा इस कदर पनप रही है कि गांधी जी को हमने सिर्फ किताबों तक सीमित कर दिया है।क्या वाकई बापू का बताया रास्ता बहुत कठिन है।अपने दिल से अगर हम सब पूछे तो मुझे लगता है कठिन हो सकता है नामुमकिन नहीं है।छोटी छोटी रोज़ की बातों से ही शुरुआत करें तो अपने हिस्से का समाज सुधार तो हो ही जायेगा।
एक प्रसंग याद आता है, गांधी जी एक बार कस्तूरबा जी को डॉक्टर के यहां ले गये वहां डॉक्टर ने कहा इन्हें खाने मे नमक कम खाना है।गांधी जी ने उस दिन से छः सात दिन नमक कम खाया तब जाकर कस्तूरबा जी को कहा खाने मे नमक कम खाना चाहिए।
कितना आसान है ना दूसरों को सलाह देना, मास्क लगा कर रखो,रेड लाइट क्रॉस न करो, कूड़ा कूड़ेदान मे डालो आदि।ज़रूरी है कि गाँधी जी की तरह पहले हम खुद मे बदलाव लायें और फिर दूसरों से अपेक्षा करें।
बापू हम सबसे यही कहना चाहते हैं..
मैं सदैव तुम्हारा मार्ग दर्शक रहा हूँ,
अहिंसा का पथ प्रदर्शक रहा हूँ,
किताब तक सीमित कर देते हो मुझे,
तभी तुम्हारे अंतर्मन मे भटक रहा हूँ।
सना
(दिल्ली)
दिनांक- 3/10/2020 से 4/10/2020
दिन- शनिवार से रविवार
विधा- लेख (200 -300 शब्द)
विषय-वर्तमान में गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता
अहिंसावाद और वर्तमान स्थिति
भूमिका*- हम सभी जानते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अहिंसावाद के प्रचारक और प्रशंसक थे| उनका सपना था एक ऐसे देश का निर्माण करना जहाँ सभी स्वतंत्र हो, स्वावलंबी हो और अहिंसावाद में विश्वास करते हो| गाँधी जी ने एक तरफ देश को आज़ाद कराने के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी थी, वहीं अपने देश को स्वतंत्र और स्वावलंबी बनाने के लिए अपना उदाहरण प्रस्तुत किया था| गाँधी जी ने पहले खुद स्वावलंबन के नियम का पालन किया था| वो जानते थे कि देश को स्वतंत्र होने के लिए आज़ादी के साथ-साथ स्वरोजगार की आवश्यकता है| सत्य, अहिंसा, सादा जीवन, उच्च विचार यही गाँधी जी के जीवन के सिद्धांत रहे हैं|
वर्तमान में गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता -* महात्मा गाँधी ने अपने देश के नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक समझा था| लेकिन वर्तमान स्थिति में गाँधी दर्शन का कोई महत्व नहीं रह गया है| वर्तमान समय में गाँधी दर्शन के किसी सिद्धांत की कोई मान्यता नहीं रह गयी है| सत्य, अहिंसा, सादा जीवन और उच्च विचार ये सभी सिद्धांत अब कमज़ोर हो चुके हैं| गाँधी जी के नैतिक मूल्यों ईमानदारी, अहिंसा, जात-पात का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वरोजगार, स्त्री-शिक्षा वा स्त्री-सम्मान सभी सिर्फ किताबी मूल्य बनकर रह गए हैं| राष्ट्रनिर्माण व विकास पूर्ण रूप से स्थागित होता जा रहा है| नेता-राजनेता सभी भ्रष्ट हो चुके हैं| मीडिया और अख़बार कोई भी ईमानदारी से अपना काम नहीं कर नहीं पाते क्योंकि बड़े नेता और अधिकारी उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं|
गाँधी दर्शन आवश्यकता है,
हिन्द और हिन्दुस्तान की,
मर्यादा ही नैतिकता है,
पहचान है इंसान की|
मीना सिंह “मीन“
नई दिल्ली
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार
विधा- लेख
प्रतियोगिता -15
विषय - वर्तमान में गांधी दर्शन की प्रासंगिकता
????
