प्रतियोगिता #08: गजेंद्र कुमार घोगरे
मेहंदी मेहंदी पिया के नाम की जब मैंने लगाई। प्रेम रंग में रंग गई मैं फिर सो न पाई। रंग मेहंदी का देख के मैं फूली न समाई ईश्वर धन्य तेरा है मेहंदी पक्की खूब लगाई। लोग कहें मेहंदी को तककर तू प्रियतम की प्यारी लाज से मैं लाल हो गई देख हथेली न्यारी। अब यह रंग जाने न दूँगी मन में ठान लिया है सबसे सुंदर सबसे न्यारा मेरा प्यारा पिया है। गजेंद्र कुमार घोगरे वाशिम (महा)
"प्रतिध्वनि" साहित्यिक पत्रिका हिंदी जगत् में वह मशाल है जिससे ज्ञान की ज्योति हर क्षण प्रवाहित हो रही है ।इस पत्रिका द्वारा की जाने वाली साहित्यिक सेवा से हमारा देश और समाज रोशन हो रहा है।इसमें प्रकाशित रचनाएं कविता ,कहानी,लधुकथा,आलेख, आदि विद्याएं साकारात्मक गुणों से युक्त और युग की संवेदना को प्रकट करती हैं ।साहित्यिक जगत् में ऐसी पत्रिका का प्रकाशन बेहद सराहनीय है।"प्रतिध्वनि" की गूंज सभीके हृदय में गूंजती रहे और साहित्यिक सेवा में यह पत्रिका नित्य नये मानदंड के साथ कामयाबी हासिल करे।इन्हीं शुभकामनाओं के साथ प्रतिध्वनि पत्रिका से जुड़े सभी साहित्य सेवियों और सम्पादक मंडल को हार्दिक बधाई।मेरी रचना को पत्रिका में प्रकाशित करने हेतु
ReplyDeleteसादर धन्यवाद।
.....डॉक्टर सुनीता मंडल
अध्यक्ष ,हिंदी विभाग
काँचरापाड़ा कॉलेज
कल्याणी विश्वविद्यालय
कोलकाता, पश्चिम बंगाल।
धन्यवाद
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