"वर्तमान में विश्व के समस्त देश आतंकवाद ,भ्रष्टाचार , बेरोजगारी, हिंसा का दंश झेल रहे हैं, कुल मिलाकर यह प्रश्न समीचीन है कि विश्व इन चुनौतियों का सामना किस प्रकार करता है? विश्व ऐसे अंधे मोड़ पर खड़ा है ,जहा से आगे बढ़ने हेतु गांधी दर्शन को अपनाया जाए | राष्ट्रपिता गांधीजी सत्य ,अहिंसा, सर्वधर्म समभाव, समरसता की प्रतिमूर्ति थे | जिस प्रकार गांधीजी ने सत्य ,अहिंसा के मार्ग को अपनाते हुए भारत को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराया ,ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी जी की उम्मीदों का आसमान सतरंगी नजर आया |वर्तमान परिदृश्य में विश्व में बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार, हिंसा जातिवाद ,आतंकवाद दिन-ब-दिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही है| यह एक लंबे अंधकार में दौरो की शुरुआत हो सकती है ,इसलिए अब इनकी जड़ों पर विचार करने का वक्त आ गया है| गांधी दर्शन अपनाना पहली प्राथमिकता होगी ,बेहतरी की सूरत भी यहीं से निकलेगी| इतिहास गवाह है जिन देशों ने सदियों पुराने समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को सहेज रखा है दुनिया के नक्शे पर वही अंगद के पांव की तरह टिके हैं ,विश्व स्तर पर गांधी जी के आदर्शो को अपनाकर ,शांति और सौहार्द का वातावरण बनाया जाए जो कि
गंगा -जमुनी तहजीब की मिसाल होगा और यह वक्त की दशा और दिशा बदल देगा | वर्तमान की ओट से उज्ज्वल भविष्य को देखता विश्व आशान्वित है। गांधीजी के आदर्शों से युवाओं को स्वरोजगार, आत्मनिर्भर बनने की सीख लेनी होगी| उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए, सफलता हेतु कटीली पथरीली राहों पर नंगे पैर चलना पड़ता है ,वर्तमान प्रासंगिकता में समीचीन होता है।
स्वरचित और मौलिक
सुनील चाष्टा
सलूम्बर जिला उदयपुर
राजस्थान
नमनमंच संचालक ।
प्रतिध्वनि साहित्य परिषद ।
विषय गांधी जी के दर्शन की वर्तमान में प्रासंगिकता।
विधा - लेख।
स्वरचित
???
महात्मा कहे जाने वाले और देश के राष्ट्रपिता के नाम से नवाजे गए मोहनदास करमचंद गांधी के तीन मुख्य सिद्धांत थे- अहिंसा, सत्य और देश भक्ति।
इसमें उन्होंने समाज के सामने अहिंसा को सर्वोपरि रखा और खुद एक उदाहरण बनकर लोगों के सामने आए लेकिन भारतीय चिंतन में देखा जाए तो अहिंसा तब तक ही ठीक है जब तक कि वह व्यक्ति समाज और देश के लिए कोई नुकसान नहीं पहुंचाती।
दूसरा सिद्धांत उनका था सत्य उन्होंने सत्य पर अपने बहुत सारे प्रयोग किये। अपनी आत्मकथा भी लिखी। लेकिन अपने जीवन में मैं खुद इस सत्य से भागते रहे कि वह कभी भी मुसलमानों के नेता नहीं बन सकते।उन्हें धर्म के आधार पर देश का बंटवारा भी मंजूर करना पड़ा या किया।
उसके बाद देश भक्ति- देशभक्ति भी व्यक्ति के व्यक्तिगत सिद्धांत से ऊपर होती है। इसका भी पालन पुरी से अपने जीवन में खुद ही नहीं कर पाए क्योंकि उन्होंने देशभक्तों के मुकाबले जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी आहुति दी या देश के लिए आंदोलन किए क्रांतिकारी कार्य किये उनको बचाने की बजाय अपने सिद्धांत अहिंसा को ही ज्यादा महत्व दिया बजाय देशभक्तों को सपोर्ट करने के।
कोई कुछ भी कहे मैंने जो भी पढा है उसके हिसाब से गांधी जी ने स्वयं ही अपने इन तीनों सिद्धांतों का अक्षरशः से पालन नहीं किया।उन्होंने अंग्रेजों से इस वादे पर कि जब भारत के सैनिक 46 के विश्व युद्ध में भाग लेंगे तो देश को आजाद कर देंगे। गांधी जी ने युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों के जाने की अनुमति दी तो क्या यह हिंसा नहीं थी? जिन सिद्धांतों को गान्धी जी का बताया जाता है, यह वास्तव में स्वयं गांधीजी के नहीं थे। इससे पहले महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, बाल कृष्ण गोखले इन सिद्धांतों के जनक थे।उन्होंने इन सिद्धांतों को अपनाया था और जनमानस में अपने सिद्धांतों के रूप में पेश किया क्योंकि उस समय एक बड़े नेता की देश को आवश्यकता थी।लोगों ने उन्हें सिरमाथे बिठाया।
आज उनके तीनों सिद्धांत देश में कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते ना तो उनके अनुयायियों ने व्यवहार में लिया ना समाज में राज्य में लागू किया। सत्य कोई ना देखना चाहता है न सुनना चाहता है और ना कहना चाहता है।
गांधीजी की तीनों बातें बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो एक कटु व्यंग्य के रूप में समाज में देखने को आ रही हैं। जहां आम व्यक्ति या समाज हर बुरे से आंख मूंदकर निकल जाता है कि मुझे क्या पड़ी है।किसी को नहीं दिखाई देता है ना अत्याचार ना भ्रष्टाचार ना राष्ट्रद्रोह। सरकार, प्रशासन से लेकर आम आदमी तक सबने से आंख मूंद ली है।सब सिर्फ अधिकार चाहते हैं कर्तव्य निभाने के नाम पर सब किनारे हो जाते हैं। वास्तविकता में गांधीजी के कुछ आदर्श स्वरोजगार, आत्मनिर्भर बनाने की इच्छा, स्वच्छता अभियान, नारी शिक्षा सब कहीं पीछे छूट गए थे।
शायद अब एक आशा की किरण मोदी जी के नेतृत्व में दिखाई दे रही है। हम तो उम्मीद ही कर सकते हैं कि आगे ये सिद्धांत फले फूलें और आम जनता अपने कर्तव्यों, अधिकारों को समझें। देश की भलाई समाज की भलाई के लिए खुद को समर्पित करें और इन नैतिक सिद्धांतों को अपने जीवन में कम से कम कुछ हद तक तो अपना ही ले जिससे अपना भी और समाज का और देश का भी कल्याण हो।
प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"
04/10 /2020
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार
प्रतियोगिता---१५
विधा---लेख
विषय--वर्तमान समय में गांधी दर्शन की प्रासंगिकता।
????
उपर्युक्त विषय पर विचार करने से पहले हमें गांधी दर्शन और वर्तमान परिस्थितियों को जानना समझना अत्यावश्यक है। यूं तो गांधी जी के विचारों की कोई सीमा नहीं है पर हम वर्तमान परिस्थितियों को मध्य नजर रखते हुए कुछ मुख्य विचारों पर दृष्टिपात करते हैं।
सर्वप्रथम "सबसे सशक्त विचार सत्य और अहिंसा" दे श और समाज को मजबूती प्रदान करने वाला विचार है।दूसरा, बुरा न देखो, बुरा न बोलो, बुरा न सुनो।, तीसरा, जब देश में किसी भी समय सड़कों पर कोई भी महिला अकेले सुरक्षित घूम सकेगी तब सही मायने में देश आजाद कहृलाऐगा। महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।जिसके लिए वह अपने बेटे को भी समझाते थे कि बिना अपनी पत्नी की मर्जी उसके साथ सैक्स नहीं करना। उसका सम्मान करना है। चौथा, आंख के बदले आंख ले ली जाए तो संपूर्ण विश्व ही कौंधा हो जाएगा। पांचवां, कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो।
अब उपर्युक्त गांधी दर्शन पर हम वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर विचार करें तो हम पाएंगे कि हमारे चारों ओर विश्व,देश,सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक तथा पारिवारिक स्तर पर झूठ,फरेब, अमानवीयता, कुकृत्य, रेप, अपराध और अपशब्द की भाषा का ही आवरण है।इसी माहौल में हम जी रहे हैं ।आए दिन रेप केस सुनते हैं यानि देश अभी भी गुलाम है। गांधीजी का यह विचार तो वर्तमान समय में 100% प्रासंगिक है वास्तव में आज सभी को अपने बेटों को महिलाओं के सम्मान की शिक्षा देना अत्यावश्यक है तभी किसी भी बेटी को निर्भया और हाथरस की पीड़िता समान बनने से रोका जा सकता है। बाकी गांधी दर्शन अधिकतर विनम्रता पर आधारित है जो कि मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सही है पर वर्तमान परिस्थितियों में जीते हुए उनको यथार्थ में पूरी तरह से अपनाना असंभल ही लगता है। अत: मैं तो यही कहूंगी कि वर्तमान में गांधी दर्शन पूर्ण रूपेण प्रासंगिक नहीं है।
सुधा बसोर
गाजियाबाद
प्रतिध्वनि समूह
प्रतिध्वनि साहित्य परिवार
प्रतियोगिता-15
विधा- लेख
दिनांक-4/10/20
???
गांधी जी 1891 में कानून की पढ़ाई करके लंदन से लौटे ! काठियावाड़ और बम्बई में बकालत करने के बाद, एक गुजराती मुसलमान की ओर से एक मुकदमे की पैरवी करने दक्षिण अफ्रीका गयेे ! वहाँ काले गोरे के भेद व अपने देश वासियों की दयनीय दशा को देखकर उन्हें तीव्र आघात पहुंचा और यही से उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ ! इसी सफलता के बाद गाधीं जी 1914 में भारतीय राजनीति में प्रवेश किया !
1930 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन का संचालन किया व 1942 में, अंग्रेजों भारत छोडो" का संदेश दिया एवं करो या मरो" का नारा दिया ! 1944 में जेल से रिहा होने के बाद हिन्दू मुस्लिम समस्या को हल करने के लिए हर संभव प्रयास किया ! किन्तु जिन्ना पाकिस्तान के निर्माण की बात पर अडे रहे ! गांधी जी देश के बंटवारे के विरोधी थे, किन्तु ब्रिटिश नीति, मुस्लिम लीग की हठधर्मिता और हिंदू मुस्लिम दंगे के कारण उन्हें विभाजन स्वीकार करना पड़ा !
उन्होंने सदैव ही रचनात्मक कार्य क्रम अपनाने पर बल दिया और उनके द्वारा हिन्दू मुस्लिम एकता, दलित उद्धार, नारी कल्याण, मद्य निषेध हथकरघा उद्योग को प्रोत्साहन आदि की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये !
गांधी जी की विचारधारा के प्रेरणा स्रोत को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- पूर्वी व पश्चिमी ! पूर्वी स्रोतों में उन पर अपनी माँ के व्यक्तिगत जीवन की पवित्रता और पिता की सादगी व शिष्टता का अमिट प्रभाव पड़ा ! उनका मानना था कि- यदि कोई तुम्हें पानी पिलाने और तुमने भी उसे बदले में पानी पिलाया तो उसका कोई महत्व नहीं है ! अपकार के बदले उपकार करने में ही खूबी है ! पश्चिमी स्रोतों में बाइबिल था ! पर्वत प्रवचन से उन्होंने ग्रहण किया कि- " अत्याचारी का प्रतिकार मत करो वरन् जो तुम्हारे दाहिने गाल पर चांटा मारे तो उसके सामने बांया गाल भी कर दो !
वे प्राणी मात्र की सेवा ही वास्तविक आध्यात्मिक जीवन का मूल तत्व मानते थे ! उनका कहना था- मानव क्रियाओं से पृथक कोई धर्म नहीं है ! सत्य व अहिंसा को गांधी जी ने अपने जीवन में अपनाया !
सत्य क्या है- स्वयं गांधी जी कहते हैं " यह एक बड़ा कठिन प्रश्न है, किन्तु स्वयं अपने लिए मैंने इसे हल कर लिया है, तुम्हारी आत्मा जो कहती है, वही सत्य है !
अहिंसा का अर्थ केवल हत्या न करना ही नहीं है वरन् अहिंसा से उनका तात्पर्य अन्य किसी भी प्रकार से अपने विरोधी को कष्ट नहीं पहुंचाना है !
लेखक
जगदीश बेजान
व्याख्याता हिन्दी
भरतपुर राज.
?????
गांधी दर्शन को समझने के लिए महात्मा गांधी के जीवन को झांकना होगा, उन्होंने जो भी कहा उसे जीकर दिखलाया,दक्षिण आफ्रीका से जब वो भारत लौटे तब देश की जनता धर्म, जाति,भाषा, ऊंच नीच के मकड़जाल में उलझी हुई थी जिसके कारण अंग्रेजों को देश की आजादी के लिए होने वाले अलग अलग प्रयासों को दबाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी, गांधी जी ने देश के हालात को समझा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंग्रेज़ी सेना को युद्ध में परास्त कर देश से निकालना सम्भव नहीं है इसलिए उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अहिंसा के मार्ग को चुना इसके तहत, वो अंग्रेजों की गलत नीतियों के खिलाफ अहिंसक आन्दोलन, धरना, प्रदर्शन के माध्यम से विरोध करना प्रारंभ किया। गांधी ने पूरे देश में घूम घूम कर देश की जनता जो आपस में धर्म जाति,भाषा पर बंटी हुई थी उसे एक सूत्र में पिरोने का काम किया और ये अहसास दिलाने में कामयाब हुए कि आजादी की लड़ाई सबको मिलकर लड़ना होगा । उन्होंने सर्व धर्म सम भाव के सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाया वो सम्प्रदाय वाद को समाप्त करने के लिए गैर हिन्दू धर्म के नेताओं के घर जाकर उनके साथ बैठकर उनको ये विश्वास दिलाने में कामयाब हुए कि गांधी जी के मन में सभी धर्मों के प्रति आस्था और विश्वास का भाव है साथ ही साथ उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त छुआ छुत और ऊंच नीच के भेदभाव को अस्वीकार कर नीची जाति के लोगों को इज्जत सम्मान देकर अपने गले लगाया उन्हें अपने जीवन में शामिल किया और उन्होंने नीची जाति के लोंगों को हरिजन नाम दिया। उन्होंने नर ही नारायण है के सिद्धांत को आत्मसात कर दीन दुखियों की खूब सेवा की वो सब इन्सान को बराबर का दर्जा देते थे चाहे वो अमीर हो या गरीब हो। उनके मन में देश की संस्कृति, संस्कार एवं स्वदेशी उत्पादों के प्रति अपार श्रद्धा थी वो हमेशा अपने जीवन में अधिक से अधिक देश में निर्मित वस्तुओं का उपभोग करते थे और विदेशी वस्तुओं का तिरस्कार। इसके लिए उन्होंने विदेशी उत्पादों की होली जलाकर देश में स्वदेशी उत्पादों के लिए आन्दोलन चलाया था, जो उस समय बहुत कारगर हुआ था।आजाद भारत में उन्होंने राम राज्य की परिकल्पना की थी, जिसमें देश की हर विकास योजनाओं का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके, किसी भी व्यक्ति से भेदभाव न हो और हर व्यक्ति सरकार से और अपने जीवन से संतुष्ट हो, हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के हिसाब से काम मिल सके। उनके मन में आत्मनिर्भर भारत की कल्पना भी थी जिसमें देश में ही हर उत्पादों का निर्माण देश के ही उद्यमियों के द्वारा किया जा सके जिससे देश के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध हो सके और देश का पैसा देश में ही रहे जो देश के विकास में लग सके। गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे, उन्होंने जीओ और जीने दो को आत्मसात करते हुए सब जीव जन्तुओं के प्रति प्रेम और दया का भाव रखते थे वो हमेशा जीवन में सदा सत्य बोलते थे । उनका जीवन संत के समान त्याग और तप से परिपूर्ण था वो जीने के लिए भोजन तथा तन ढंकने के लिए वस्त्र धारण करते थे, गांधी ने तीन बंदर के प्रतीक से जीवन में बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत करो के सिद्धांत को जीवन भर निभाया और दुसरों को भी संदेश दिया, इसलिए गांधी महात्मा कहलाए ।
मोहन दास करम चंद गांधी एक जन नायक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, समाज सेवकऔर एक महान संत थे।
गांधी दर्शन आज देश की सरकारों का दर्पण है ।
आज भी दुनियां में गांधी का जीवन आदर्श जीवन है।।
अनिल कुमार मिश्रा
प्रतियोगिता क्र. 15
आयोजक : प्रतिध्वनि साहित्यिक परिवार
विधा : लेख
विषय : गांधी दर्शन की प्रासंगिकता
रचनकार : अनिल कुमार मिश्रा
?????
गांधी दर्शन को समझने के लिए महात्मा गांधी के जीवन को झांकना होगा, उन्होंने जो भी कहा उसे जीकर दिखलाया सबसे पहले वो देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराना चाहते थे उनका पहला उद्देश्य स्वाधीन भारत था जिसके लिए उन्होंने अपना तन मन धन सब अर्पण कर दिया। दक्षिण आफ्रीका से जब वो भारत लौटे तब देश की जनता धर्म, जाति,भाषा, ऊंच नीच के मकड़जाल में उलझी हुई थी जिसके कारण अंग्रेजों को देश की आजादी के लिए होने वाले अलग अलग प्रयासों को आसानी से दबाया जाता रहा, अंग्रेज हमारे समाज में व्याप्त जातिवाद,सम्प्रदायवाद को बढ़ाकर हमें कमजोर कर हम पर शासन करते रहे । गांधी जी ने देश के हालात को समझा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंग्रेज़ी सेना को युद्ध में परास्त कर देश से निकालना सम्भव नहीं है इसलिए उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अहिंसा के मार्ग को चुना इसके तहत, वो अंग्रेजों की गलत नीतियों के खिलाफ अहिंसक आन्दोलन, धरना, प्रदर्शन के माध्यम से विरोध करना प्रारंभ किया जिसको अंग्रेज़ी हुकूमत ने पहले तो इसे साधारण समझ हलके में लिया और गांधी की शक्ति को समझने की भूल की। गांधी ने पूरे देश में घूम घूम कर देश की जनता जो आपस में धर्म जाति,भाषा पर बंटी हुई थी उसे एक सूत्र में पिरोने का काम कियाना और ये अहसास दिलाने में कामयाब हुए कि आजादी की लड़ाई सबको मिलकर लड़ना होगा । उन्होंने सर्व धर्म सम भाव के सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाया वो सम्प्रदाय वाद को समाप्त करने के लिए गैर हिन्दू धर्म के नेताओं के घर जाकर उनके साथ बैठकर उनको ये विश्वास दिलाने में कामयाब हुए कि गांधी जी के मन में सभी धर्मों के प्रति आस्था और विश्वास का भाव है साथ ही साथ उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त छुआ छुत और ऊंच नीच के भेदभाव को अस्वीकार कर नीची जाति के लोगों को इज्जत सम्मान देकर अपने गले लगाया उन्हें अपने जीवन में शामिल किया और उन्होंने नीची जाति के लोंगों को हरिजन नाम दिया। उन्होंने नर ही नारायण है के सिद्धांत को आत्मसात कर दीन दुखियों की खूब सेवा की वो सब इन्सान को बराबर का दर्जा देते थे चाहे वो अमीर हो या गरीब हो। उनके मन में देश की संस्कृति, संस्कार एवं स्वदेशी उत्पादों के प्रति अपार श्रद्धा थी वो हमेशा अपने जीवन में अधिक से अधिक देश में निर्मित वस्तुओं का उपभोग करते थे और विदेशी वस्तुओं का तिरस्कार। इसके लिए उन्होंने विदेशी उत्पादों की होली जलाकर देश में स्वदेशी उत्पादों के लिए आन्दोलन चलाया था, जो उस समय बहुत कारगर हुआ था।आजाद भारत में उन्होंने राम राज्य की परिकल्पना की थी, जिसमें देश की हर विकास योजनाओं का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके, किसी भी व्यक्ति से भेदभाव न हो और हर व्यक्ति सरकार से और अपने जीवन से संतुष्ट हो, हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के हिसाब से काम मिल सके। उनके मन में आत्मनिर्भर भारत की कल्पना भी थी जिसमें देश में ही हर उत्पादों का निर्माण देश के ही उद्यमियों के द्वारा किया जा सके जिससे देश के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध हो सके और देश का पैसा देश में ही रहे जो देश के विकास में लग सके। गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे, उन्होंने जीओ और जीने दो को आत्मसात करते हुए सब जीव जन्तुओं के प्रति प्रेम और दया का भाव रखते थे वो हमेशा जीवन में सदा सत्य बोलते थे । वो जीवन में नशा के खिलाफ थे, वो तम्बाकू और शराब के पूर्ण प्रतिबंध के हिमायति थे, वो जीवन भर हर प्रकार के नशा से दूर रहे। उनका जीवन संत के समान त्याग और तप से परिपूर्ण था वो जीने के लिए भोजन तथा तन ढंकने के लिए वस्त्र धारण करते थे उन्होंने कभी विलासिता पूर्ण जीवन का निर्वाह नहीं किया, उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार की राह पर चलकर अपना जीवन निर्वाह किया, गांधी ने तीन बंदर के प्रतीक से जीवन में बुरा मत देखो, बुरा मत देखो और बुरा मत करो के सिद्धांत को जीवन भर निभाया और दुसरों को भी संदेश दिया, इसलिए गांधी महात्मा कहलाए ।
मोहन दास करम चंद गांधी एक जन नायक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, समाज सेवकऔर एक महान संत थे।
गांधी दर्शन आज देश की सरकारों का दर्पण है ।
आज भी दुनियां में गांधी का जीवन आदर्श जीवन है।।
अनिल कुमार मिश्रा
कोरबा छत्तीसगढ़
मो.नं. 9329298089
Comments
Post a Comment